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भाजपा के ‘वार-प्रहार’ से राहुल गांधी के ‘निखार’ को मिल रही ‘रफ्तार’!


राजीव रंजन तिवारी 
देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी) राजनीतिक दृष्टिकोण से अमूमन सभी पार्टियों के लिए खासा अहमियत रखता है। अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने के लिए यूपी में मजबूत जनाधार होना जरूरी है। यही वजह है कि कुछ क्षेत्रीय दलों को छोड़ सभी पार्टियां यूपी पर ही फोकस करती है। लम्बे अरसे तक कांग्रेस का गढ़ माना जाने वाला यूपी का वोटर करीब तीन दशक से उसका साथ छोड़ चुका है। इसके पीछे कांग्रेस के सांगठनिक ढांचा का लचर होना ही अहम कारण है। अब यूपी में कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने की तब कोशिश हो रही है जब यहां प्रचंड बहुमत वाली भाजपा की सरकार है। इस स्थिति में कांग्रेसियों का यह टास्क मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं। क्योंकि इस दिशा में कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी की रणनीति सफल होती दिख रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि यूपी समेत पूरे देश में कांग्रेस की खोई सियासी जमीन को वापस दिलाने में उसकी धुर विरोधी पार्टी भाजपा व उसके नेता ही मददगार साबित हो रहे हैं। इस तथ्य को समझने के लिए राहुल गांधी के उस भाषण को याद कीजिए, जो उन्होंने गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे आने के दिन यानी 18 दिसम्बर, 2017 को दी थी। उन्होंने कहा था- ‘मेरे कांग्रेसी भाइयों और बहनों। आपने जो कुछ किया उस पर मुझे गर्व है। उनकी (भाजपा) तुलना में आप कहीं अलग दिखे, जिनसे आप लड़े। आपने अपने गौरव के अनुरूप गुस्से का मुकाबला कर सबको बता दिया कि कांग्रेस आज भी अन्य दलों की तुलना में ताकतवर है और इसकी ताकत शालीनता और साहस है।‘ राहुल गांधी का यह नीतिगत निर्णय है कि विरोधियों (भाजपा व अन्य गैर कांग्रेसी दल) का विरोध असंसदीय व अमर्यादित भाषा में नहीं करना है। जबकि भाजपा और उसके नेता कांग्रेस अध्यक्ष पर निर्बाध गति से वार-प्रहार कर रहे हैं, जो राहुल के व्यक्तित्व में न सिर्फ निखार ला रहा है बल्कि उन्हें ज्यादा परिपक्व भी बना रहा है। निसंदेह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भाजपा के वाकपटु, मुखर और दिग्गज नेताओं से चतुर दिखने लगे हैं। विरोधियों का अक्रामक विरोध न करने की उनकी नीति सफल होती दिख रही है। भाजपा के कथित ‘बड़बोले नेता’ इसे जो समझें, लेकिन राहुल गांधी का ‘शालीन सिद्धांत’ कांग्रेस के लिए संजीविनी बनने लगा है। बेशक, धीरे-धीरे व अदृश्य ही सही कांग्रेस व राहुल गांधी के सियासी सेंसेक्स में बढ़त भाजपा के लिए चिता का सबब है। यही वजह है कि भाजपा के ऊपर से नीचे तक के नेता-कार्यकर्ता कांग्रेस और राहुल के खिलाफ ‘अकारण’ अक्रामक विरोध की रणनीति अख्तियार किए हुए हैं। दिलचस्प ये है कि भाजपा के तीखे हमले के बावजूद राहुल गांधी ‘मौन’ हैं। राहुल का यह ‘मौन’ विरोधियों का विरोध न करने की उनकी नीति के अंतर्गत प्रतीत हो रहा है, जो कांग्रेस के सियासी सफर को सुगम बना रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी की पहली अमेठी (उत्तर प्रदेश) यात्रा को यदि सियासी चश्मे से देखें तो भाजपा के विरोध से राहुल में निखार आने वाली तस्वीर और साफ हो जाएगी। इस बार की उनकी यात्रा तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों से ओतप्रोत रही है। तमाम अवरोध, गतिरोध व विरोध के बीच अपनी दो दिवसीय (15-16 जनवरी) यात्रा पूरी करने के बाद भी राहुल गांधी ने एकबार भी विरोधियों के विरोध के बाबत जुबां तक नहीं खोली है। हां, केन्द्र व यूपी सरकार की कथित जनविरोधी कार्यशैली पर जरूर सवाल उठाए हैं, जिनकी नीतियों से आम जनता को हर रोज रूबरू होना पड़ रहा है। जबकि अमेठी के भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ तक ने राहुल गांधी के विरोधस्वरूप खूब आग उगले हैं। आपको बता दें कि केन्द्र व यूपी में सत्ता की बागडोर संभालने वाली भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहे कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी की राह में रोड़े अटकाने की कोशिशें जारी हैं। बावजूद इसके कांग्रेसी प्रवक्ताओं व खुद राहुल गांधी द्वारा ‘जैसे को तैसा’ वाली नीति से अलग रखा गया है। यदि भाजपा के लोग इसे कांग्रेस अथवा राहुल गांधी की कमजोरी समझ रहे हों तो इसे उनकी नादानी कही जाएगी। विरोधियों का विरोध न करना कांग्रेस की एक चालाक रणनीति का हिस्सा है। बीते कुछ वर्षों में देखा गया है कि जिसका जितना विरोध किया जाता है, वह उतना ही लोकप्रिय होता चला जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2014 का लोकसभा और 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव है। इन दोनों चुनावों में कांग्रेस के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रहे। कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा की नीतियों से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली पर तबियत से खूब हमले किए। परिणाम आज सबके सामने है। केन्द्र और यूपी दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं। खैर, मूल विषय यह है कि कांग्रेस ने विरोधियों के अक्रामक विरोध से तौबा क्यों किया? लगता है, कांग्रेस के रणनीतिकार व खुद राहुल गांधी यह समझ चुके हैं कि अब राजनीति में भी महान वैज्ञानिक न्यूटन की गति का तीसरा फार्मूला (प्रत्येक क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है) सटीक बैठने लगा है। यानी विरोध करने पर व्यक्ति (नेता) पहले की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। विदित हो कि कांग्रेस प्रमुख बनने से पहले ही राहुल गांधी ने पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को हिदायत दे दी थी कि भाजपा के किसी भी नेता के विरुद्ध सीधे व अमर्यादित हमले नहीं करना है। राहुल की लक्ष्मण रेखा लांघने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के विरुद्ध हुई कार्रवाई बड़ा उदाहरण है। उल्लेखनीय है कि कि कांग्रेस प्रमुख बनने के बाद 15 जनवरी को पहली बार राहुल गांधी अमेठी और रायबरेली पहुंचे। इस दौरान उमड़ी भारी भीड़ और कार्यकर्ताओं में जोश-ओ-जज्बा पहले से कई गुना ज्यादा थी। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उन्होंने केन्द्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। कहा कि पीएम ने आम जनता को रोजगार का झूठा सपना दिखाया। केंद्र सरकार की मेक इन इंडिया योजना विफल रही। सरकार ने किसान की बिजली, पानी, जमीन छीनी और उद्योगपतियों को दे दी। केन्द्र सरकार 10-15 उद्योगपतियों के लिए काम करती है। दूसरे दिन यानी 16 जनवरी को उन्होंने अमेठी में रोड शो किया। इस रोड शो में भी कांग्रेसी नेताओं की अपेक्षा से अधिक भीड़ उमड़ी और लोग राहुल गांधी की एक झलक पाने को बेचैन दिखे। राहुल के रोड शो के पहले बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इसमें व्यवधान पैदा करने की कोशिश की। रोड शो से पहले कुछ बीजेपी कार्यकर्ताओं ने राहुल विरोधी नारेबाजी कर माहौल खराब करने का प्रयास किया। तब कांग्रेसी भी जवाब देते हुए बीजेपी के विरुद्ध नारेबाजी करने लगे। यहां भी राहुल ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को यह कहते हुए रोका कि विरोधियों को मत रोकिए। उन्हें कांग्रेस नहीं, जनता रोकेगी। बहरहाल, यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि भाजपा के विरोध के बावजूद अमेठी में उमड़ा जनसैलाब सिद्ध करता है कि कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ रही है और उनके सियासी व्यक्तित्व में निखार आ रहा है।
राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से बौखला गए हैं भाजपाई 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अमेठी दौरे के दौरान भाजपा के विरोध के बाबत यूपी कांग्रेस के उपाध्यक्ष व पूर्व मंत्री दीपक कुमार कहते हैं कि केन्द्र व यूपी की भाजपा सरकारों की कार्यशैली से जनता त्रस्त है। फलतः वोटर भाजपा से दूरी बनाने लगे हैं। वहीं कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता भाजपा के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। इससे भाजपाई परेशान हैं और कांग्रेस का अकारण विरोध कर गुस्से का इजहार कर रहे हैं। वर्ष 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में देश की सियासी तस्वीर बदलेगी। दिल्ली कांग्रेस आईटी सेल के संयोजक विशाल कुन्द्रा कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता भाजपा नेताओं को पच नहीं रही है। राहुल गांधी की सभ्य, शालीन नीति जनता को पसंद आ रही है। यही वजह है कि उनकी सभाओं में भाजपा नेताओं की अपेक्षा ज्यादा भीड़ उमड़ रही है। यूं कहें कि भाजपा के कुछ नेता खुद को स्वयंभू अजेय मान बैठे थे, लेकिन राहुल गांधी की लोकप्रियता ने उनकी सोच पर ब्रेक लगा दी है। भाजपा के दिग्गज समझने लगे हैं कि यदि यही दशा रही तो वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव भारी पड़ेगा। खैर, देखना यह है कि राहुल गांधी की शालीन सियासत भाजपा की अक्रामकता पर कितनी असरकारक होती है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व चर्चित स्तम्भकार हैं)
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