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'बिहार में शराबबंदी से चिंतित हैं कारोबारी'

पटना (डीएम दिवाकर)। बिहार में देसी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध की तैयारी पहले से थी. लेकिन अंगरेजी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध झटके से लगाया गया है. गांव देहात में देसी शराब की बिक्री पर पाबंदी की तैयारी सरकार पिछले छह महीने से कर रही थी. एक अप्रैल पर उसे प्रतिबंधित कर भी दिया. लेकिन अंगरेजी शराब पर प्रतिबंध झटके में लगाया गया है. अंगरेजी शराब पर पाबंदी भी लोगों के दबाव की वजह से लगी है. देसी शराब पर पाबंदी की घोषणा के समय से ही लोग कह रहे हैं कि अंगरेजी शराब पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा है. दोनों तरह की शराब पर पाबंदी के बाद अब असली चुनौती इसके उत्पादकों के लिए हैं. बिहार में उनका अच्छा ख़ासा कारोबार था, अब उन्हें कारोबार की चिंता सता रही है. इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार ने विशेष इंतज़ाम किए हैं. जैसे शराब केवल सरकारी दुकानों से ही बिकेगी, सीमित दायरे में बिकेगी और दवा के रूप में ही इसका इस्तेमाल होगा और महंगी क़ीमत पर बिकेगी. इसके अलावा भी सरकार ने कुछ क़दम उठाए हैं. दूसरी चुनौती शराब की बिक्री पर पाबंदी के बाद होने वाले आर्थिक नुक़सान की है. इससे निपटने के लिए भी सरकार ने तैयारी कर ली है. सरकार अन्य क्षेत्रों से नुक़सान की भरपाई कर लेगी. जहां तक इसे सामाजिक रूप से लागू करने की बात है या मध्य वर्ग में इसकी स्वीकार्यता की बात है, वहां सरकार को थोड़ी दिक्क़त आएगी. लोगों को समझाने और उनकी मानसिकता बदलने में. लोगों को समझा-बुझाकर और जागरूकता अभियान से इसके लिए तैयार किया जा सकता है. हालांकि इसमें थोड़ा समय लगेगा. लेकिन बिहार में शहरी क्षेत्र केवल 11 फ़ीसद ही है. वहीं इस शराबबंदी से प्रभावित हो रहे कारोबारियों का सवाल है तो उनके लिए बिहार में काफी स्कोप है. बिहार में औद्योगिकरण की स्थिति बहुत ख़राब है, ऐसे में वो अपने पैसे को किसी और उद्योग में लागू कर सकते हैं. इन सब बातों को देखते हुए मुझे लगता है कि शराबबंदी लागू करने के लिए सरकार के पास थोड़ी-बहुत चुनौतियां होंगी. लेकिन मुझे लगता है कि अगर किसी फ़ैसले को लागू करने के लिए सरकार, प्रशासन और जनता तैयार है तो उसे लागू करने में बहुत अधिक दिक्क़त नहीं आएगी. बिहार सरकार ने राज्य में पांच अप्रैल से पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी है. पहले सरकार ने एक अप्रैल से राज्य में देसी शराब की बिक्री और निर्माण पर पाबंदी लगाई थी.
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