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असम में जंग दिलचस्प, पशोपेश में बीजेपी, कांग्रेस के दांव से अजमल के छूट रहे पसीने!

गुवाहाटी (सुधीर झा)। असम विधानसभा की 126 सीटों के लिए मतदान हो चुका है। जनता ने उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला कर दिया है। अब इसका पता 19 मई को ही लगेगा, लेकिन राज्य में चुनावी तस्वीर अभी तक साफ नहीं है। राज्य में कोई भी सियासी पार्टी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है। यानि मतदाताओं का मन कोई नहीं पढ़ सका है। किसी भी पार्टी या गठबंधन के पक्ष में हवा नहीं है। अंतिम क्षण में भारतीय जनता पार्टी ने असम गण परिषद (अगप) के साथ गठबंधन किया, जबकि हाग्रामा मोहिलारी नेतृत्व वाले बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ उसका गठबंधन पहले से था। कांग्रेस बोडोलैंड को छोड़ पूरे राज्य में अकेले चुनाव लड़ी। बिहार में कांग्रेस की सहयोगी जेडीयू ने असम में उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है। जेडीयू और आरजेडी ने विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी एआईयूडीएफ के साथ तालमेल करके बीजेपी को रोकने के लिए एक लोकतांत्रिक मोर्चा बनाया है और बदरूद्दीन अजमल इस मोर्चे के नेता हैं। जाहिर है लोकतांत्रिक मोर्चा कांग्रेस के वोट में सेंध लगाएगा। अजमल का आक्रामक चुनावी प्रचार अंदाज अगर ध्रुवीकरण करने में सफल रहा तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान संभव है। असम विधानसभा की 126 सीटों के लिए मतदान हो चुका है। जनता ने उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला कर दिया है। अब इसका पता 19 मई को ही लगेगा, लेकिन राज्य में चुनावी तस्वीर अभी तक साफ नहीं है। दुनिया के 500 ताकतवर मुस्लिमों में शुमार और 2005 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (अब एआईयूडीएफ) नाम से राजनीतिक पार्टी शुरू करने वाले अजमल असम चुनाव में किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं। गौरतलब है कि असम में बदरूद्दीन अजमल की छवि एक तरफ जहां राजनेता, व्यवसायी, इस्लामिक धर्मगुरु के अलावा मसीहा जैसी है तो दूसरी तरफ बांग्लाभाषी मुस्लिम उनको संरक्षक के तौर पर भी देखते हैं। अजमल के छोटे भाई सिराजुद्दीन भी सांसद हैं। छह बेटों में से दो एमएलए हैं। बिहार में जहां कांग्रेस जेडीयू-आरजेडी के साथ महागठबंधन कर मैदान में उतरी वहीं असम में कांग्रेस अकेले चुनावी मैदान में उतरी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों परोक्ष रूप से एआईयूडीएफ नेता बदरूद्दीन अजमल को अपने पाले में करने की कोशिश में थी, लेकिन सार्वजनिक तौर पर ये दोनों पार्टियां मौलाना के खिलाफ ही नजर आई। इसके पीछे की वजह साफ है कि अजमल की छवि बंग्लादेशियों के संरक्षक के रूप में है और कोई भी पार्टी इस मुद्दे पर खतरा मोल नहीं लेना चाहती थी। असम में बंगाली भाषा बोलने वाले हिंदुओं की भी एक बड़ी आबादी है जो बांग्लादेश में हो रहे उत्पीड़न के चलते यहां आकर बस गई हैं। बीजेपी शुरुआत से ही अवैध अप्रवासी कहकर बांग्लाभाषी मुसलमानों की मौजूदगी का विरोध करती आई है। गौरतलब है कि राज्य में बाहरी लोगों के चलते पहले से ही उनकी जमीन और संसाधनों का जबर्दस्त दोहन हो चुका है, जिससे स्थानीय लोग निरंतर गरीबी के दलदल में फंसे हुए हैं। इन हालातों में किसी ने भी प्रत्यक्ष रूप से अजमल का साथ लेकर खतरा नहीं उठाया। खबरों के अनुसार कांग्रेस के नए रणनीतिकार प्रशांत किशोर पहले अजमल की पार्टी और कांग्रेस के बीच तालमेल कराना चाहते थे, लेकिन आखिरी वक्त पर उन्होंने जेडीयू और आरजेडी को कांग्रेस के साथ लाने की बजाय दोनों पार्टियों को अजमल के साथ जाने दिया। हालांकि कांग्रेस की इस रणनीति का जवाब चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चल पाएगा। लेकिन कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बदरुद्दीन अजमल की पार्टी की हालत खराब है। उनके दो विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए और बीजेपी के बढ़ते प्रभाव की वजह से अल्पसंख्यकों का रुझान कांग्रेस की तरफ जा रहा। ऐसे में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर सही कदम उठाया। अजमल की बेचैनी की यह बड़ी वजह है। हाल ही में केंद्र सरकार ने कुछ कानूनों के जरिए लंबे समय से रह रहे बंग्लादेशी प्रवासियों के रुकने के प्रबंध भी किए हैं। केंद्र के इस कदम से इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि ये अल्पसंख्यक समुदाय आने वाले समय में स्थायी नागरिकता की मांग करने लग जाएं। जाहिर है बांग्लाभाषी मुसलमान बदरुद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ का मूल जनाधार हैं और बीजेपी ने इस पर अपना कब्जा जमाने की कोशिश की है। बीजेपी को इन चुनावों में ध्रुवीकरण का प्रयास उल्टा भी पड़ सकता है। असम के स्थानीय निवासियों का मानना है कि हाल के कुछ वर्षों में बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत आने वालों में मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं की संख्या अधिक रही है। इसका कारण यह है कि क्षेत्र में हुई आर्थिक प्रगति का अधिक लाभ अल्पसंख्यकों के मुकाबले हिंदुओं को ज्यादा मिला है। कांग्रेस से 9 विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हुए हेमंत बिश्व शर्मा भी कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाते नहीं दिख रहे, बल्कि उनके आने के बाद से बाद से कांग्रेस ज्यादा संगठित दिखी। असम गण परिषद और बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ़ पिछली विधानसभा में इन दोनों ही पार्टियों की ताक़त (क्रमश: 10 और 18 सीटें) उससे ज़्यादा थीं। कांग्रेस का सहयोगी दल बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (12 सीटें) बोडो इलाकों में एक तरह से अपराजेय माना जाता है। रिजल्ट के बाद अगर कोई महागठबंधन बनता है या इन तीन दलों के साथ कांग्रेस किसी तरह का तालमेल कर लेती है तो बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फिरना तय है। कुछ इलाक़ों में वामपंथी दल भी प्रभाव रखते हैं और वे भी बीजेपी को नुक़सान ही पहुंचाएंगे। इस चुनाव में सीएम तरुण गोगोई ने बीजेपी पर बाहरी का ठप्पा लगाकर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की। पूरे चुनाव में गोगोई ने बीजेपी पर हिंदी भाषी पार्टी होने के साथ असम में घुसपैठ करने का आरोप लगाया है। बिहार चुनाव में नीतीश के नारे का सहारा गोगोई असम चुनाव में लेते दिखे। जिस प्रकार नीतीश ने बिहार चुनाव में बिहारी बनाम बाहरी कार्ड का मुद्दा उछाला था, ठीक उसी तर्ज पर गगोई ने बीजेपी का नाम लिया। जाहिर है समय-समय पर असम की राजनीति में प्रतिबंधित संगठन उल्फा समेत अन्य स्थानीय संगठन इस तरह की भाषा का इस्तेमाल असमिया अस्मिता को जगाने के लिए करते रहे हैं, ताकि बाहरी लोगों के खिलाफ अपने पक्ष में समर्थन जुटाया जा सके। गगोई ने राजनीतिक परिपक्वता दर्शाते हुए मुगलों पर उनकी विजय गाथा का जिक्र अपने चुनाव प्रचार में किया है। जाहिर है इसका मकसद अहोम समुदाय में अपनी पकड़ बनाना है जो ऊपरी असम में बहुसंख्यक है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने ऊपरी असम के इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन किया था। पिछले साल दिल्ली में हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जारी प्रेस रिलीज में असम विधानसभा सदस्यों के नाम को लेकर की गई गलतियों को भी गोगोई ने आड़े हाथों लिया और कहा है कि राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। असम में कांग्रेस ने कन्हैया और रोहित वेमुला के पोस्टर लगाए थे। जाहिर है पार्टी इन्हीं चेहरों के भरोसे मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करती रही। पोस्टर में मोदी के अच्छे दिनों के वादे पर प्रहार करते हुए एक किसान को सुसाइड करते और एक महिला को छोटे बच्चे के साथ रोते हुए भी दिखाया गया। पोस्टर पर असमी भाषा में पूछा गया कि क्या यही हैं मोदी के अच्छे दिन? फैसला आपका..। जाहिर है कांग्रेस ने केंद्र में मोदी सरकार को घेरकर असम में अपना हित साधने की कोशिश की है। यही नहीं 59 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली वाम दल भी कन्हैया का समर्थन करती दिखी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कन्हैया का मामला अभी कोर्ट में है और उस पर फिलहाल राजनीति नहीं करनी चाहिए। असम के इस चुनाव में जहां तक जातिगत समीकरण का सवाल है तो कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम वोट बैंक है, लेकिन ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने उस पर अपना दावा ठोककर कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा दी है। असम में कुल मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है। 9 जिलों के 39 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 35 फीसदी से ज्यादा है। 2011 में इन 39 सीटों में से 18 कांग्रेस ने जीती थीं, जबकि एआईयूडीएफ ने 16 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को उस समय बड़ा झटका लगा, जब चौथी बार सरकार बनाने का दावा कर रहे मुख्यमंत्री तरुण गगोई के कुछ सहयोगियों ने बीजेपी का दामन थाम लिया। जनजातियों का झुकाव पारंपरिक रूप से कांग्रेस की ओर रहा है, मगर अब वैसी बात नजर नहीं आ रही। ऊपरी असम में सर्वानंद सोनोवाल की वजह से मुमकिन है कि बीजेपी उन्हें एक हद तक आकर्षित किया हो, लेकिन जीत के लिए ये काफी होगा या नहीं ये देखने वाली बात होगी। जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है तो वे अजमल की पार्टी एआईडीयूएफ और कांग्रेस के बीच में बंटे हुए दिखे। बांग्लादेश से लगी सीमा वाली सीटों में खासकर निचले असम के इलाकों में मुस्लिम आबादी अच्छी-ख़ासी है। यही कारण है कि यहां अजमल को पिछले चुनाव में सफलता मिली थी। अगर मुसलमान मतदाताओं ने कांग्रेस से दूरी बनाई होगी तो इसका फायदा एआईडीयूएफ के साथ-साथ बीजेपी को भी मिल सकता है। लेकिन अगर मुस्लिम मतदाताओं ने बिहार की तरह यहां भी कांग्रेस पर ही भरोसा दिखाया तो फिर बीजेपी के सपने पर पानी फिर सकता है। समय के साथ बोडोलैंड की राजनीति भी बदल चुकी है। एक तरफ जहां हाग्रामा मोहिलारी की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही तो दूसरी तरफ ऑल बोडो छात्रसंघ के समर्थन वाली यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी से कांग्रेस ने हाथ मिला लिया है और इसका सीधा लाभ कांग्रेस को होगा। इस चुनाव में बीजेपी को रोकने लिए ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ), आरजेडी और जेडीयू एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा है। एआईयूडीएफ 76 और जेडीयू-आरजेडी मिलकर 12 सीटों पर लड़ी हैं। 2011 के चुनाव में भी एआईयूडीएफ ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें 16 सीटें 39 मुस्लिम बहुल सीटों में से थी। ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस अजमल के साथ समझौता कर सकती है। बीजेपी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही असम गण परिषद की पहली बार 1985 में और फिर 1996 में सरकार बनी थी। असम की राजनीतिक सत्ता में 1952 से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। सिर्फ तीन बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। अगप ने दो बार सरकार बनाई और उससे पहले 1978 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। कांग्रेस ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, आरटीआई एक्टिविस्ट अखिल गगोई की पार्टी गण मुक्ति संग्राम असम और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट यानी बीपीएफ से साथ आने की अपील जरूर की जिसमें सफलता नहीं मिल पाई। जेल में बंद उल्फा नेता अनूप चेतिया का शांति प्रक्रिया को समर्थन चुनाव में कांग्रेस को भारी पड़ सकता है। कांग्रेस चेतिया के शांति वार्ता का समर्थन किए जाने से चिंतित है क्योंकि इससे डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया में कांग्रेस के गढ़ को झटका लग सकता है। मार्क्सिवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) सहित छह वाम दल लेफ्ट यूनाइटेड फोरम के बैनर तले 126 में से 59 विधानसभा सीटों पर एक साथ चुनाव लड़े हैं। इसमें माकपा 19 सीट, भाकपा दस सीट,एआईएफबी दस सीट, भाकपा (माले) आठ सीट, आरएसपी एवं आरसीपीआई दो-दो सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। छह पार्टियों में माकपा एवं भाकपा के अलावा भाकपा (माले), आरएसपी, आरसीपीआई एवं एआईएफबी शामिल हैं। अब इन हालातों में नतीजे वाले दिन ही पता चलेगा कि किसका पासा सही पड़ा और जनता ने किस पर भरोसा जताया है।
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