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बिहार में बीजेपी पर मंडराया ये महासंकट, दांव पर लगी साख..!

सुधीर झा 
बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही चुनावी सरगर्मियां लगातार बढ़ती जा रही है। एक बाद के एक रैली और आरोप-प्रत्यारोप के दौर में सभी पार्टियां अपने वोटरों को रिझाने में लगी है। एक तरफ जहां नीतीश कुमार को दस साल की सत्ता विरोधी लहर, लालू और कांग्रेस के साथ गठबंधन, बीजेपी से रिश्ता तोड़ने और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर गिरावट जैसे सवालों से गुजरना काफी भारी पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के लिए भी यह सफर आसान नहीं होगा। अगर पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव की बात करें तो इसमे बीजेपी गठबंधन को 39 फीसदी, आरजेडी+कांग्रेस+एनसीपी गठबंधन को 30 फीसदी वोट मिले और जेडीयू मात्र 17 फीसदी पर सिमट गई। जेडीयू तथा आरजेडी के मतों को मिला दिया जाए तो यह बीजेपी से 28 लाख वोट ज्यादा है, लेकिन गठबंधन न होने की वजह से बीजेपी को इसका काफी फायदा मिला था, लेकिन इस बार लाभ की स्थिति में महागठबंधन को देखा जा रहा है। बीजेपी नहीं चाहती है कि वह किसी एक को सीएम उम्मीदवार घोषित कर बाकी जातीय समूहों को नाराज करे। नेतृत्व को लेकर मची अंदरूनी खींचतान के बावजूद बीजेपी जातीय संतुलन बैठाने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है। बीजेपी की पकड़ सवर्णों के 18 फीसदी और बनियों के 7 फीसदी वोटरों पर हैं, जबकि आरजेडी-जेडीयू की पकड़ यादव (14 फीसदी), कोयरी (5 फीसदी), कुर्मी (4फीसदी) और मुस्लिम(15 फीसदी) वोटरों पर माना जाता है। इधर, कांग्रेस के पास फिलहाल कोई कोर वोट बैंक तो नहीं हैं, लेकिन 4-5 फीसदी मत को प्रभावित करने की क्षमता पार्टी में अभी भी है। बीजेपी एक तरफ रामविलास पासवान और मांझी के जरिए दलित (6 फीसदी पासवान) और महादलित (11 फीसदी) वोटबैंक को एकजुट करने का प्रयास करेगी, तो दूसरी तरफ यादव उम्मीदवारों के जरिए लालू यादव का खेल बिगाड़ेगी। बीजेपी ने अभी तक घोषित 153 उम्मीदवारों में से 65 सवर्णों को टिकट दिया है, जिसमें सबसे ज्यादा 30 राजपूत, 18 भूमिहार, 14 ब्राह्मण और 3 कायस्थ हैं। गौरतलब है कि सवर्ण वोट बैंक बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक है। इनके अलावा बीजेपी ने लालू यादव के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भी पूरी तैयारी कर ली है, यही कारण है कि यादव बहुल क्षेत्रों में बीजेपी ने 22 यादव उम्मीदवार उतारे हैं जबकि बीजेपी ने 2010 विधानसभा चुनाव में अपने102 उम्मीदवारों में से मात्र 12 यादवों के ही मैदान में उतारा था। पिछड़ों में इसके बाद 19 टिकट वैश्य को, कोइरी को 6 और कुर्मी को 3 टिकट दिया है। बीजेपी ने 14 अतिपिछड़ों को और अनुसूचित जाति के 21 उम्मीदवारों को उतारा है। बीजेपी ने इस दो मुस्लिमों को भी टिकट दिया है। पिछली बार 1 ही मुस्लिम को टिकट दिया था। बीजेपी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती। बिहार में देर-सबेर जहर का घूंट पीकर ही सही महागठबंधन में नीतीश के नाम पर सहमति बन चुकी है, लेकिन बीजेपी के पास कोई बड़ा जनाधार वाला नेता उपलब्ध नहीं है। बिहार में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सुशील मोदी, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी, राधामोहन सिंह, गिरिराज सिंह, सांसद अश्विनी चौबे,पार्टी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन जैसे नेता तो हैं ही, साथ में रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी अपने आप में मुख्यमंत्री का भविष्य तलाश रहे हैं। इसके अलावा नंद किशोर यादव, प्रेम कुमार, एसएन आर्य जैसे बिहार की राजनीति करने वाले नेता भी इशारों में बहुत कुछ कह जाते हैं। कुल मिलाकर एनडीए में सीएम के लिए एक अनार सौ बीमार वाली बात है और यह स्थिति पार्टी के लिए घातक हो सकती है। बिहार में बीजेपी किरन बेदी की तरह किसी पैरॉशूट नेता को उतारने की जोखिम नहीं ले सकती है। बीजेपी ने हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावों में बिना सीएम उम्मीदवार का नाम घोषित किए जीत दर्ज तो की, लेकिन इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर का भी महत्वपूर्ण योगदान था। दिल्ली में बीजेपी की हार को विपक्ष बिहार चुनाव में भुनाना चाहेगी यही कारण है कि जेडीयू-आरजेडी गठबंधन अरविंद केजरीवाल को इस दंगल में प्रचार के लिए उतारना चाहती है, इतना ही नहीं नीतीश द्वारा हाल ही में जारी घोषणापत्र में भी आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र की नकल नजर आ रही थी। ऐसे हालात में नरेंद्र मोदी ही एकमात्र सहारा हैं। नरेंद्र मोदी की वजह से पार्टी को अंदरूनी कलह और सीएम के नाम पर होने वाली राजनीति पर लगाम तो लग जाएगा, लेकिन सर्वे की बात करें तो इंडिया टूडे- सिसरो के सर्वे में मोदी की लोकप्रियता को घटते हुए देखा जा सकता है, यही नहीं मोदी के नाम परवोटों के ध्रुवीकरण होने की संभावना भी बढ़ जाएगी। नीतीश की सुशासन बाबू और विकास पुरुष की छवि के जरिए भी मोदी को चुनौती दी जा सकती है। यही नहीं एनडीए को अंदरूनी राजनीति से भी दो-चार होना पड़ रहा है। सीटों के बंटवारे को लेकर पार्टी के भीतर ही भीतर जंग जारी है। राज्य के 243 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसमें बीजेपी 160 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हम 20, एलजेपी 40 और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 23 पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए में किसी तरह के मतभेद से पूरी तरह इंकार किया है, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में 40 सीटें दिए जाने से रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी नाराज बताई जा रही है। हालांकि पप्पू यादव अभी एनडीए का हिस्सा तो नहीं हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं से चुनाव को लेकर उनकी कई बार मीटिंग हो चुकी है। जाहिर है अगर इन मुद्दों पर महागठबंधन ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली तो फिर स्वाभिमान को हटा परिवर्तन ला पाना मुश्किल होगा और ऐसे में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि बिहार की सत्ता पर किसका कब्जा होता है मंगलराज या मंडलराज! 
(साभार आईबीएन)
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