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भारत में समलैंगिक होना मुश्किल भरा: मार्टिना

हैदराबाद। टेनिस के इतिहास की सफलतम महिला खिलाडियों में से एक मार्टिना नवरातिलोवा ने कहा है कि भारत में समलैंगिक होना कठिनाइयों से भरा है। उन्होंने कहा कि भारत में समलैंगिकों की इसी निष्ठा से संघर्ष करने रहना पड़ेगा तभी उन्हें सामान अधिकार मिल सकेंगे। बीबीसी हिंदी से एक विशेष मुलाक़ात में मार्टिना ने कहा कि मुस्लिम देशों में भी समलैंगिक पुरुषों या महिलाओं के लिए अनेक कठिनाइयां हैं। 59 ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिताएँ जीतने वाली मार्टिना ने अपने समलैंगिक होने की बात को हमेशा गर्व से बताया था और समलैंगिकों के लिए काम करने वाली कई संस्थाओं को उनसे मदद भी मिली है। अमरीका में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिक जोड़ों की शादी को मान्यता मिलने पर भी मार्टिना नवरातिलोवा ने संतोष व्यक्त किया है। मार्टिना ने कहा कि भारत समेत कई मुस्लिम देशों में अभी भी समलैंगिकता की बात करना पाप करना समझा जाता है और कानून को बदलना ही इसका निदान है। उन्होंने कहा, "मुझे अमरीकी अदालत के फ़ैसले से बहुत संतोष मिला और ख़ुशी भी हुई, उन तमाम समलैंकिग जोड़ों के लिए जो अब चैन से जी सकेंगे। लेकिन साथ ही मुझे अभी भी दुख होता है उन तमाम जोड़ों के लिए जो बराबर के अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं"। उनका कहना था कि कई ऐसे मुस्लिम देश भी हैं जहाँ समलैंगिक होने से जान तक जोखिम में पड़ सकती हैं और सभी जगह जागरूकता बढ़ाए जाने की ज़रुरत है। मार्टिना नवरातिलोवा ने अपने करियर में 18 एकल ग्रैंड स्लैम जीते और 177 अंतरराष्ट्रीय युगल चैम्पयनशिप जीतने का रिकॉर्ड भी बनाया था। मिश्रित युगल में उन्होंने कुछ समय भारतीय टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस के साथ भी बिताया और इन दोनों ने 2003 में ऑस्ट्रेलियन ओपन और विंबलडन का खिताब भी जीता। नवरातिलोवा के अनुसार पेस के साथ खेले गए टेनिस के हर गेम में उन्हें मज़ा आया और इन दोनों की जोड़ी और धूम मचा सकती थी। उन्होंने कहा, "लिएंडर महान चैम्पियन हैं और 42 वर्ष की उम्र में वो जो कर रहे हैं वो सराहनीय है। मैंने उनके साथ खेले टेनिस के हर लम्हे का लुत्फ़ उठाया और काश कि उम्र कम रही होती तो मैं उनके साथ और खेलती"। मार्टिना अब 58 साल की हो चुकीं हैं लेकिन अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेजेंड्स टेनिस टूर में हिस्सा लेती हैं और उनकी फ़िटनेस का कोई जवाब नहीं है। उन्होंने बताया, "आज की प्रोफेशनल टेनिस में पावर यानि ताकत का बहुत इस्तेमाल होने लगा है और मैं हाल के विंबलडन फ़ाइनल में इस बात का इंतज़ार ही करती रह गई कि कोई एक स्लाइस या उम्दा वॉली कर के स्मैश मारेगा। लेकिन टेनिस ऐसा ही है और काफी आगे निकलता जा रहा है"। नवरातिलोवा के अनुसार उनके दौर में टेनिस में एक अलग किस्म का क्लास होता था जिसे आज के शक्तिशाली खेल ने पछाड़ दिया है। (साभार- नितिन श्रीवास्तव बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से)
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