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बर्न रोगियो के मसीहा बन गये हैं महेन्द्र दत्त

मुजफ्फरनगर (मनोज भाटिया)। आम तौर पर अस्पतालों में मामूली सी चोट की पट्टी के समय मरीजों को जोर-जोर से रोते हुए देखा जाना आम बात है, इसके विपरीत गंगदासपुर में भयंकर जले हुए रोगी भी पट्टी कराते समय उफ तक नहीं करते। यहां तक की भयंकंर रूप से जले हुए बच्चे भी आराम से ड्रेसिंग करा लेते हैं। डा.महेन्द दत्त बताते हैं कि ये कमाल पट्टी का घाव पर न चिपकने के कारण ही है। उनके अनुसार जलने के कारण चाहें कैसा भी घाव हो गया हो, लेकिन उनके द्वारा बांधी गयी पट्टी घाव पर चिपकती नहीं है। डा.महेन्द्र दत्त ने बताया कि उनका परिवार लगभग 65 वर्ष पूर्व बिजनौर के गांव से कुम्हैडा से आकर दिल्ली-बिजनौर मार्ग से लगभग दो किमी हटकर छोटे गांव गंगदासपुर में बस गया था। महेन्द्र दत्त का जन्म बिजनौर के ब्लाक हल्दौर स्थित कुम्हेडा में हुआ था। कुम्हेड़ा में पैदा हुए कई बच्चे भारतीय प्रशासनिक सेवा सहित अन्य मामलों में अपनी काबलियत का लोहा मनवा चुके हैं। छोटे से किसान शीशराम की पांच संतानों में एक बहन से छोटे दूसरे नम्बर की संतान बालक महेन्द्र पर गांव की उर्वरता का पूरा प्रभाव पडा। होनहार बिरवान के होत चिकने पात की तर्ज पर ही अच्छे एकेडमिक रिकार्ड के साथ महेन्द्र दत्त ने युवा होते-होते वर्ष 1967 में बीएससी कृषि की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली। महेन्द्र दत्त बताते हैं कि उनका बैच मेरठ विश्वविद्यालय (तत्कालीन नाम) अब चै.चरण सिंह विश्वविद्यालय का पहला बैच था। इसके बाद वे आर्थिक तंगी से उच्च शिक्षा नहीं ले सके ओर मजबूरन उन्हें आयुर्वेद रत्न और वैध विशारद में प्रवेश लेना पडा। उक्त परीक्षाएं भी अच्छे नम्बरों से पास की। पढ़ाई के दौरान ही वे अपने समय में प्रख्यात चिकित्सक डा.संतलाल दत्ता क्लीनिक पर सेवा किया करते थे। डा.एसएल दत्ता ही उनके सही मायनों में गुरू थे। डा.दत्ता ने युवा महेन्द्र की लगन और सेवा भाव को देखकर ही जले हुए लोगों की चिकित्सा का वो अमूल्य नुख्शा बताया था, जो अभी तक भी महेन्द्र दत्त के सीने में पैश्वस्त है। डा.महेन्द्र दत्त बताते हैं कि जब वे अपने रोगियों को स्वस्थ होते देखते हैं तो उन्हें आत्मिक शान्ति का अनुभव होता है। उन्होंने बताया कि उनके मन में कभी गुरू की दी हुई शिक्षा का व्यवसायीकरण करने का ख्याल तक नहीं आया। उन्होंने बताया कि आज उनके दो शिष्य दूर-दराज के क्षेत्र में उनकी तैयार दवाई ले जाकर बर्न रोगियों की सेवा कर रहे हैं। वे दुखी मन से बताते हैं कि जब कुछ लोगों का रवैया उनकी व्यवस्था को भंग करने की कोशिश करता है तो उन्हें बहुत दुख होता है। कभी-कभी इतनी खीज होती है कि सेवा भाव छोड़कर बर्न रोगियों का इलाज बन्द कर दूं। उनकी दृष्टि में सभी रोगियों का दर्द एक जैसा ही है। व्यवस्था बनी रहे, इसीलिए कूपन सिस्टम लागू कर रखा है। जो रोगी पहले आता है, वे अपना नाम लिखाकर अपने नम्बर का कूपन लेते हैं और अपना नम्बर आने पर ड्रेसिंग करा लेते हैं, लेकिन कुछ लोग दबाव देकर अक्सर अपने परिचित रोगी की बिना नम्बर के ही ड्रेसिंग कराने का दबाव बनाते हैं। यह व्यवहार सबसे ज्यादा तकलीफ पहुंचाता है। समय के बारे में बोर्ड पर साफ-साफ लिखा होने पर लोग उन्हें रात में भी पट्टी बांधने लिए परेशान करते हैं, जबकि पट्टी बांधने वाली दवाईयों के तैयारी के अभाव में ऐसा नहीं होता। कहा कि यदि लोगों का यही रवैया रहा तो उन्हें इलाज करना बंद करना पडेगा। ग्रामवासी बताते हैं कि उन्हें आज तक ऐसा कोई रोगी नहीं मिला, जिसने यह कहा हो कि हमें यहां आकर आराम नहीं मिला। गंगदासपुर निवासी भी बडे गर्व से बताते हैं कि डा.महेन्द्र दत्त के हुनर के कारण गांव को जिले मण्डल या राज्य में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय यहां तक अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। डा.महेन्द्र दत्त बताते हैं कि उन्होंने मुजफ्फरनगर में राजन चाट भण्डार में लगी आग में झुलसे लोगों सहित मेरठ के विक्टोरियां काण्ड के रोगियों को चंगा किया है। इसके साथ ही वे सगर्व बताते हैं कि उन्होंने सऊदी अरब के एक व्यक्ति का भी इलाज किया था। श्रीदत्त ने अपनी नेक कमाई से अपने भाईयों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया और वे आज अच्छे पदों पर कार्य कर रहे है, इसके साथ उनका इकलौता बेटा उनके साथ बर्न रोगियों की सेवा कार्य में हाथ बटा रहा है।
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