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राहुल गांधी की ताजपोशी की महाकवरेजः हर तरह के खबरों का पूरा संकलन एक जगह

ये भी पढ़ेः 'वो देश में आग लगा रहे हैं', कांग्रेस की कमान सौंपते हुए जाते-जाते राहुल को 'समझा' भी गईं सोनिया, जब राहुल गांधी ने चूमा मां सोनिया का माथा, व्यक्तिगत हमलों ने राहुल को मजबूत बनाया, सोनिया ने राजनीति नहीं छोड़ी है, सोनिया ने राजनीति नहीं छोड़ी है, कांग्रेस की बागडोर संभालने वाले नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्यस बने राहुल, सामने हैं ये चुनौतियां, सोनिया कांग्रेस को संभाल सकती हैं तो राहुल क्यों नहीं? 
नई दिल्ली। 16 दिसंबर को कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में सौंप दी गई। राहुल गांधी को केंद्रीय चुनाव प्रभार समिति के अध्यक्ष एम रामचंद्रन ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की मौजूदगी में अध्यक्ष पद का सर्टिफिकेट दिया। कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी ने बीजेपी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि देश में लगातार हिंसा का दौर जारी है और इससे पूरे देश की छवि खराब हो रही है। उन्होंने कहा, “आज प्रधानमंत्री देश को पीछे ले जा रहे हैं। हम बीजेपी के लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि एक बार आपने देश में आग लगा दी तो उसे बुझाना मुश्किल होगा।” उन्होंने कहा कि बीजेपी की हिंसा भड़काने वाली नीति को देश में सिर्फ एक शक्ति ही रोक सकती है और वे कांग्रेस का कार्यकर्ता हैं। कांग्रेस की नीति तोड़ने की नहीं, जोड़ने की हैं। बीजेपी गुस्सा करना सिखाती है और कांग्रेस लोगों से प्यार करना। इस दौरान उन्होंने बीजेपी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा, “हम बीजेपी के लोगों को भी भाई-बहन मानते हैं। वे हमें मिटाना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं सोचते। हम नफरत का मुकाबला नफरत से नहीं करते, प्यार से करते हैं।” उन्होंने कहा, “मैं देश के युवाओं से कहना चाहता हूं कि हम कांग्रेस को हिंदुस्तान की ग्रैंड ओल्ड ऐंड यंग पार्टी बनाने जा रहे हैं। मैं आपको हमारे साथ जुड़ने का निमंत्रण देता हूं। प्यार से हम क्रोध और गुस्से की राजनीति को हराएंगे।” इस कार्यक्रम में मौजूद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “आज का दिन कांग्रेस पार्टी के इतिहास में विशिष्ट है। राहुल गांधी ने देश में भय के माहौल के बीच कांग्रेस के अध्यक्ष पद की कमान संभाली है और मैं उन्हें अपनी शुभकामनाएं देता हूं। श्रीमती सोनिया गांधी ने पिछले 19 सालों से पार्टी को मजबूत नेतृत्व किया है। सोनिया जी की मजबूत लीडरशिप को कांग्रेस के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।” उन्होंने आगे कहा, “दस साल तक कांग्रेस कार्यकाल के दौरान देश के गरीबों को गरीबी से बाहर निकालने में लगातार काम किया गया और लाखों लोगों की गरीबी खत्म भी हुई।” साभार नवजीवन 
'वो देश में आग लगा रहे हैं'
कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी ग्रहण करने के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी पर क़रारा हमला बोला है. पहले अंग्रेज़ी और फ़िर हिंदी में दिए गए अपने भाषण में राहुल ने कहा, "एक बार आग लग जाती है तो बुझाना बहुत मुश्किल होता है. यही बीजेपी के लोगों को हम समझाने की कोशिश कर रहे हैं." उन्होंने कहा, "आज बीजेपी के लोग पूरे देश में आग और हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. और इसे रोकने के लिए पूरे देश में केवल एक शक्ति है और वो है कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता और नेता. वो तोड़ते हैं हम जोड़ते हैं, वो आग लगाते हैं, हम बुझाते हैं." राहुल गांधी ने कहा कि 'आज राजनीति से बहुत लोग निराश हैं क्योंकि आज इसका इस्तेमाल लोगों को मजबूत बनाने की बजाय उन्हें दबाने के लिए किया जा रहा है. आज की राजनीति पूरी तरह करुणा और सत्य से खाली हो चुकी है.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "कांग्रेस ने भारत को 21वीं सदी का देश बनाया, जबकि प्रधानमंत्री उसे पीछे मध्ययुग में ले जा रहे हैं जहां लोगों की इसलिए बर्बर हत्याएं कर दी जाती थीं क्योंकि वो दूसरों से अलग थे. पीटा जाता था क्योंकि वो अलग मान्यता रखते थे और अलग खानपान के लिए मार डाला जाता था." उन्होंने कहा, "ये घिनौनी हिंसा हमें दुनिया में शर्मिंदा करती है. इस देश का ऐतिहासिक रूप से दर्शन रहा है प्यार और संवेदना, लेकिन इस डर से उस पर धब्बा लग गया है. इस महान देश को क्षति हुई है उसे कोई भी सहानुभूति पूरा नहीं कर सकती." प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अबतक का सबसे बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि 'इस समय मोदी खुद ही पूरे देश की अकेली आवाज़ बन बैठे हैं और सारी योग्यताएं और विशेषज्ञताओं को बस एक व्यक्ति की छवि बनाने के लिए दरकिनार कर दी गई.' राजधानी दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय पर हुए एक समारोह में राहुल की ताजपोशी से पहले सोनिया गांधी ने अध्यक्ष के तौर पर अपना अंतिम भाषण देते हुए नई पारी के लिए राहुल को बधाई और आशीर्वाद दिया. कांग्रेस की विरासत पर सालों तक चली अटकलबाजी और पशोपेश के बाद अंततः राहुल गांधी को अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. सोनिया गांधी के सामने राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष चुनाव का एक सर्टिफ़िकेट दिया गया. राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने वाले नेहरू-गांधी खानदान के छठे सदस्य बन गए हैं. इस मौके पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुख्यालय के बाहर पटाखे छोड़कर और मिठाई बांटकर खुशी मनाई. कार्यकर्ताओं की खुशी का आलम ये था कि एक दफ़ा पटाखों के शोर से सोनिया गांधी को अपना भाषण बीच में रोकना पड़ा. जब कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने अपील की उसके बाद पटाखों का शोर कम हुआ और सोनिया गांधी ने अपना भाषण पूरा किया. साभार बीबीसी
जाते-जाते राहुल को 'समझा' भी गईं सोनिया
कांग्रेस की 19 साल तक कमान संभालने के बाद सोनिया गांधी ने शनिवार को कांग्रेस की बागडोर बेटे राहुल गांधी को सौंप दी। बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया का आखिरी भाषण राजनीति में उनके जीवन में आए उतार-चढ़ावों के किस्सों से भरा था। सास और पति के बलिदान और अपने संघर्ष के भावुक जिक्र से जहां वह राहुल को साहस का संदेश देती दिखीं, वहीं कांग्रेसियों को चेताया कि पार्टी के सामने जितनी बड़ी चुनौती आज है, उतनी बड़ी कभी नहीं थी। सोनिया ने बेटे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर पूरा विश्वास जताते हुए कहा कि राजनीतिक हमलों ने उन्हें और मजबूत व दृढ़ बनाया है। कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद का प्रमाणपत्र सौंपे जाने के मौके पर आयोजित समारोह में सोनिया ने भाषण की शुरुआत अपने जीवन के वाकयों के जिक्र के साथ की। सोनिया ने कहा कि राजनीति में उनकी ऐंट्री संयोगवश ही हुई थी। उन्होंने कहा, 'राजीव जी से विवाह के बाद ही मेरा राजनीति से परिचय हुआ। इस परिवार में मैं आई। यह एक क्रांतिकारी परिवार था। इंदिरा जी इसी परिवार की बेटी थी, जिस परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना धन-दौलत और पारिवारिक जीवन त्याग दिया था। उस परिवार का एक-एक सदस्य देश की आजादी के लिए जेल जा चुका था। देश ही उनका मकसद था, देश ही उनका जीवन था।' 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी ने नए अध्यक्ष की तारीफ करते हुए कहा कि वह काफी सहनशील हैं। उन्होंने कहा, 'राहुल मेरा बेटा है मैं बढ़ाई तो नहीं करूंगी लेकिन बचपन से ही हालातों ने उन्हें मजबूत और सहनशील बनाया है।' सोनिया ने स्वीकार किया कि वह अनिच्छा के साथ राजनीति में आई थीं। उन्होंने कहा, 'इंदिरा जी ने मुझे बेटी की तरह अपनाया। 1984 में उनकी हत्या हुई। मुझे ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरी मां मुझसे छीन ली गई। इस हादसे ने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल डाला। उन दिनों मैं राजनीति को एक अलग नजरिए से देखती थी। मैं अपने पति और बच्चों को इससे दूर रखना चाहती थी। लेकिन मेरे पति के कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी थी। उन्होंने कर्तव्य समझकर पीएम का पद स्वीकार किया। इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्होंने दिन-रात एक किया। उनके साथ मैंने देश के कोने-कोने का दौरा किया और लोगों की समस्या को समझा।' सोनिया ने कहा कि इंदिरा जी की हत्या के बाद सात साल ही बीते थे कि मेरे पति की भी हत्या कर दी गई। मेरा सहारा मुझसे छीना गया। इसके कई साल बीतने के बाद जब मुझे लगा कि कांग्रेस कमजोर हो रही है और सांप्रदायिक तत्व उभर रहे हैं तब मुझे पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की पुकार सुनाई दी। मुझे महसूस हुआ कि इस जिम्मेदारी को नकारने से इंदिरा और राजीव जी की आत्मा को ठेस पहुंचेगी। इसलिए देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए मैं राजनीति में आई। उन्होंने कहा कि उस समय कांग्रेस के पास शायद 3 राज्य सरकारें थीं। हम केंद्र सरकार से भी कोसों दूर थे। इस चुनौती का सामना किसी एक व्यक्ति का चमत्कार नहीं कर सकता था, इसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत से एक के बाद एक राज्यों में सरकार बनी। उन्होंने कहा कि आप सबको धन्यवाद देती हूं कि आपने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। अध्यक्षता के शुरुआती वर्षों में हमने मिलकर पार्टी को एकजुट रखने की लड़ाई लड़ी। आगे कहा कि मनमोहन सिंह ने सरकार का नेतृत्व पूरी ईमानदारी और मेहनत से किया। हमने ऐसे कानून बनाए जो जनता के अधिकारों पर आधारित थे। 2014 से हम विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। जितनी बड़ी चुनौती आज है, उतनी बड़ी कभी नहीं रही। संवैधानिक मूल्यों पर हमला हो रहा है, पार्टी हार रही है। हम डरने वालों में से नहीं है, झुकने वाले नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अब कांग्रेस को भी अपने अंतर्मन में झांककर आगे बढ़ना पड़ेगा। अगर हम अपने उसूलों पर खरे नहीं उतरेंगे तो आम लोगों की रक्षा नहीं कर पाएंगे। किसी भी तरह के त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहना पड़ेगा। सोनिया गांधी ने कहा, 'युवा नेतृत्व के आने से पार्टी में नया जोश आएगा। राहुल बेटा है, उसकी तारीफ करना मुझे उचित नहीं लगता। इतना जरूर कहूंगी कि राजनीति में आने पर उसने एक ऐसे व्यक्तिगत हमले का सामना किया जिसने उसे निडर और मजबूत इंसान बनाया है। मुझे उसकी सहनशीलता पर गर्व है। साथियों, 20 साल गुजर रहे हैं, आज इस जिम्मेदारी को छोड़ते हुए सभी कांग्रेसजनों और देश के नागरिकों द्वारा दिए गए असीम प्यार, स्नेह के लिए शुक्रिया करती हूं।  
जब राहुल गांधी ने चूमा मां सोनिया का माथा
कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के दौरान कुछ आत्मीय और भावुक पल भी देखने को मिले। सोनिया गांधी ने अपने संबोधन में सास इंदिरा गांधी और पति राजीव गांधी को याद करते हुए भावुक नजर आईं। साथ ही उन्होंने बेटे राहुल के लिए कहा कि उनकी सहनशीलता पर उन्हें गर्व है। भावुकता से भरा भाषण खत्म करने के बाद जब सोनिया अपनी सीट पर लौटीं तो राहुल खड़े होकर उनका इंतजार कर रहे थे। जैसे ही सोनिया उनके पास पहुंचीं, राहुल ने मां का माथा चूमा। कार्यक्रम में मौजूद सैकड़ों पार्टी नेता और कार्यकर्ता इस पल के गवाह बने। इसके पहले सोनिया गांधी और उनकी बेटी प्रियंका गांधी की एक तस्वीर भी काफी वायरल हुई थी। साल 2012 में एक सभा के दौरान प्रियंका प्यार से अपनी मां सोनिया के गाल खींचती नजर आई थीं। बीजेपी ने इसे 'नौटंकी' करार दिया था। साभार एनबीटी  
व्यक्तिगत हमलों ने राहुल को मजबूत बनाया
कांग्रेस अध्यक्ष के पद से मुक्त हुईं सोनिया गांधी ने शनिवार को कहा कि विरोधियों की ओर से बर्बर व्यक्तिगत हमलों से उनके पुत्र व पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी 'बहादुर और मजबूत' बने हैं. अपने पुत्र राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपते हुए सोनिया ने कहा कि नए और नौजवान नेतृत्व को पार्टी की कमान सौंपते हुए उन्हें विश्वास है कि पार्टी पुनजीर्वित होगी और जैसा हम बदलाव चाहते हैं, उस तरह का बदलाव होगा. सोनिया ने कहा, "भारत एक नौजवान देश है. आपने राहुल को अपना नेता चुना है. राहुल मेरे बेटे हैं, तो मुझे नहीं लगता कि उनकी तारीफ करना मेरे लिए उचित होगा. लेकिन मैं कहना चाहूंगी कि बचपन से ही उन्हें हिंसा के आघात को सहना पड़ा है. राजनीति में आने के बाद से उन्हें कई निजी हमलों का सामना करना पड़ा है, जिसने उन्हें और मजबूत बनाया है." उन्होंने कहा, "मुझे उसके धैर्य और ढृढ़ता पर गर्व है और मुझे विश्वास है कि वह साफ दिल, धैर्य व निष्ठा के साथ पार्टी को आगे बढ़ाएंगे." सोनिया ने याद किया कि किस तरह 20 वर्ष पहले कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पहले संबोधन में उनके हाथ कांप रहे थे. सोनिया ने कहा, "मैं यह नहीं सोच पा रही हूं कि मैंने कैसे इस ऐतिहासिक संगठन की जिम्मेदारी ग्रहण की. यह एक कठिन और कष्टदायक कार्य था, जिसे मैंने निभाया." सोनिया अपने पति व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद अनिच्छापूर्वक राजनीति में शामिल हुईं. उन्होंने कहा, "राजनीति में आने से पहले, राजनीति के साथ उनका संबंध पूरी तरह निजी था." सोनिया ने कहा, "राजीवजी से विवाह के बाद ही मेरा राजनीति से परिचय हुआ. इस परिवार में मैं आई. यह एक क्रांतिकारी परिवार था. इंदिराजी इसी परिवार की बेटी थीं, जिस परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना धन-दौलत और पारिवारिक जीवन त्याग दिया था. उस परिवार का एक-एक सदस्य देश की आजादी के लिए जेल जा चुका था. देश ही उनका मकसद था, देश ही उनका जीवन था. इंदिराजी ने मुझे बेटी के तौर पर स्वीकार किया और मैंने उनसे इस देश की संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सीखा, जिस सिद्धांत पर देश का निर्माण हुआ था." इंदिरा गांधी की हत्या के बारे में बोलते समय सोनिया लगभग भावुक हो गईं. उन्होंने कहा, "1984 में उनकी हत्या हुई. मुझे ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरी मां मुझसे छीन ली गई. इस हादसे ने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल डाला. उन दिनों मैं राजनीति को एक अलग नजरिए से देखती थी. मैं अपने पति और बच्चों को इससे दूर रखना चाहती थी." उन्होंने कहा, "लेकिन मेरे पति के कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी थी. मेरे अनुरोध के बाद भी उन्होंने कर्तव्य समझकर पद स्वीकार किया." पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "इंदिराजी की हत्या के सात वर्ष बाद ही मेरे पति की भी हत्या कर दी गई. मेरा सहारा मुझसे छीन लिया गया. इसके कई साल बाद जब मुझे लगा कि कांग्रेस कमजोर हो रही है और सांप्रदायिक ताकतें उभर रही हैं तब मुझे पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की पुकार सुनाई दी. मुझे महसूस हुआ कि इस जिम्मेदारी को नकारने से इंदिरा और राजीवजी की आत्मा को ठेस पहुंचेगी. इसलिए देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए मैं राजनीति में आई." उन्होंने कहा कि जिस समय वह कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, देश में कांग्रेस के पास तीन राज्य सरकारें थीं. "हम केंद्र से भी कोसों दूर थे. इस चुनौती का सामना किसी एक व्यक्ति का चमत्कार नहीं कर सकता था, इसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत से एक के बाद एक राज्य में हमारी सरकार बनी." उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, "आप सबको धन्यवाद देती हूं कि आपने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. अध्यक्षता के शुरुआती वर्षों में हमने मिलकर पार्टी को एकजुट रखने की लड़ाई लड़ी." साभार सहारा समय  
सोनिया ने राजनीति नहीं छोड़ी है 
सोनिया गांधी ने शुक्रवार को जैसे ही कहा कि उनके रिटायर होने का वक्त आ गया है, कांग्रेस ने साफ किया कि सोनिया गांधी ने सिर्फ पार्टी अध्यक्ष पद से अवकाश लिया है न कि राजनीति से. कांग्रेस ने कहा, "मीडिया के मित्रों से आग्रह है कि वे सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा न करें." कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया, "सोनिया गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अवकाश लिया है, न कि राजनीति से. वह अपने आशीर्वाद, अक्लमंदी और कांग्रेस की विचारधारा के प्रति स्वाभाविक प्रतिबद्धता से हमेशा हमारा मार्गदर्शन करेंगी." सोनिया गांधी ने शुक्रवार को कहा कि राहुल गांधी के शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने के साथ उनके रिटायर होने का वक्त आ गया है. समाचार चैनल एनडीटीवी ने सोनिया गांधी की ओर से एक सवाल के जवाब के तौर पर उल्लेख किया है- "मेरी भूमिका अब रिटायर होने की है." चैनल की ओर से सोनिया गांधी से पूछा गया था कि क्या वह कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन बनी रहेंगी और अब उनकी भूमिका क्या होगी. सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि उनके बेटे राहुल पिछले तीन साल से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. सोनिया पिछले 19 साल से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं. राहुल गांधी सोमवार को निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं. साभार डीडब्ल्यू  
कांग्रेस की बागडोर संभालने वाले नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्यस बने राहुल, सामने हैं ये चुनौतियां
पार्टी की लंबे समय से लंबित मांग पूरी करते हुए राहुल गांधी ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली। पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। उनके सामने 2019 के लोकसभा चुनाव के रूप में सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। 132 साल पुरानी पार्टी की बागडोर संभालने वाले 47 वर्षीय राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्य हैं। शीर्ष स्तर पर यह फेरबदल ऐसे वक्त में हुआ है, जब गुजरात विधानसभा चुनाव की मतगणना सोमवार को होने वाली है। यह समय राहुल गांधी की अग्नि परीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि गुजरात चुनाव में प्रचार अभियान की उन्होंने अगुआई की है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव बाद पार्टी को लगातार हार का समान करना पड़ा है। लेकिन इस साल हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जीत दर्ज की थी। राहुल के सामने 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव भी बड़ी चुनौती लेकर आने वाले हैं। अगले साल पहले कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं, जो उनके लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। उसके बाद लोकसभा चुनाव राहुल के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहने वाली है। राहुल गांधी के सामने खड़ी चुनौतियों में से एक चुनौती कांग्रेस में नई शक्ति का संचार करना और जान फूंकना है, जो 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से मिली हार के बाद डांवाडोल-सी नजर आ रही है। राहुल के समक्ष कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की भी चुनौती है, ताकि मोदी की अगुआई वाली भाजपा और पार्टी प्रमुख अमित शाह जैसे चुनावी रणनीतिकारों से टक्कर ली जा सके। गांधी के सामने 2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक बड़ा विपक्ष तैयार करने की भी चुनौती होगी। उन्हें मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए विभिन्न पार्टियों के समर्थन के साथ खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करना होगा। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल कांग्रेस का चेहरा रहे थे। विदेशों में अपनी कुछ लंबी यात्राओं के चलते गांधी को एक अनिच्छुक राजनेता के रूप में माना जाता था। साथ ही पार्टी प्रमुख की भूमिका में देरी, संप्रग सरकार के दोनों कार्यकाल में मंत्री पद की जिम्मेदारी नहीं संभालने और कुछ मुद्दों पर उचित तरीके से प्रतिक्रिया न करने से उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है। हालांकि बाद में मोदी और भाजपा पर उनके तेज और आक्रामक हमलों ने इस धारणा को बदला और यह दिखाया कि वे उनका सामना करने में सक्षम हैं। अपनी एक अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने थिंक टैंकों के साथ बातचीत की थी, जिससे उनकी छवि में आमूलचूल बदलाव आया। गुजरात में सफलता कांग्रेस के लिए एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाली घटना हो सकती है। गांधी एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में सफल रहे और उन्होंने मोदी को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर दिया। राहुल के सामने अन्य बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश मंआ पार्टी की खिसके जनाधार को दोबारा हासिल करने की होगी। राज्य में सबसे अधिक लोकसभा सीट (80) हैं। गांधी ने विधानसभा चुनाव में दो बार पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया, लेकिन दोनों बार असफलता ही हाथ लगी। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में अमेठी और रायबरेली में पार्टी अपनी छवि के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी थी। अमेठी और रायबरेली राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी के लोकससभा क्षेत्र हैं। कांग्रेस चुनावी रूप से सिकुड़ रही है, पार्टी अब बिहार जैसे राज्य में चौथे पायदान पर है, वहीं पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु समेत दिल्ली में वह तीसरे स्थान पर है। 2014 के बाद से विभिन्न विधानसभा चुनावों में, पार्टी तीसरे या चौथे स्थान पर रही है। पार्टी के मुख्य पक्षों में से एक दलित और अन्य पक्ष पार्टी से दूर चले गए हैं। मां के हाथों पदभार संभालने के बाद राहुल भावुक हो गए और उन्होंयने अपनी मां का माथा चूम लिया। राहुल गांधी को एक युवा नेता के रूप में पेश किया गया है, जो युवाओं की भाषा और उनकी आवाज को समझता है। लेकिन मोदी ने इस वर्ग को अपने साथ लाने में सफलता हासिल की है। युवा बड़ी संख्या में चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। कांग्रेस को मध्य वर्ग को लुभाने के तरीके भी तलाशने होंगे। ममता बनर्जी और लालू प्रसाद जैसे वरिष्ठ नेताओं का सोनिया गांधी के साथ एक सहज स्तर रहा है, अब देखना यह होगा कि क्या राहुल गांधी के साथ भी वही रहता है। राहुल गांधी के सामने पार्टी की राज्य इकाइयों में गुटबाजी को समाप्त करने और सभी को एकजुट करने की भी चुनौती होगी। राहुल के सामने कांग्रेस के पुराने नेताओं और युवा नेताओं के बीच संतुलन बनाने की भी चुनौती होगी। कांग्रेस वर्तमान में पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में सत्ता में है और पार्टी गुजरात के साथ अगले साल कर्नाटक में हारती है तो उसके लिए 2019 में वापसी करना खासा मुश्किल हो सकता है। बतौर लोकसभा सांसद राहुल का यह तीसरा कार्यकाल है, और उन्हें 2013 में पार्टी उपाध्यक्ष बनाया गया था। साभार जनसत्ता  
सोनिया कांग्रेस को संभाल सकती हैं तो राहुल क्यों नहीं?
विनोद शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं और अब उनके सामने आनेवाले समय में कर्नाटक, मिज़ोरम और मेघालय में कांग्रेस को बचाने की ज़िम्मेदारी है. ऐसे में उनके सामने कई चुनौतियां हैं. उन्हें लगातार चुनाव में ख़राब प्रदर्शन कर रही पार्टी को जीतने वाली पार्टी में बदलना है साथ ही संगठन में अपनी छवि को भी एक नया रूप देना है. राहुल गांधी की चुनौतियों के बारे में बीबीसी ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा से बातचीत की. शर्मा कहते हैं कि कठिनाइयां जब बहुत बढ़ जाती हैं तो जो इसे झेलने में जो सक्षम होता है वही अच्छा काम कर पाता है. मुश्किलों में कभी-कभी लीडरशिप उभरकर निकलती है. राहुल को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया. अब उन्हें जनता की अदालत में जाकर अपना केस जीतना है. यह किसी भी लीडर के लिए टेस्ट होता है. उनकी अध्यक्षता पर जनता की वही मुहर मानी जाएगी. राहुल गांधी को अपनी पार्टी को चुनाव में जीतने का हुनर अब सिखना पड़ेगा और पार्टी में वो शक्ति लानी पड़ेगी कि वो चुनाव जीत सके. बीजेपी की तुलना में कांग्रेस पार्टी संस्था के तौर पर बहुत कमजोर नज़र आती है. यह गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रत्यक्ष रूप से दिखा. जहां कांग्रेस और राहुल अच्छे से चुनाव लड़े. लेकिन आख़िरी मील की रेस में कांग्रेस पार्टी कितनी तेज़ भाग पायेगी, उसमें वो पिछड़ती दिखी, अगर एग्ज़िट पोल की मानें तो. हालांकि अभी नतीजे आना बाकी है. 18 तारीख़ को ही पता चल सकेगा कि राहुल के लिए आने वाले दिनों में चुनौतियां आखिरकार कितनी बड़ी हैं. ऐसा लगता था कि कांग्रेस संस्था के तौर पर तैयार नहीं है. अगर गुजरात में कांग्रेस की हार भी हाती है, लेकिन वो हारने के बावजूद अच्छे आंकड़ों से अपनी इज़्ज़त बचा लेती है तो यह राहुल की अच्छी शुरुआत होगी. राहुल के लिए पार्टी को नया स्वरूप देना, नई शक्ति देना और ज़मीन पर ऐसे कार्यकर्ता बनाना जो भाजपा के कार्यकर्ताओं को मुकाबला दे सकें सबसे बड़ी चुनौती है. अपने 132 सालों के कांग्रेस के इतिहास में और खासकर आज़ादी के बाद कांग्रेस इतनी कमज़ोर कभी नहीं थी. सोनिया गांधी जब 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बन कर आई थीं तब भी कांग्रेस बिखर रही थी, लेकिन उस समय भी संसद में ऐसी स्थिति नहीं थी. लिहाज़ा सोनिया के सामने इतनी बड़ी चुनौती नहीं थी. उन्होंने खुद ही कहा कि जब वो अध्यक्ष बनी थीं तब केवल तीन प्रांतों में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र की सत्ता से भी वो बाहर थी. लेकिन 1998 से लेकर 2004 तक कांग्रेस पार्टी केंद्र की सत्ता में आ गई. दूसरी बार भी यूपीए ने सरकार बनाई और साथ ही 21 प्रांतों में भी अपनी सरकार बना ली. क्या ये जादू राहुल गांधी दिखा सकेंगे? ये बड़ा प्रश्न है. राहुल गांधी अब कांग्रेस के नए अध्यक्ष बन गए हैं. नौजवानों की क्या राय है उनके बारे में? विज्ञान की भाषा में व्यक्तित्व परिवर्तन तो संभव नहीं है, लेकिन राजनीतिक तौर पर किसी राजनेता का नज़रिया तब बदलता है जब जनता को देखने का उसका अंदाज़ बदल जाता है. गुजरात में वो इसमें सफल हुए हैं. लोग उन्हें तन्मयता से सुनते थे. वो ऐसे मुद्दे पर बोलते थे जो लोगों के दिलों से जुड़े हुए थे. अपने प्रचार में वो जनता से जुड़े मुद्दे लगातार उठाते रहे. इसकी वजह से लोगों ने उन्हें एक नए नज़रिये से देखना शुरू कर दिया जो उनकी लीडरशिप की स्वीकृति जैसा है. अगर यह वोट में तब्दील हो जाए तो कांग्रेस के लिए अच्छा रहेगा. लेकिन अगर ये वोट में नहीं बदलता, लेकिन सीटें बढ़ती हैं तो भी आगामी चुनावों में पार्टी के मनोबल को बढ़ाएगा. राजनीति का सिद्धांत है कि किसी भी पार्टी या राजनेता को ख़ारिज नहीं करना चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी 1984 में माधव राव सिंधिया से चुनाव हार गए. वो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. 2004 में चंद्रबाबू हारे, लेकिन 2014 में वो दोबारा जीत कर आ गए. क्या कोई ये सोचता था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. वो आज की तारीख़ में कई तबकों में सक्षम प्रधानमंत्री माने जाते हैं. किसी भी नेता को यह मान लेना कि वो ख़त्म हो गया है, ग़लत होता है. साभार बीबीसी हिन्दी 
राजीव रंजन तिवारी (संपर्कः 8922002003)
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