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वेपिंग पर व्यापक अनुसंधान क्या कहता है?

इन दिनों यह चर्चा जोरों पर है कि भारत सरकार वेपिंग पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही है। इस बारे में उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय व्यापस अनुसंधान तथा विश्लेषण किए बिना लिया गया है। वेपर्स की एक एसोसिएशन अपने अधिकारों के लिए लङने के लिए मामले को न्यायालय तक लेकर भी गई है। इसका आशय सरकार को यह सूचित करना है कि उन्हें मिलकर काम करना चाहिए तथा तम्बाकू का उपयोग करने वालों को शिक्षित करना चाहिए ताकि उनका जीवन बच सके। एण्डस (इलेक्ट्रानिक निकोटिन डिलेवरी सिस्टम्स ) बैटरी-चलित उपकरण है जो प्रोपीलिन ग्लायकोल, वेजिटेबल ग्लीसरिन तथा फ्लेवर के मिश्रण को गरम कर वाष्प पैदा करता है जिसे जब संास के द्वारा अंदर लिया जाता है तो सिगरेट पीने जैसा अनुभव होता है लेकिन यह फेफडों में कैंसर पैदा करने वाले पदार्थो को प्रवेश करने से रोकता है। इसके बारे मे कतिपय धारणा है जो सिगरेट के इर्दगिर्द मौजूद है जिसने ई-सिगरेट की सम्पूर्ण अवधारणा को बदनाम कर दिया है। साठ वर्षो के विज्ञान यह सिद्ध किया है कि धुम्रपान एक अत्यधिक जोखिम भरा काम है। इसके प्रभाव से लम्बे समय से धुम्रपान करने वालों मे से लगभग आधे लोग समय से पहले मर जाएंगे। वेपिंग का विज्ञान काफी नया है, लेकिन हम यह जानते हैं कि इससे किसी गंभीर या व्यापक नुकसान की बात सिद्ध नहीं हो पायी है। निकोटिन अपने शुद्ध रूप में चाहे वह सिगरेटों में हो या ई-सिग्स या निकोटिन वाले अन्य उत्पादों मे हो उसे कैंसरजनक नहीं बताया गया है। निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एनआरटी)तथा स्वीडीश स्नस यूजर्स के दीर्घकालीन अध्ययनों यह बताया है कि निकोटिन और कैंसर के बीच कोई सत्यापनयोग्य संबंध नहीं है। धुम्रपान के कारण कैंसर तम्बाकू के जलने से होता है। इसके धुएं से एक चिपकने वाला रासायनिक घोल निर्मित होता है जिसे टार कहते हैं और टार फेफडों के नाजूक हिस्सों को ढक लेता है। कई सालों तक ऐसा होने के कारण टार से फेफडों से होने वाले नुकसान से टयुमर में वृद्धि हो सकती है। इलेक्ट्रानिक सिगरेटस परम्परागत सिगरेटों से कम से कम 95 प्रतिशत सुरक्षित है। एक अध्ययन में नेशनल हेल्थ इंटरव्यू सर्वे ( एनएचआईएस) के दो सालों (2014 तथा 2015) के आंकडों को शामिल किया गया है। हाल ही में धुम्रपान करने वाले 15,532 लोगों के नमूने (मौजूदा या वह जिन्होने 2010 को या उसके बाद धुम्रपान छोड दिया है) से पता चलता है कि 25 प्रतिशत लोग पहले धुम्रपान करते थे तथा जिन 52 प्रतिशत लोगों ने पिछले पांच साल में धुम्रपान करना छोडा वह रोजाना ई-सिगरेट पीते थे जबकि 28 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिन्होने कभी भी ई-सिगरेट का उपयोग नहीं किया था। अध्ययन के लेखक ने यह निष्कर्ष दिया कि ‘‘ सर्वे के दौरान धुम्रपान छोडने का सबसे ठोस कारण रोजाना ई-सिगरेट का उपयोग था जो यह बताता है कि कुछ लोगों ने लगातार ई-सिगरेट का उनयोग करते था या वह धुम्रपान के बदले उत्पादों का नियमित उपयोग कर रहे थे।‘‘ न्यूजीलैण्ड सरकार ने ई-सिगरेटों के उपयोग का समर्थन किया हे तथा वह 2025 तक देश को धुम्रपान रहित बनाने के अपने मिशन के अनुसरण में वेप को कानूनी रूप प्रदान करेगी। एसोसिएट हेल्थ मिनिस्टर निकी वांगर ने निकोटिन ई-सिगरेटों तथा ई-लिक्विड के विक्रय को कानूनी बनाए जाने की धोषणा की है जिसके अगले साल के अंत तक लागू हो जाने की संभावना है। उन्होने कहा कि ‘‘ ई-सिगरेटो करी सुरक्षा पर वैज्ञानिक साक्ष्य अभी विकसित हो रहे हैं लेकिन इस बारे में आम सहमति है कि वेपिंग धुम्रपान से काफी कम हानिकारक है।‘‘ इस अवसर पर आईवेपेइन के संस्थापक निलेश जैन ने कहा कि ‘‘ फिलोसफी, फार्मेकोलाजी और टाक्सिकोलाजी में मौजूदा ज्ञान के आधार पर वेपिंग के खासकर हानिकारक होने का समर्थन करने का कोई आधार नहीं है। इतना ही नहीं एण्डस के व्यवसाय पर कानूनी प्रतिबंध लगाए जाने से देश में ई-सिगरेटों की तस्करी तथा अवैध व्यापार में काफी वृद्धि हो सकती है और जिसमें मानक गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचे जाने की कोई गारण्टी नहीं होगी ।‘‘ अंत में जैसा कि राॅयल काॅलेज आफ फिजिशियन के टोबेको एडवाइजरी ग्रुप के अध्यक्ष प्रोफेसर जाॅन ब्रिटाॅन ने कहा है ‘‘ यदि ब्रिटैन के सारे धुम्रपान करने वाले सिगरेट पीना छोड दें तथा ई-सिगरेट पीना आरंभ कर दें , हम आज जीवित लोगों मे से 5 मिलियन मौतों को सुरक्षित कर लेंगे, जो कि अत्यधिक मूल्यवान है।‘‘
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