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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़्ज़त का सवाल है गुजरात विधानसभा चुनाव?

अहमदाबाद (आरके मिश्रा, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए)। गुजरात के आणंद ज़िले में अभी हाल ही में गरबा देखने के लिए एक दलित युवक को पीट पीट कर मार डाला गया. इस घटना के कुछ दिन पहले ही मूंछ रखने के लिए एक दलित युवक की पिटाई की गई थी. ये घटनाएं ऐसे समय में सामने आ रही हैं जब राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं. हालांकि ये घटनाएं गुजरात में आम हैं. यहां दलित दूल्हे को घोड़े पर चढ़कर निकलने नहीं दिया जाता. यहां तक कि नाई भी दलितों के बाल बनाने से मना कर देते हैं. अभी हाल ही में एक दलित पुलिस कर्मचारी को उसकी शादी में घोड़े पर चढ़ कर निकलने नहीं दिया गया. उना में गाय का चमड़ा निकालने वाले दलित युवकों की पिटाई की घटना के बाद इस तरह के जातीय उत्पीड़न को लेकर प्रतिरोध बढ़ा है. अभी दशमी के दिन अहमदाबाद में 300 दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. जब मूंछ रखने के लिए युवक की पिटाई की गई तो सोशल मीडिया पर मूंछों वाली तस्वीर डालने का अभियान वायरल हुआ. चुनाव जब सामने हों और ऐसी ख़बरें आने लगें तो इसका नुक़सान स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को होना ही है और ये दिख भी रहा है. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस सोशल मीडिया पर सवार होकर 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनावों में बीजेपी सत्ता तक पहुंची उसे अब इसी का डर सता रहा है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को बयान देना पड़ा कि सोशल मीडिया पर लोगों को ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है और ये सब कांग्रेस का प्रॉपेगैंडा है. अभी मंगलवार को गुजरात सरकार ने बड़े तामझाम से 'बीच टूरिज़्म' का एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया था, लेकिन वहां गिने चुने लोग मौजूद थे. मंत्री खाली कुर्सियों के सामने भाषण देते देखे गए. इस आयोजन का लोगों ने सीधे-सीधे बायकॉट कर दिया. बीते शनिवार को जब अमित शाह ने 'गौरव यात्रा' की शुरुआत की तो बीच मीटिंग में ही उन्हें पाटीदार युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ा. इन विरोधों से बीजेपी में चिंता होना लाज़िमी है. चुनाव सिर पर हैं और सत्ता विरोधी लहर भी कम नहीं है. हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात के दौरे पर आए थे. उन्होंने अपनी यात्रा द्वारका से शुरू की और चोटीला में एक पहाड़ी मंदिर की यात्रा की. अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7 और 8 अक्तूबर को गुजरात दौरे पर आ रहे हैं. वो भी द्वारका से अपनी यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं और चोटीला भी जा रहे हैं. जो पार्टी राज्य में आगे आगे चलती थी, नौबत ये आ गई है कि वो अब दूसरी पार्टी को फॉलो कर रही है! इसका मतलब है कि सत्तारूढ़ बीजेपी के ख़िलाफ़ तमाम जातियों के विद्रोह के कारण एक नाकरात्मक असर दिखाई देने लगा है. इसीलिए गुजरात में बीजेपी की मुख्य चुनावी रणनीति बन गई है वोटों में विभाजन. आम आदमी पार्टी ने तो घोषणा भी कर दी है कि वो पांच अक्तूबर से अपना चुनावी प्रचार अभियान शुरू कर देगी. ऐसा माना जा रहा है कि वो अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़गी. दूसरी तरफ़ अभी कांग्रेस से निकले शंकर सिंह वघेला पाटीदारों का कुछ वोट अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगे. गुजरात में सत्ता में फिर से वापस आने में बीजेपी के पास बस यही एक उम्मीद बची लगती है. प्रधानमंत्री मोदी के अलावा राज्य में पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर पाए. उनकी मज़बूरी है कि वो गुजरात चुनाव में हर चीज़ के साथ मोदी का नाम जोड़ें. अनुमान तो ये भी है कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आएगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बक़ायदा गुजरात में कैंप करेंगे और पार्टी इस चुनाव को उनकी इज़्ज़त के नाम पर लड़ेगी. साभार बीबीसी
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