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गुजरात की चुनावी जंग में तुलना की राजनति के अलावा और कुछ नहीं है बीजेपी के पास

अनिल चमड़िया 
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने भारत के चुनाव आयोग पर यह आरोप लगाया है कि राज्य के 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की मदद की थी। मुख्यमंत्री ने यह आरोप कांग्रेस के उस आरोप में लगाया कि 2017 में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान करने के साथ नहीं किया। पांच वर्ष पूर्व 2012 के विधानसभा के लिए चुनावों की तारीख का ऐलान एक साथ किया गया था। भारत का चुनाव आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था है। कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात की विधानसभा के चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान नहीं करने पर अपनी प्रतिक्रिया में यह कहा कि गुजरात और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वह गुजरात के विधानसभा चुनाव से पूर्व मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए कई तरह की घोषणाएं करना चाहती है। सर्वविदित है कि मतदान के लिए तारीखों का ऐलान होने के बाद चुनाव क्षेत्रों के लिए चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाती है। आचार संहिता के लागू होने के बाद सरकारों के लिए खासतौर से ये मुसीबत होती है कि वह मतदाताओं को तात्कालिक रुप से लुभाने की कोशिश नहीं कर सकती है। संसदीय राजनीति में यह एक पक्की धारणा बन गई है कि मतदाताओं की याददाश्त बेहद क्षणिक होती है। वे पुरानी बातें भूल जाते हैं और नई तरह की घोषणाएं या नई भावनाओं की उपज से प्रभावित होकर ही मतदान करती है। इसीलिए पार्टियां यह कोशिश करती है कि मतदाताओं के बीच अपने अनुकूल भावनाएं खड़ी की जाए। आचार संहिता चुनाव आयोग की ही देन नहीं है। आचार संहिता राजनीतिक पार्टियों की रजामंदी से बनी है। लेकिन जिस तरह से चुनाव को लेकर संसद में अपने द्वारा बनाए गए कानून व नियमों को राजनीतिक पार्टियां तोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती है, उसी तरह से वे किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की तर्ज पर आचार संहिता को तोड़ने की कोशिश करती है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों द्वारा नियमों, कानूनों व आचार संहिता को तोड़ने के लिए फिर भी कोशिश करनी पड़ती है।अपना तकनीकी बचाव करना पड़ता है। सत्ताधारी पार्टी का पक्ष मजबूत करने के इरादे से सरकार के लिए आचार संहिता को तोड़ने की कोशिश भी मुश्किल होती है। संसदीय राजनीति की चुनावी संस्कृति में कई तरह की विकृतियां मौजूद है और देश का संसदीय लोकतंत्र इन्हीं विकृतियों के साथ पल बढ़ रहा है। लेकिन इन विकृतियों को और बढ़ाने का प्रयास हो और इस तर्ज पर कि विपक्ष ने भी किया है तो फिर सरकार नाम की संस्था पर भी आम लोगों का भरोसा खत्म होगा। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वी एस संपत ने विजय रुपानी के आरोप का जवाब दे दिया कि 2012 के विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश की तरह ही गुजरात के लिए भी चुनाव आचार संहिता 83 दिनों के लिए लागू थी। हिमाचल प्रदेश के लिए चुनाव आयोग द्वारा चुनाव का ऐलान करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने गुजरात विधानसभा के चुनाव की तारीख नहीं घोषित करने के पक्ष में अपने तर्क दिए थे और बताया था कि किन किन वर्षों में दोनों राज्यों के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान करने के बीच कितने दिनों का फर्क था। इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि चुनाव आयोग भारत सरकार की ही संस्था है और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार वह प्रभावित होती है।लेकिन वह किसी स्वायत संस्था की तरह राजनीतिक पार्टी की पिछलग्गू नहीं हो सकती है। मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने एक तो कांग्रेस के इस आरोप को पुष्ट किया है कि चुनाव आयोग ने बीजेपी और उसकी केंद्र की सरकार के प्रभाव में हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात विधानसभा के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं किया है। लेकिन उससे भी गंभीर बात यह है कि उन्होने चुनाव आयोग के गुजरात के लिए तारीखों का ऐलान हिमाचाल प्रदेश के चुनाव के साथ नहीं करने के फैसले को इस तर्क के साथ उचित बताया है कि 2012 में गुजरात के लिए चुनाव के दौरान कांग्रेस की मदद की थी। तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार थी। मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के बजाय संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। राजनीतिक पार्टियों के बीच आपस की प्रतिद्दंदता में संवैधानिक संस्थाओं व संस्थाओं की स्वायतता की भावना को नष्ट करना यह संसदीय लोकतंत्र के ढांचे के लिए गंभीर चुनौती पेश करती है। भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक शैली लोकतांत्रिक मुल्यों व परिपाटी का हवाला देने की नहीं है। कांग्रेस के शासन के साथ तुलना की शैली उसके राजनीतिक और राजकाज का मुख्य हथियार है। आमतौर पर हम ये देख सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी व उसकी सरकारें जब भी लोकतांत्रिक मुल्यों व परिपाटी के विपरीत फैसले करती है तो वह अपने फैसलों को कांग्रेस के शासन से तुलना कर जायज ठहराने की कोशिश करती है। महंगाई बढ़ रही जब ये आरोप लगता है तो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और सरकार के मंत्री कांग्रेस के जमाने में महंगाई के आंकड़े लेकर लोगों के सामने आ जाते हैं। साम्प्रदायिक दंगे होते है तो कांग्रेस के जमाने से साम्प्रदायिक दंगों की तुलना की जाती है। गाय के नाम पर हत्या की घटनाएं हाल में बढ़ी तो अमित शाह ने ये आंकड़े पेश किए कि भीड़ के नाम पर हत्याएं पहले की तुलना में कितनी कम हुई है। राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में एक दूसरे के राजनीतिक शैली और राजकाज की उपबल्धियों से तुलना एक कारगर शैली होती है। लेकिन उसकी दिशा सकारात्मक हो तभी वह लोकतंत्र को मजबूत करती है। यदि उसकी शैली नाकारात्मक हो तो वह लोकतंत्र को खोखला करती है। राजनीतिक पार्टियां पुलिस महकमें की तरह नहीं काम कर सकती है जब कोई नया अधिकारी अपनी उपलब्धि इस रुप में दर्ज करवाता है कि उसने अपराध के आंकड़े कम किए हैं।लेकिन बीजेपी की तुलना करने की राजनीतिक शैली के लिए उसके मुख्य वैचारिक आधार की जरुर शिनाख्त की जानी चाहिए। ताजा संदर्भ में यह दिखाई देता है कि वह तुलना की अपनी शैली में सामाजिक ढांचे की तरह संवैधानिक ढांचों के लिए आवश्यक शर्तों को भी तोड़ने में हिचकिचाहट नहीं दिखाती है।लोकतंत्र के लिए कांग्रेस या किसी भी पार्टी का रहना नहीं रहना गौण है, लेकिन यह उसकी प्राथमिक शर्त है कि संसदीय चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संस्था और उस पर लोगों का भरोसा हो। भारतीय जनता पार्टी के भीतर राजनीतिक आक्रमकता लोकतंत्र के मुल्यों के विपरीत है। साभार नवजीवन 
राजीव रंजन तिवारी (संपर्कः 8922002003)
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