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चुनावों की हताशा में सड़कछाप भाषा पर उतर आए हैं मोदी, शुरु किए निजी हमले

जफर आगा 
क्या यह किसी प्रधानमंत्री को शोभा देता है कि वह सड़कछाप भाषा का इस्तेमाल करे और अपने प्रतिद्वंदियों को सरेआम बुरा-भला कहे? हरगिज नहीं। लेकिन नरेंद्र मोदी तो अलग किस्म के ही प्रधानमंत्री हैं, जो अब तक देश में हुए प्रधानमंत्रियों से एकदम जुदा है। वह न सिर्फ सड़कछाप भाषा बोलने में माहिर हैं, बल्कि अपने अपने हिसाब से तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने में भी लाजवाब हैं। उन्होंने कर्नाटक में हुई एक जनसभा में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को लगभग "बेशर्म'' की संज्ञा दे दी। मोदी ने मीडिया में पूछे गए एक सवाल पर पी चिदंबरम के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि “कल तक सत्ता में रहे लोगों ने अचानक यू-टर्न लिया है और बेशर्मी से कश्मीर की आजादी की बात उठा रहे हैं।” चिदंबरम ने कहा था कि जो लोग भी आजादी के नारे उठा रहे हैं, उन सभी को कश्मीर की आजादी नहीं चाहिए, लेकिन बहुत सारे लोगों को स्वायतता जरूर चाहिए।" मोदी बिना नाम लिए चिदंबरम पर आरोप लगाया था। इसके जवाब में चिदंबरम ने तुरंत ट्वीट पर जवाब भी दिया था कि, "प्रधानमंत्री एक अनजाने भय और भूत की कल्पना कर उस पर हमले कर रहे हैं" इसमें कोई शक नहीं कि मोदी एक अनजाने, अनदेखे भय और भूत की ही कल्पना कर रहे हैं, क्योंकि चिदंबरम कहीं भी कश्मीर की स्वायत्तता की वकालत नहीं की थी। लेकिन यह कोरी कल्पना नहीं थी। बल्कि, यह एक सोचा-समझा और खुद को एक सुपर हिंदू राष्ट्रवादी दिखाने का तयशुदा कदम था। मोदी इस जुमले के बहाने यह भी साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि कांग्रेस एक मुस्लिम परस्त पार्टी है। लेकिन सवाल वही है, कि आखिर प्रधानमंत्री ने झूठ क्यों बोला। इस समय मोदी बेहद हताश हैं और निराशा के दौर से गुजर रहे हैं। दिसंबर में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों ने उनकी नींद उड़ा रखी है। गुजरात न सिर्फ उनका गृह राज्य है, बल्कि उनका राजनीतिक आधार भी है। यहीं से उनका राष्ट्रीय राजनीति में उत्थान हुआ है। गुजरात में रहते हुए उन्होंने एक तरफ विकास के गुजरात मॉडल और दूसरी तरफ खुद की एक ऐसे कट्टरवादी हिंदू नेता के तौर पर छवि बनाई है जिसके मन में अल्पसंख्यकों के लिए दया और सहिष्णुता की कोई भावना नहीं है। इसी राज्य से उन्हें हिंदू , ह्रदय सम्राट की उपाधि भी मिली थी। मोदी की चिंता यह है कि नोटबंदी और बेतरह उलझे और परेशान करने वाले गब्बर सिंह टैक्स यानी जीएसटी ने उनके विकास मॉडल नामी गुब्बारे की हवा निकाल दी है। मोदी की आर्थिक नीतियों से भारतीय अर्थव्यवस्था सकते में है और चक्कर-घिन्नी बनी हुई है। जीडीपी दर तीन साल के निचले स्तर 5.7 पर पहुंच गई है, नौकरियां गायब हो गई हैं और युवा परेशान है। नोटबंदी नामी भूकंप से बेशुमार उद्योग धंधे और कारोबार ठप्प हो गए हैं। कृषि क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। निवेश घट रहा है। हर मानक और पैमाने पर देश की अर्थव्यवस्था बेहद बुरे दिनों से दो-चार है। ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था के साथ मोदी अपना "विकास मॉडल" नहीं बेच सकते हैं। स्मार्ट सिटीज़, बुलेट ट्रेन, हर साल करोड़ों नौकरियां, बाजारों में निवेश की भरमार, ये सारे जुमले, खालिस जुमले ही साबित हुए हैं और बीते तीन साल के मोदी राज में लोगों का अनुभव दुखदाई ही रही है। इस सबके साथ वह चुनाव कैसे जीतेंगे? ऐसे में मोदी के पास एकमात्र हथियार बचता है, और वह है हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लोगों को लड़वाकर वोटों का ध्रुवीकरण करना। मोदी को ध्रुवीकरण का मास्टर माना जाता है। हम पांच, तुम्हारे पच्चीस, अगर कब्रिस्तान की जमीन, तो श्मशान के लिए भी जमीन मिलेगी, जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर मोदी चुनाव जीतने के लिए करते रहे हैं। लेकिन, गुजरात में इस बार उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। गुजरात चुनाव जीतना अब उनके बाएं हाथ का खेल नहीं रह गया है। मोदी को उनके अपने घर में चुनौती मिल रही है और लड़ाई लड़ने में उन्हें मुश्किल हो रही है। पाटीदारों ने खुलकर बीजेपी के खिलाफ बिगुल बजा दिया है। ओबीसी नेता अल्पेश कुमार कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। दलित प्रतीक जिग्नेश मेवानी भी कांग्रेस के साथ ही खड़े हैं। राहुल गांधी की रैलियां में लाखों की तादाद में भीड़ आ रही है। ये सारे लक्षण मोदी की परेशानी का कारण हैं और चिंता की लकीरें उनके माथे पर साफ नजर आ रही हैं। गुजरात जीतने के लिए उन्हें सभी हथकंडे अपनाने होंगे। इसीलिए वे अपने आजमाए हुए फार्मले, ध्रुवीकरण को ही सामने रख रहे हैं। और इस फार्मूला का आख्यान एक ही है, ‘मैं सबसे बड़ा हिंदू हूं और कांग्रेस सिर्फ मुसलमानों के हित देखती है।’ तो क्या विकास के किसी वायदे के बिना सांप्रदायिक कार्ड चल पाएगा? चुनाव नतीजे इसका जवाब दे देंगे। लेकिन निराशा के सारे लक्षण मोदी में दिख रहे हैं। सत्ता में बने रहने के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। ऐसे में गुजरात और हिमाचल में आखिरी वोट पड़ने तक आप उनके मुंह से अभी और भी बहुत सारे नए-नए जुमले सुन सकते हैं। साभार नवजीवन
गुजरात में कांग्रेस के करीब आए हार्दिक पटेल 
पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल और गुजरात कांग्रेस के अहम नेताओं के बीच अहमदाबाद स्थित गुजरात कांग्रेस मुख्यालय में सोमवार को बैठक हुई. दोपहर में इस बैठक के बाद हार्दिक पटेल राजकोट गए और वहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत काफ़ी साकारात्मक रही. पटेल ने जानकारी देते हुए कहा, "कांग्रेसी नेताओं के साथ चार मुद्दों पर बातचीत हुई. अगर गुजरात में कांग्रेस सरकार आई तो पाटीदारों के ख़िलाफ़ चल रहे मामले सरकार वापस ले लेगी." "विरोध प्रदर्शन में जिन लोगों की मौत हुई है, उन्हें सरकार 35 लाख रुपये का मुआवजा देगी और पाटीदारों को संविधान सम्मत आरक्षण मिल सके, इसके लिए एक आयोग का गठन किया जाएगा और इसके लिए 2000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया जाएगा." हार्दिक पटेल ने ये भी बताया कि आरक्षण वाले मुद्दे पर अगले दो-तीन दिन के अंदर एक बैठक और होगी और उसमें इस मामले की तकनीकी पहलूओं पर बात होगी. हार्दिक पटेल के कांफ्रेस के बाद गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने प्रेस कांफ्रेंस कर कांग्रेस पर निशाना साधा. नितिन पटेल ने कहा, "पाटीदार नेताओं और कांग्रेस के बीच जिन मुद्दों पर बात हुई है, उन पर सरकार पहले से ही काम कर रही है. बीजेपी सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण दिया है. विरोध प्रदर्शन में मारे गए 12 लोगों को हमलोगों ने 20-20 लाख रुपये का मुआवजा दिया है." नितिन पटेल ने ये भी कहा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान आम लोगों पर हुए अत्याचार की जांच के लिए जांच आयोग बिठाया है. नितिन पटेल ने ये भी कहा कि कांग्रेस की तीन सरकारों, चिमन भाई पटेल, माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह चौधरी की सरकारों के वक्त भी अलग अलग विरोध प्रदर्शन हुए थे, उस दौरान हुए अत्याचारों की बात कोई नहीं कर रहा है. हार्दिक पटेल ने कांग्रेसी नेताओं के साथ हुई मुलाकात के बाद ये भी कहा कि पाटीदारों पर हुए दमन की जांच के लिए कांग्रेस सरकार में आने पर जांच आयोग का गठन भी करेगी. साभार बीबीसी
राजीव रंजन तिवारी (संपर्कः 8922002003)
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