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सरकार क़र्ज़मा़फी के नाम पर किसानों के साथ मज़ाक़ कर रही है

संतोष भारतीय 
ये तो शुरू से मालूम था कि भारतीय जनता पार्टी अभी ही नहीं, अपने पहले अवतार जनसंघ से लेकर मोदी जी के अवतार तक अपनी प्राथमिकता में किसानों को कहीं नहीं रख रही है. किसान उसके लिए एक ऐसा बच्चा है, जो अनचाहा पैदा हुआ है और जिसे उसे जबरदस्ती पालना पड़ रहा है. चुनाव जीतने के लिए तो भारतीय जनता पार्टी किसानों की दुहाई देती है, लेकिन उनके लिए कुछ करने की कोई योजना न भारतीय जनता पार्टी की है, न भारतीय जनता पार्टी की सरकार की है और न उन राज्यों की है, जहां भाजपा की सरकारें हैं. दरअसल ये बहुत दुख के साथ लिखना पड़ता है कि किसानों ने 2014 के चुनाव में इस आशा में केन्द्र सरकार को दोनों हाथों से भर-भर कर वोट दिए, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि उन्हें लागत से डेढ़ गुना ज्यादा फसल की कीमत मिलेगी और इसे सरकार सुनिश्चित करेगी. उस समय किसानों को नहीं मालूम था कि जिस एक शब्द ‘जुमला’ का प्रचलन अमित शाह ने कर दिया है, ये भी जुमला साबित होगा. पंद्रह से बीस लाख रुपए हरेक के बैंक खातों में देने का वादा नरेन्द्र मोदी ने किया था, जिसे अमित शाह ने कहा था कि वो सिर्फ एक जुमला था. जुमला यानी झूठ. क्या वैसा ही झूठ किसानों को उनकी फसल की डेढ़ गुनी कीमत देने के वादे के रूप में किया था. यह सरासर झूठ था, क्योंकि उसका कोई रास्ता, कोई चर्चा, कोई योजना दिखायी नहीं पड़ती. अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रधानमंत्री ने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग में कर्ज माफी का फैसला होगा. कैबिनेट की पहली मीटिंग कुछ दिनों तक टली, सरकार का काम चला, लेकिन जब औपचारिक बैठक हुई तो उसमें किसानों की कर्ज माफी की घोषणा हुई. एक लाख तक के कर्ज को माफ करने की घोषणा योगी सरकार ने की, लेकिन इस घोषणा पर अमल के लिए यह कहा गया कि बजट का इंतजार करना चाहिए. लोगों ने बजट का भी इंतजार किया और अब, जब इसकी सच्चाई सामने आ रही है तो लोगों के होश गायब हैं. किसानों को लग रहा है कि उन्हें तमाचे पर तमाचे नहीं, बल्कि जूते पर जूते लग रहे हैं. .उत्तर प्रदेश के किसानों को ये भी लगता है कि जैसा उत्तर प्रदेश में हो रहा है, वो बिना प्रधानमंत्री मोदी की सहमति के नहीं हो रहा है. इसमें अरुण जेटली का वित्त मंत्रालय शामिल है, केन्द्र की सरकार शामिल है और उत्तर प्रदेश की सरकार उनकी राय से संभवतः ये सारे काम कर रही है. इस समय एक लाख रुपए तक फसलों के कर्ज को माफ करने के आदेश पर अमल के लिए हर जिले में कर्ज माफी के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं. अब इस कर्ज माफी की हकीकत किसानों के दुखों का मजाक उड़ा रही है और उन्हें सर पीटने के लिए मजबूर कर रही है. पश्चिमी यूपी में अधिकारियों और बैंकों के गणित ने एक लाख की जगह बागपत के किसान के सिर्फ आठ पैसे और बिजनौर के किसान के सिर्फ नौ पैसे ही माफ किए हैं. 50 और 100 रुपए माफ होने वाले किसानों की सूची बहुत लंबी है. किसान उसको लेकर परेशान हैं और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. खुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने लगभग दस दिन पहले किसानों की कर्ज माफी स्कीम के तहत सर्टिफिकेट बांटने की शुरुआत की थी. एक लाख रुपए तक के कर्ज माफी के सर्टिफिकेट लेने गए काफी किसानों के होश तब उड़ गए, जब किसी को पांच सौ तो किसी को 100 और पचास रुपए माफी की जानकारी मिली. किसान अब इस मामले की जांच की मांग कर रहे हैं, लेकिन किससे जांच की मांग कर रहे हैं? उसी से जांच की मांग कर रहे हैं, जिसने उन्हें इस तरह का धोखा दिया है. बिजनौर का उदाहरण लें, तो यहां 14188 किसानों का कर्ज माफ होना है. पहले फेज में पांच हजार छब्बीस किसानों को सर्टिफिकेट दिए गए. कई किसानों को सिर्फ 100 रुपए तो कई किसानों को सिर्फ 10 रुपए, 38 रुपए माफी के सर्टिफिकेट मिले. 114 किसानों का एक लाख तक का कर्ज जरूर माफ हुआ. एक किसान ने 60 हजार का कर्ज लिया था लेकिन सर्टिफिकेट में सिर्फ 18 रुपए ही माफ हुए हैं. एक हजार से कम कर्ज माफ वाले किसानों की तादाद करीब 23 है. इनमें नौ पैसे से लेकर 377 रुपए तक की कर्ज माफी वाले किसान भी शामिल हैं. नगीना के किसान बलिया के नौ पैसे, बास्टा के चरण सिंह 84 पैसे, आकूके रामधन के दो रुपए, अफजलगढ़ के भागेश के छह रुपए, भंडवार के हीरा के तीन रुपए, नजीमाबाद बैंक चौक के जसवंती के 21 रुपए, हीरकपुर के दयाराम के 91.52 रुपए, नाटौर की पद्मा देवी के 115 रुपए, धामपुर के बलजीत सिंह के 126 रुपए, कीरतपुर के दौलत सिंह के 377 रुपए माफ हुए हैं. इतनी बड़ी रकम सरकार ने माफ कर दी, इसके लिए सरकार को शाबाशी दी जाए या किसानों के दुर्भाग्य को या उस झूठ को, जो झूठ उत्तर प्रदेश के चुनाव में कर्ज माफी के नाम पर किसानों से बोला गया. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे जिले बागपत में भी किसानों के आठ पैसे तक ही माफ हुए हैं. लोहारा के किसान सतपाल के 12 रुपए, कांटा के धीरज के 14.38 पैसे, फैजपुर कराना के तिरपाल सिंह के आठ रुपए, हिसाबदा के सौराज सिंह के 156.61 रुपए, नैथला के महेश के 20.66 रुपए, पाली के तेजपाल सिंह के 959 रुपए माफ किए गए. इसी तरह किसान इनामुद्दीन के केनरा बैंक शाखा पुसार अड्‌डा में आठ पैसे, सुरेश पाल सिंह के सिंडिकेट बैंक अकाउंट में छह रुपए, हिरन गांव के पंजाब एंड सिंध बैंक के अकाउंट में छह रुपए, हरा गांव के बाबर सिंह के नौ रुपए, सतपाल के 12 रुपए कर्ज माफ हुए हैं. 50 रुपए तक के कर्ज माफ होने वाले करीब 22 किसान हैं. अब सवाल यह है कि ये किस्से सिर्फ इन्हीं दोनों जिलों के हैं है या लगभग हर जिले के हैं. हमारी जानकारी के हिसाब से उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में यही हालत है. तो हम क्या मानें, क्या ये अधिकारियों की चालाकी है या बैंक अधिकारियों के आंकड़ों का खेल है या सरकार जान-बूझकर वोट लेने के बाद किसानों को जूते पर जूते लगा रही है. सच्चाई क्या है? उत्तर प्रदेश सरकार इस मसले पर खामोश है. न कृषि सचिव कुछ बोल रहे हैं, न मुख्यमंत्री कुछ बोल रहे हैं और न सूचना विभाग कुछ बता रहा है, बस कर्ज माफी के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं. इसका प्रचार हुआ, लेकिन कितने के सर्टिफिकेट दिए गए, इस बात को उत्तर प्रदेश सरकार गोल कर गई है. इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसा मजाक, ऐसा झूठ, ऐसा धोखा, इसके पहले किसानों के साथ कभी नहीं हुआ. उसपर तुर्रा ये कि कभी मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री, कभी किसी दूसरे राज्य के कृषि मंत्री, कभी भाजपा के सांसद अक्सर बातचीत में कह देते हैं कि किसानों द्वारा आत्महत्या किया जाना एक फैशन है और कर्ज माफी की मांग विरोधी दलों की साजिश है. अगर विरोधी दलों की साजिश थी या किसान, कांग्रेस या समाजवादी पार्टी की साजिश थी, तो भारतीय जनता पार्टी को ऐसा वादा चुनाव में करना ही नहीं चाहिए था कि एक लाख रुपए तक के कर्ज को सरकार आते ही माफ कर देगी. हम ये तो नहीं कहते कि आगे से झूठ बोलना बंद हो जाएगा, पर दुख जरूर होता है, जब वही सरकार खुद को वोट देने वाले किसानों के साथ एक बेहूदा और भद्दा मजाक करती है. क्या इसकी जिम्मेवारी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की है? उन्हें जरूर पता होगा कि कर्ज माफी के नाम पर किस तरह के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं. अगर उन्हें नहीं पता तो इसका मतलब मुख्यमंत्री कार्यालय सही ढंग से काम नहीं कर रहा है और अगर उन्हें पता है और वो चुप हैं तो फिर वो इस साजिश में शामिल हैं या ये केन्द्रीय सरकार के इशारे पर हो रहा है. अफसोस की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी के किसान नेता जो अक्सर किसानों के हितों की बात करते दिखाई देते हैं वो भी इस मसले पर खामोश हैं. उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी तो बिल्कुल ही खामोश है. ये खामोशी ये बताती है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता और उनकी सरकार किसानों के साथ भद्दा मजाक करने के हमाम में पूरी की पूरी नंगी खड़ी है. साभार चौथी दुनिया
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