ताज़ा ख़बर

क्या है इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनावी नतीजों का संकेत?

इलाहाबाद (प्रदीप कुमार, बीबीसी संवाददाता)। समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में जोरदार जीत हासिल करते हुए पांच में से चार सीटों पर कब्जा जमा लिया है. समाजवादी छात्र सभा के उम्मीदवार अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव और सांस्कृतिक सचिव का पद जीतने में कायमाब रहे हैं. वहीं भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद केवल महासचिव का पद जीतने में कायमाब रही. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए अवनीश यादव ने बीबीसी से कहा, "मैं विश्वविद्यालय में लंबे समय से छात्रों के हितों के लिए काम करता रहा हूं. चाहे वो हॉस्टल की सुविधाओं का मुद्दा रहा हो या फिर कैंटीन की सुविधाओं का या फिर छात्र हित से जुड़ा कोई मुद्दा रहा हो, हम लोगों के संघर्ष को देखते हुए छात्रों ने हमें मौका दिया है." समाजवादी छात्र सभा की ओर से उपाध्यक्ष पद पर चंद्रशेखर चौधरी, संयुक्त सचिव पद पर भरत सिंह और सांस्कृतिक सचिव पद पर अवधेश कुमार पटेल जीत हासिल करने में कामयाब रहे. अवनीश यादव ने बताया, "मेरी कोशिश कैंपस में समता मूलक समाज बनाने की होगी. सबको साथ लेकर चलने की होगी. समाजवादी संकल्पों को पूरा करने की होगी." वहीं दूसरी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से महामंत्री के पद पर चुने गए निर्भय द्विवेदी बताते हैं, "केवल एक सीट पर जीतने का मतलब ये नहीं है कि परिषद का विश्वविद्यालय से सफाया हो गया है. हमारा संगठन छात्र हितों के लिए लगातार काम करता रहेगा. इस बार हम छात्रों तक अपनी बात ठीक से पहुंचा नहीं पाए." पिछले दो सालों से इस सेंट्रल यूनिवर्सिटी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कब्जा रहा था. 2015 में एबीवीपी ने पांच से चार सीटें हासिल की थीं, जबकि 2016 में परिषद के पास अध्यक्ष और संयुक्त सचिव का पद था. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार है और इलाहाबाद के दो दो नेता योगी सरकार में अहम पदों पर हैं- उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह. अवनीश यादव का दावा है कि इन दोनों नेताओं ने भी छात्रों के बीच एबीवीपी के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ. वे कहते हैं, "अध्यक्ष पद पर एबीवीपी का उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहा. महामंत्री का पद भी हमलोग कुछ ही मतों से हारे हैं. अगर हमारे संगठन के कुछ छात्रों ने इस पद के लिए निर्दलीय नामांकन नहीं किया होता तो हम पांचों सीट जीत जाते." इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नतीजे को वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अंबिकानंद सहाय महत्वपूर्ण मानते हैं. वे कहते हैं, "परंपरागत तौर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय समाजावादियों का गढ़ रहा है लेकिन बीते दो साल यहां एबीवीपी अध्यक्ष पद जीतती आ रही थी, इस बार तीसरे नंबर पर पहुंच गई है. इससे संकेत तो मिलता ही है कि हवा का रुख़ बदल रहा है." वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागेश ठाकुर इस हार पर कहते हैं, "इस हार को राज्य सरकार या केंद्र सरकार से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. विश्वविद्यालय कैंपसों में छात्र राजनीति को प्रभावित करने वाले अपने स्थानीय कारण होते हैं. वैसे हम लोग हार के कारणों की समीक्षा करेंगे और खामियों को दूर करेंगे." उधर विधानसभा चुनावों में क़रारी हार के बाद समाजवादी पार्टी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में जीत को बड़ी उम्मीद के तौर पर देख रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने छात्रनेताओं को जीत की बधाई दी है. अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "इलाहाबाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का हार्ट लैंड कहलाता है. छात्र संघ का चुनाव भले था लेकिन ये चुनाव भी तो नेशनल नेताओं के चेहरे पर ही लड़ा जाता है. इसलिए अखिलेश के लिए ये वापसी की उम्मीद से कम नहीं है." वैसे इस बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में समाजवादी छात्र सभा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने पांच पदों के लिए कुल 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे, इनमें केवल एक महिला उम्मीदवार थी. एबीवीपी की ओर से अध्यक्ष पद के लिए प्रियंका सिंह तीसरे पायदान पर रहीं. वैसे 2015 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के चुनाव में समाजवादी छात्र सभा की रिचा सिंह जीत हासिल कर अध्यक्ष बनने वाली पहली छात्रा बनीं थीं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि उनकी जीत के बाद भी छात्र संगठनों का महिला उम्मीदवारों पर भरोसा बढ़ नहीं रहा है. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के चुनावी नतीजों ने एबवीपी की मुश्किलों को बढ़ा दिया है. भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन को पिछले कुछ महीनों के दौरान जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी, जयपुर यूनिवर्सिटी, गंगटोक यूनिवर्सिटी, गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी और पंजाब यूनिवर्सिटी में हार का सामना करना पड़ा है. लगातार मिल रही हार पर नागेश ठाकुर कहते हैं, "ये सही बात है कि हमारा प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रह रहा है. लेकिन आप ये भी देखिए कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में हम इतने मज़बूत हुए हैं कि अलग अलग चुनाव लड़ने वाले लोग एकजुट होकर चुनाव लड़ रहे हैं. राजनीति में हार जीत लगी रहती है. विरोधी संगठनों की एकजुटता से हमारा प्रदर्शन मिक्स्ड रहा है, कुछ जगहों पर जीते भी हैं." नागेश ठाकुर ये भी कहते हैं कि छात्रसंघों के चुनाव, विधानसभा चुनावों और आम चुनावों से बहुत अलग होते हैं और इसलिए छात्र संघ के नतीजों से कोई आकलन नहीं लगाना चाहिए. लेकिन अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "जब जीत मिलती है तब तो केवल मोदी जी का जादू होता है, ऐसे में हार की ज़िम्मेदारी भी तो किसी की होगी." साभार बीबीसी 
राजीव रंजन तिवारी (संपर्कः 8922002003)
  • Blogger Comments
  • Facebook Comments

0 comments:

Post a Comment

आपकी प्रतिक्रियाएँ क्रांति की पहल हैं, इसलिए अपनी प्रतिक्रियाएँ ज़रूर व्यक्त करें।

Item Reviewed: क्या है इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनावी नतीजों का संकेत? Rating: 5 Reviewed By: न्यूज़ फ़ॉर ऑल