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‘आपदा के समान था नोटबंदी का फ़ैसला’

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नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा नोटबंदी के बाद जारी किए गए आंकड़ों पर विपक्षी दल सरकार को घेरने लगे हैं. विपक्षी पार्टियां नोटबंदी को आपदा के समान बता रही हैं. बुधवार को केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए आंकड़ों मंे बताया गया है कि जितनी मुद्रा बैंक द्वारा प्रतिबंधित की गई थी उसमें से लगभग 99 प्रतिशत वापिस जमा हो गई है. कांग्रेस ने मांग की है प्रधानमंत्री अपने इस कदम के लिए देश से माफी मांगें. प्रधानमंत्री ने नोटबंदी को कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक करार दिया था. कांग्रेस का कहना है कि नोटबंदी की वजह से विदेश में भारत की छवि खराब हुई है. वहीं सरकार का दावा है कि नोटबंदी के बाद टैक्स रेवेन्यू में वृद्धि दर्ज हुई है. पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिंदबरम ने कहा कि इस कदम से ना सिर्फ़ आरबीआई पर जनता का भरोसा कम हुआ है बल्कि विदेशों में भी भारत की छवि खराब हुई है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर नोटबंदी को एक 'बड़ी आपदा' करार दिया, जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने नोटबंदी को एक बड़ा घोटाला बताया है. वहीं वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि लंबे वक्त में नोटबंदी का फ़ायदा देखने को मिलेगा. उन्होंने कहा कि नोटबंदी के नतीजे उम्मीदों के मुताबिक ही आए हैं, बैंक में जमा हुआ सारा पैसा वैध नहीं हो गया है. पिछले साल 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय किया कि 500 और 1000 के नोट अर्थव्यवस्था में चलन से हटा लिया जाएंगे जो उस वक्त चलन में जारी रुपयों का 85% था. इस कदम के बाद अचानक ही देश कैश के लिए जनता परेशान हो गई. बैंक और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगने लगीं. छोटे व्यापारी, किसानों और श्रमिक वर्ग को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. आर्थिक विश्लेषक विवेक कौल ने नोटबंदी को एक ऐसे जुए की संज्ञा दी है जिसमें प्रधानमंत्री हार गए हैं. उन्होंने कहा कि आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार 15.28 खरब मूल्य के बैंक नोट इस साल 30 जून तक बैंकों में जमा करा दिए गए. इसका सीधा-सा मतलब निकलता है कि चलन से हटाए गए पैसे का 99 फ़ीसदी वापस बैंकों में लौटकर आ गया. यानी नकदी के रूप में मौजूद लगभग पूरा ही काला धन बैंकों में जमा करा दिया गया और उम्मीदों के विपरीत वो चलन के बाहर नहीं हो पाया. विवेक कौल ने कहा कि, ''जहां तक सरकार का सवाल है वे कभी भी इस फैसले को गलत नहीं मानेंगे और किसी न किसी तर्क के साथ नोटबंदी को सही साबित करने की कोशिश करेंगे.'' हालांकि कुछ विश्लेषकों ने नोटबंदी के सकारात्मक पहलुओं पर भी नज़र दौड़ाई है, जिसमें बैंकिंग सिस्टम में कैश का जमा होना शामिल है जिसकी वजह से लोन की दर नीचे आई है. मुंबई स्थित एक अर्थशास्त्री ने कहा, 'फिलहाल नोटबंदी का कोई बहुत बड़ा फायदा नहीं दिख रहा है, लेकिन इस कदम की वजह से निष्क्रिय हो चुके खाते वित्तीय तंत्र में दोबारा शामिल हुए और ऋण की दरों में भी कमी आई.' कुछ समीक्षकों के अनुसार सेंट्रल बैंक के ये आंकड़े सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाएंगे क्योंकि सरकार ने उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले नोटबंदी का फैसला लिया था और उन चुनावों में ऐतिहासिक सफलता दर्ज की थी.  
नोटबंदी पर पूरी तरह विफल रही मोदी सरकार 
वरिष्ठ अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला ने बीबीसी हिंदी के लिए लिखा है कि आरबीआई ने नोटबंदी को लेकर अपनी रिपोर्ट दी है जिसमें बताया गया है कि पिछले साल नोटबंदी के बाद सरकारी बैंकों में पांच सौ और एक हज़ार के पुराने नोटों में से लगभग 99 फ़ीसदी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए हैं. कांग्रेस ने आरबीआई की रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा है कि नोटबंदी एक बड़ी नाकामी थी, क्या पीएम इसकी ज़िम्मेदारी लेंगे. मैं इसे असफल मानता हूं. नोटबंदी का उद्देश्य काले धन को सिस्टम से बाहर करना था, अगर वो किसी न किसी रूप में बैंक में आ गया तो इसका मतलब है कि धन किसी तरह से काले धन में बदला गया है और सफेद धन बनकर बैंकिंग सिस्टम में आ गया है. ये इसकी असफलता दर्शाता है. इसलिए काले धन को रोकने की कवायद तो पूरी तरह से असफल हो गई है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि टैक्स बेज़ में बढ़ोतरी हुई, ये सही है लेकिन इसके दीर्घकालीन अर्थव्यवस्था पर क्या असर होंगे ये अलग विषय है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी का लक्ष्य नकदी पर आधारित भारत की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय ढंग से बदलाव लाना था. नकदी आधारित अर्थव्यवस्था की बात करें तो फ़ायदा तो हुआ है लेकिन मैं कहूंगा कि यदि देश में सौ ट्रांज़ेक्शन होते थे उसमें से दस डिजिटल ट्रांज़ेक्शन की तरफ़ गए हो सकते हैं लेकिन बाक़ी 90 फ़ीसदी को नकद में ही चल रहा है. जो परिस्थिति हम देख रहे हैं उसमें पुराने तरीके से बाज़ार में नकदी पूरी तरह से चल रही है. मैं समझता हूं कि लोग अभी भी नकदी का इस्तेमाल उसी तरह कर रहे हैं जैसे पहले करते थे, ऊपरी सतह पर फ़र्क पड़ा है और वो भी मामूली है. मैं ये समझता हूं काले धन को सफेद में बदलने की स्कीम तो बिल्कुल नहीं थी लेकिन सरकार की नौकरशाही सरकार के क़ाबू के बाहर है, नौकरशाही ने नोटबंदी के फ़ैसले को पलट दिया. बल्कि नौकरशाही ने अपना कमीशन लेकर काले धन को सफेद धन में बदल दिया. मैं इसे सरकार के कार्यान्वयन की नाकामी नहीं मानता हूं बल्कि सरकार की समझ की असफलता मानता हूं. क्योंकि केंद्र सरकार समझती है कि ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोक लिया तो सब ठीक हो जाएगा लेकिन सिस्टम में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार के पास न कोई सोच है, न समझ है, न कोई प्रयास है और मेरे हिसाब से इसी का नतीजा है कि नोटबंदी पूरी तरह फेल हो गई है. जब मैं पिछले दिनों कोलकाता गया तो लोगों ने बताया कि नोटबंदी से बांग्लादेश से फर्ज़ी नोट आ रहे थे और लोग फर्ज़ी नोट देकर आधार कार्ड बनवा रहे थे उसमें कमी आई है. नोटबंदी से सरकार की ये उपलब्धता ज़रूर है कि सीमा पार से नकली नोट आने में कमी ज़रूर आई है लेकिन देखने वाली बात है कि ये कब तक चलेगा क्योंकि जो लोग पुराने नोट की नकल छाप सकते थे वो नए नोटों की नकल भी छाप सकते हैं. नोटबंदी का मौलिक समाधान नहीं है बल्कि ये समस्या के लक्षणों का समाधान है, इसमें सरकार सफल रही है जिसके लिए बधाई दी जा सकती है लेकिन इससे आगे सोचने की ज़रूरत है.  
किसानों की समस्या मोदी की नोटबंदी की देन? 
राघवन जगन्नाथन ने बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए लिखा है कि किसी ख़ास नीति और उसके नतीजों के बीच की कड़ी को अलग करना हमेशा ही बहुत मुश्किल काम होता है. कारण और प्रभाव को जोड़ने का सबसे ख़राब तरीक़ा ये होगा कि हम पहले प्रभाव को देखें और फिर उसके नजदीकी कारणों से जोड़ने की कोशिश करें. 8 नवंबर, 2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट इकॉनमी में चलन से हटाने का फैसला किया था तो लोगों के पास मौजूद 86 फ़ीसदी करेंसी बेमानी हो गई. ये बताने के लिए जीनियस होना ज़रूरी नहीं था कि फैसले का असर इकॉनमी पर पड़ेगा. ख़ास तौर पर नकदी से चलने वाला असंगठित क्षेत्र और खेती-बारी भी इसकी जद में आएंगे. कुछ बातें हैं जिन पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है. जब नकदी का संकट था खेती-बारी के काम पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा. चाहे वो बुआई हो या कटाई. लेकिन तकलीफ़ देने वाली खबरें देर से आईं. जब अच्छी फसल लेकर किसान मंडी की तरफ गए तो पता चला कि क़ीमतें धड़ाम से गिर गई हैं. जिन लोगों ने फसल काटने से पहले बर्बादी की भविष्यवाणी की थी, वे ग़लत साबित हुए. वे लोग जो कह रहे थे कि रबी की बुआई के समय नोटबंदी के फैसले से उत्पादन पर असर पड़ेगा, अब ये मानते हैं कि नतीजे देर से सामने आ रहे हैं. नकदी से चलने वाली अनाज मंडियों में जब किसान अपनी बंपर फसल लेकर पहुंचे तो उन्होंने गोता लगाते बाज़ार में खुद को बेसहारा पाया. नतीजा किसानों की नाराजगी के तौर पर सामने आया. ये सबकुछ अकेले नोटबंदी की वजह से नहीं हुआ. हां, नोटबंदी इसका नजदीकी कारण ज़रूर था और बाज़ार की बर्बादी का सारा ठीकरा इसी के सिर फोड़ा गया. देश में दूध की नदी क्यों बह रही है? तो सवाल उठता है कि फसलों की गिरी हुई क़ीमतों में अकेले नोटबंदी का कितना योगदान रहा? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें नकदी के संकट के अलावा कई और वजहों की पड़ताल करनी होगी. पहली वजह तो ये है कि नोटबंदी के ठीक पहले इकॉनमी की गाड़ी लड़खड़ाई हुई थी. साल 2015-16 की आख़िरी तिमाही में इकॉनमी की ग्रॉस वैल्यू (जीवीए) के आंकड़ें 8.7 फीसदी के साथ शीर्ष पर थे, लेकिन इसके बाद से इसमें गिरावट जारी है. जीवीए किसी इकॉनमी में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का पैमाना होता है. इसमें प्रोडक्ट टैक्स जोड़ने के बाद सब्सिडी घटाने से जीडीपी के आंकड़े प्राप्त होते हैं. 2016-17 की पहली दो तिमाही में जीवीए गिर कर 7.6 फ़ीसदी और 6.8 फ़ीसदी रह गया. नोटबंदी वाली दोनों तिमाही में इसमें और गिरावट देखने को मिली और ये 6.7 फीसदी और 5.6 फीसदी रह गया. इसलिए ये कहना कि नोटबंदी से इकॉनमी की रफ्तार सुस्त हुई, ग़लत है. बल्कि ये तो 8 नवंबर से पहले ही शुरू हो गया था. नोटबंदी से पहले आई मंदी कई वजहों से थीं. इनमें दो ख़राब मॉनसून थे. बैंकों का फंसा हुआ कर्ज़ था जो फ़िलहाल सात लाख करोड़ से ज़्यादा है. कर्ज़ से लदी कंपनियां और स्पेक्ट्रम और कोयला खदानों की नीलामी से आई बड़ी रकम थी, जो मोदी सरकार के पहले दो सालों में 3.5 लाख करोड़ से ज़्यादा थी. यहां तक कि मॉरिशस, साइप्रस और सिंगापुर के रास्ते अवैध तरीके से आने वाला भारत का ही पैसा भी एक वजह था. इसे दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है. काला धन पर लगाम लगाने और प्राकृतिक संसाधन के आवंटन में करप्शन खत्म करने की मोदी सरकार की कोशिशों ने नोटबंदी के पहले ही इकॉनमी में वैध नकदी की कमी पैदा कर दी थी. प्रधानमंत्री मोदी नोटबंदी के फैसले पर खासे आक्रामक रहे हैं. इसलिए जब काला धन खत्म करने के लिए नोटबंदी की घोषणा की गई तो इकॉनमी पर कहीं ज़्यादा असर पड़ा. नई करेंसी के चलन में आने से नकदी का संकट फ़िलहाल खत्म हो गया लगता है, लेकिन इकॉनमी के सामान्य कारोबार के लिए ज़रूरी वैध नकदी की कमी अभी भी महसूस हो रही है. दूसरी वजह तो ये है कि 2016-17 के पहले मोदी सरकार महंगाई पर लगाम लगाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाती रही. इसमें वो क़ामयाब भी रही. लेकिन हकीक़त तो ये है कि 2016-17 में दी गई सरकारी रियायतों से पहले भारत ने दो ख़राब मॉनसून सीज़न देखे थे. इसलिए नोटबंदी से पहले किसानों पर कर्ज़ की रकम बढ़ी हुई थी. इसलिए पिछले बरस जब मौसम मेहरबान था तो किसान बड़े मुनाफे की उम्मीद कर रहे थे. यही वजह थी कि खरीफ की अच्छी फसल के बाद, उन्होंने रबी की बुआई के समय नकदी के संकट को नज़रअंदाज कर दिया. अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ के अनुसार लोग कैश में काला धन कभी कभार ही रखते हैं. उन्होंने फसल की बुआई के लिए उधार लिया, यहां तक कि महाजनों से भी कर्ज़ भी जुटाया. किसानों को उम्मीद थी कि खेती का अगला सीज़न भी उनके लिए फ़ायदा लेकर आएगा. लेकिन ये वो ख़्वाब था जिसे नोटबंदी के वार ने चकनाचूर कर दिया. मोदी सरकार की नाकामी को इस बात से समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव जीतते ही किसान और खेतीबारी के सवालात मोदी सरकार की नज़र से दूर हो गए. यूपी चुनावों से पहले बीजेपी ने किसानों से कर्ज़ माफ़ी का वादा किया था. इससे अंदाज़ा लगता है कि बीजेपी को नोटबंदी से किसानों पर पड़ने वाले असर का अंदाज़ा था. उत्तर प्रदेश के किसानों की 36,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसानों को गुस्सा भड़क गया और वे सड़कों पर उतर आए. इसलिए जब मंडी में फसल की क़ीमतें गिरीं तो किसानों के गुस्से का बांध टूट गया. राहत पैकेज को लेकर तमिलनाडु के कुछ किसान दिल्ली के जंतरमंतर पर धरने पर बैठे हैं. उत्तर प्रदेश में कर्ज़ माफ़ी की मांग को स्वीकार कर लेने के बाद बीजेपी के पास दूसरे राज्यों में इसे नज़रअंदाज करने की कोई वजह नहीं रह गई थी. महाराष्ट्र ने 30,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करने में बहुत देरी नहीं की. छत्तीसगढ़ ब्याज़ पर छूट दे रहा है और केंद्र सरकार चार फ़ीसदी के ब्याज़ पर किसानों को कर्ज़ की पेशकश कर रही है. दूसरे राज्यों से भी ऐसी मांगें उठ सकती हैं. गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा चुनाव हैं. बैंक ऑफ अमरीका मेरिल लिंच का अनुमान है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले 2.57 लाख करोड़ रुपये की कर्ज़ माफ़ी की जाएगी. तीसरी वजह ये हकीक़त है कि भारतीय किसानों की स्थिति बहेद ख़राब है क्योंकि फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर मामूली निवेश ही किया गया है. तमिलनाडु के किसानों ने कहा सूखे के कारण उनके साथी कर रहे हैं आत्महत्या. खेतों की जोत इतनी छोटी है कि उनमें बड़ा निवेश मुमकिन भी नहीं लगता है. पिछली कृषि जनगणना के अनुसार, देश में दो हेक्टेयर से कम ज़मीन जोतने वाले छोटे और सीमांत किसान देश के खेतीहर समाज का 85 फ़ीसदी हिस्सा हैं. ये तबका ज़्यादा अपने खाने के लिए अनाज पैदा करता है और जब ज़्यादा अनाज उत्पादन होता है और बाज़ार में बड़ी मात्रा में फसल पहुंचती है तो क़ीमतें गिरती हैं. साल 2017 में कृषि क्षेत्र की समस्याएं एक बार फिर से सतह पर आई हैं और नोटबंदी ने हालात को थोड़ा और नाज़ुक बना दिया है. भारत में किसानों को ग़रीबी के दलदल में धकेलने के लिए बड़े संकट की जरूरत नहीं होती. जहां तक नोटबंदी की बात है, इसका असर एक ख़राब सूखे से ज़्यादा नहीं हुआ होगा. दुर्भाग्य से सूखे का दोष ऊपरवाले पर डाला जाता है जबकि नोटबंदी के साथ ऐसा नहीं है. नोटबंदी का जीडीपी पर क्या होगा असर? साभार बीबीसी
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