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केन्द्र में मोदी सरकार, फिर क्यों महंगाई की ‘मार’!

लोकसभा चुनाव 2014 में देश के गली-मोहल्लों और शहरों-कस्बों तक बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिंग पर लिखा यह नारा- ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ आंखों को सुख दे रहा था। लग रहा था कि यदि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बन जाएगी तो निश्चित ही महंगाई घटेगी और जनता सुकून महसूस करेगी, पर यहां तो ठीक इसके विपरीत हो गया। यूपीए सरकार से भी ज्यादा स्पीड से इस सरकार में महंगाई बढ़ रही है 
राजीव रंजन तिवारी 
लोकसभा चुनाव 2014 में विभिन्न प्रचार माध्यमों के सहारे पूरे देश में यह संदेश दिया गया था तत्कालीन यूपीए सरकार की कथित गलत नीतियों के कारण महंगाई बढ़ रही है। आय के अनुरूप महंगाई सच में बहुत तेजी से बढ़ रही थी। जनता परेशान थी। इसी बीच पूरे देश के गली-मोहल्लों और शहरों-कस्बों तक बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिंग पर लिखा यह नारा- ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ आंखों को सुख दे रहा था। लग रहा था कि यदि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बन जाएगी तो निश्चित ही महंगाई घटेगी और जनता सुकून महसूस करेगी। पर यहां तो ठीक इसके विपरीत हो गया। यूपीए सरकार से भी ज्यादा स्पीड से इस सरकार में महंगाई बढ़ रही है। पब्लिक परेशान है। तबाह है। पर उसकी कोई सुनने वाला नहीं। हर तरफ हाहाकार जैसी स्थिति महसूस की जा रही है, फिर फिर देश के आला नेता अपनी धुन में मस्त हैं। इतना ही नहीं, अब यह सवाल भी किया जाने लगा है कि आखिर मोदीजी की सरकार में महंगाई क्यों बढ़ रही है, जबकि उन्होंने महंगाई न बढ़ने देने के मुद्दे पर पर पब्लिक में अपनी लोकप्रियता हासिल कर सत्ता पाई थी। महंगाई को लेकर जिस तरह के खुलासे धीरे-धीरे हो रहे हैं, वह चिंताजनक है, पर इससे सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको बता दें कि 01 जुलाई से से पूरे देश में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लगाने के पीछे तर्क रहा है कि इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें घटेंगी। मगर इसके शुरुआती चरण में ही महंगाई पिछले पांच महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। हालांकि अनेक आम उपभोक्ता वस्तुओं पर करों की दर काफी कम रखी गई है, इसके बावजूद खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं। इस तरह क्यों हो रहा है, इस पर ध्यान देने के बजाय सरकार अन्य कार्यों में लिप्त है। कहा जा रहा है कि जीएसटी का शुरुआती चरण होने की वजह से बहुत सारे खुदरा कारोबारी भ्रम में हैं और वे अपने ढंग से वस्तुओं की कीमतें बढ़ा कर बेच रहे हैं। पर थोक मूल्य सूचकांक में महंगाई की दर बढ़ कर 3.36 पहुंच गई, तो यह केवल भ्रम के चलते नहीं हुआ है। रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले फलों और सब्जियों की कीमतें बढ़ी हैं, खानपान, तैयार भोजन पर करों की दोहरी व्यवस्था के चलते भी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि केंद्रीय कर प्रणाली लागू होने के बाद भी अगर महंगाई पर काबू नहीं पाया जा पा रहा, तो इससे पार पाने के लिए सरकार को कड़े उपाय करने चाहिए। पब्लिक की मूलभूत जरूरतों में पेट्रोल-डीजल भी शामिल है। लेकिन इन पेट्रो उत्पादों में बढ़ती महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। इससे केंद्र सरकार को आलोचना झेलनी पड़ रही है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सत्तारूढ़ बीजेपी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर इन दिनों कुछ तथ्यों को रखकर सफाई पेश कर रहे हैं। केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेट्रोल की बढ़ी कीमतों को लेकर कई ट्वीट्स किए हैं। उन्होंने लिखा है कि जापान, स्विटज़रलैंड, सिंगापुर, यूके, जर्मनी, फ्रांस समेत 68 देशों में भारत के मुकाबले पेट्रोल की कीमत ज़्यादा है। ऐसे ही कुछ आंकड़े बीजेपी के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से पेश किए गए, जिनका लब्बोलुआब ये कि पेट्रोल की कीमतें सिर्फ भारत में नहीं बढ़ रही हैं या भारत में पेट्रोल की कीमतें कम बढ़ रही हैं। कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान ने जिन देशों के पेट्रोल कीमतों को भारत की तुलना में ज्यादा महंगा बताया है, वो आंकड़े तो सही हैं लेकिन अधूरे हैं। प्रधान ने पेट्रोलियम आंकड़े मुहैया कराने वाली वेबसाइट 'ग्लोबल पेट्रोल प्राइस' के हवाले से भारत के मुकाबले बाकी देशों में पेट्रोल महंगा बताया था। प्रधान ने जिस लिस्ट को ट्वीट किया था, अगर उस पर ही नज़र दौड़ाएं तो जिन देशों में पेट्रोल महंगा है, उनमें भारत 100वें नंबर पर है। यानी 99 ऐसे देश हैं, जिनमें भारत के मुकाबले पेट्रोल सस्ता है। धर्मेंद्र प्रधान ने सस्ते पेट्रोल उपलब्ध कराने वाले देशों में जिन 99 देशों का ज़िक्र नहीं किया, उनमें भारत के सारे पड़ोसी देश शामिल हैं। यानी भारत को छोड़ दिया जाए तो पड़ोसी देशों में पेट्रोल के दाम कम हैं। पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर 2014 में यूपीए पर चुनावी प्रहार कर सत्ता में आने वाली बीजेपी इन दिनों घिरी नज़र आती है। क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने ही नारा दिया था बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार। लोग पूछ रहे हैं कि उन नारों का क्या हुआ? दरअसल, जीएसटी लगने के बाद महंगाई न सिर्फ तेजी से बढ़ी है बल्कि विकास दर भी नीचे आई है। जाहिर है, जीएसटी लगने से उत्पादन और विपणन के स्तर पर कमी आई है। नोटबंदी के फैसले के बाद अनेक कारोबार पहले ही प्रभावित हो चुके थे। फिर जीएसटी के बाद अधिकांश कारोबारियों के लिए पंजीकरण कराना और उसके मुताबिक आधुनिक तकनीकी प्रणाली से खुद को जोड़ना टेढ़ी खीर बन गया। सरकार थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई का स्तर नापती है, जबकि खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें उससे कई गुना अधिक होती हैं। इसी क्रम में पेट्रोल और डीजल के दाम में भारी बढ़ोतरी से साफ है कि आम आदमी पर महंगाई का एक और कोड़ा पड़ेगा। पेट्रोल की कीमत अस्सी रुपए लीटर तक पहुंच गई है। यह तब हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम न्यूनतम स्तर पर हैं। जुलाई 2014 में, जब मोदी सरकार सत्ता में आई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल था, जो अब आधे से भी नीचे यानी चौवन डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है। फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इतनी बढ़ोतरी क्यों हो रही है, यह समझ से परे है। पेट्रोलियम मंत्री ने साफ कर दिया है कि सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती, सब कुछ तेल कंपनियों के हाथ में है। उनकी इस बात से साफ है कि पेट्रोल और डीजल के दामों पर काबू पाने में सरकार ने पूरी तरह हाथ खड़े कर दिए हैं और आम आदमी को तेल कंपनियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। बल्कि पेट्रोलियम मंत्री ने यह और कह दिया कि जीएसटी परिषद अब पेट्रोलियम उत्पादों को भी जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार करे। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने के बाद जिन वस्तुओं के सस्ता होने की उम्मीद थी, वे अभी तक महंगी मिल रही हैं। अगर पेट्रोलियम उत्पाद जीएसटी के हवाले हो गए तो दाम तय करने की क्या व्यवस्था होगी, स्पष्ट नहीं है। सवाल है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल फिलहाल अगर चौवन डॉलर प्रति बैरल है तो पेट्रोल अस्सी रुपए लीटर क्यों बिक रहा है। दरअसल, इसके पीछे करों का खेल है। केंद्र और राज्य अपनी जेबें भरने के लिए जम कर उत्पाद शुल्क वसूल रहे हैं। पिछले तीन सालों में ग्यारह बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया। यानी डीजल पर तीन सौ अस्सी फीसद और पेट्रोल पर एक सौ बीस फीसद तक यह कर बढ़ा। इसके अलावा मूल्य वर्धित कर (वैट) की मार अलग से है। अगर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत लाया जाएगा तो उस पर अधिकतम टैक्स 28 प्रतिशत ही लगेगा क्योंकि जीएसटी के तहत सभी उत्पादों पर पांच, 12, 18 और 28 प्रतिशत दर से टैक्स लिया जाता है। अगर सरकार पेट्रोल पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाती है तो आम जनता को करीब 38 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिल सकता है। अगर केंद्र सरकार पेट्रोल पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाती है तो आम जनता को 40.05 रुपये प्रति लीटर मिलेगा। अगर पेट्रोल पर 28 प्रतिशत जीएसटी लगता है तो इसकी कीमत 43.44 रुपये प्रति लीटर होगी। अगर केंद्र सरकार पेट्रोल पर जीएसटी के अलावा अतिरिक्त कर (सेस) लगा दे तो इसकी कीमत इन अनुमानित कीमतों से दो-चार रुपये अधिक हो सकती है लेकिन उस स्थिति में भी पेट्रोल वर्तमान दर से करीब 20 रुपये कम बिकेगा। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि क्या ऐसा होगा? कुल मिलाकर सरकार की कथनी-करनी में पब्लिक को बेचैन कर रही है, जिसका जवाब सरकार को जरूर मिलेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित स्तम्भकार हैं)
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