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देश के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने जनता को समझाया आंदोलन का तरीका, आप भी पढ़ें और समझें

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 26 जुलाई को उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षामित्रों को शिक्षक के तौर पर नियुक्त करने का पूर्ववर्ती यूपी सरकार का फैसला रद्द कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद शिक्षामित्र मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार से नया कानून बनाकर उन्हें बहाल करने की मांग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों को राहत देते हुए कहा था कि उन्हें तत्काल नहीं हटाया जाएगा। उन्हें लगातार दो प्रयासों में शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करने का मौका दिया जाएगा। सर्वोच्च अदालत ने ये भी कहा कि राज्य सरकार चाहे तो शिक्षामित्रों को उम्र एवं आवश्यक अध्यापन अनुभव में छूट दे सकती है। उत्तर प्रदेश में एक लाख 70 हजार से ज्यादा शिक्षामित्र हैं। 1999 में राज्य सरकार ने 12वीं पास लोगों को प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षामित्र के तौर पर नियुक्ति की शुरुआत की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन शिक्षामित्रों को नियमित शिक्षक बनाए जाने को गैर-कानूनी माना था। शिक्षामित्र अदालत के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डालने वाले हैं। सरकार, अदालत के अलावा वो मीडिया से भी सहयोग की मांग कर रहे हैं। कई शिक्षामित्र टीवी पत्रकार रवीश कुमार को फोन करके उनसे इस मुद्दे को अपने कार्यक्रम में उठाने की अपील कर रहे हैं। रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट लिखकर इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है।
पढ़िए रवीश कुमार की पोस्ट 
यूपी के शिक्षामित्रों सुनिये मेरी भी बात, सुबह से यूपी के शिक्षा मित्रों ने मेरे फोन पर धावा बोल दिया है। मेरा एक तरीका है। जब अभियान चलाकर दबाव बनाने की कोशिश होती है तो मैं दो तीन महीने रूक जाता हूँ। स्टोरी नहीं करता। मैं समझता हूं आपकी पीड़ा और परेशानी। कुछ साथियों के आत्महत्या करने की ह्रदयविदारक ख़बर देखी है। विचलित भी हूँ। सोच भी रहा था कि कुछ करता हूँ। अकेला आदमी हूं विषय को पढ़ने समझने में न्यूज की डेडलाइन जैसी पात्रता ख़त्म हो जाती है फिर भी ध्यान में था ही। बात ये है कि किस हक से फोन पर धावा बोला गया? क्या मुझे शिक्षा मित्रों ने सांसद चुना है? विधायक चुना है? जिनको चुना है उनसे क्यों नहीं पूछते पहले। मैंने तो नहीं देखा इनमें से कभी किसी को मेरे लिए बोलते हुए। बल्कि ज़्यादातर गाली ही देते होंगे या जब गालियों से मुझे धमका कर चुप कराया जा रहा था तब चुप रहते होंगे। इस तरह से आप जनता ने ही पहले इस लोकतंत्र को कमज़ोर किया। सरकार से पूछने पर जब आप मुझे कमज़ोर करेंगे तो जब आप सरकार से पूछेंगे तो आपको कोई कमजोर कैसे नहीं करेगा। पूरा जीवन लगाकर मैं यही कहता रहा कि सरकार चुनने के बाद मतदाता बन जाइये। किसी चिरकुट का फैन मत बनिये। न पत्रकार का न नेता का। आप किसी नेता का फैन बनकर खुद का विलय सरकार और विचारधारा में करेंगे तो जनता नहीं रह जाएंगे। आपका जनता के रूप में सरकार पर प्रभाव और दबाव ख़त्म हो जाता है। जैसे ही आप सरकार के समक्ष खड़े होंगे, आपको अल्पसंख्यक बना दिया जाएगा। अल्पसंख्यक होना धर्म से मुसलमान या सिख होना नहीं है। यह प्रक्रिया है उस आवाज़ को कुचलने की, जो अपनी मांग को लेकर सरकार के सामने खड़ी होती है। बार-बार कहा मगर आप या आप जैसे लोग नहीं माने। गाय बकरी को लेकर जनता तेज़ी से जनता होने की अपनी पहचान छोड़ कर पार्टी विचारधारा में समाहित होती चली गई। जनता अल्पसंख्यक बनती चली गई। इसी के लिए अब विचारधारा की सरकार का मॉडल चलाया जा रहा है। पार्टी और सरकार की विचारधारा एक हो गई है। इस मॉडल में जनता के पास विचारधारा से अलग होने का अवसर नहीं रहता। गुजरात में जब पटेल समाज को पुलिस ने पीटा तो बाकी जनता इसलिए चुप रही कि विचारधारा की सरकार कमज़ोर न हो जाए। पटेल के पैसे और समर्थन से भाजपा ने राज ज़रूर किया मगर वे पुलिस से इसलिए पीट गए क्योंकि वे जनता नहीं रहे। वो पीटने के बाद भी विचारधारा में ही रहेंगे। जैसे ही आप मेजारिटी की ताकत कायम करते हैं, माइनॉरिटी बन जाते हैं। इसलिए सूरत के कपड़ा व्यापारियों का आंदोलन बड़ी संख्या के बाद भी संघर्ष का मनोरंजन बन गया और बेअसर रहा। वो विरोध की जगह भजन करने लगे। सविनय अवज्ञा की जगह अनुनय-विनय करने लगे। आप समझते हैं कि हिंदू हिंदुत्व के लिए गोलबंद हो रहे हैं लेकिन असलीयत में आप जनता होने की पहचान खो रहे हैं। जब जनता अपनी हैसियत खो देती है तो सरकार को अथॉरिटेरियन बनने की छूट मिल जाती है। सेवक सेवक बोल कर सरकार मास्टर हो जाती है। पिछले तमाम आंदोलन और आवाज़ की यही हालत हुई है। सूरत के कपड़ा व्यापारी हों या मंदसौर के किसान या यूपी के शिक्षा मित्र। सब लड़कर थक गए मगर मिला कुछ नहीं। मेरे पास कोई सीएमओ पीएमओ नहीं है। अकेले ही आपके फोन उठाता हूँ, रोज़ बीस पत्रों के जवाब देता हूं और इतने ही पत्र पढ़ता हूँ। गोदी मीडिया का विज्ञापन भकोस कर आपने मुझे और सवाल पूछने की पंरपरा को कमज़ोर होने दिया। जब आपकी बारी आई तो कोई मीडिया आपके लिए नहीं है। यह कैसा समाज है कि लोग मुझ पर हंस रहे हैं कि अब तुम्हारी नौकरी चली जाएगी? आप क्यों तब चुप रहते हैं? मैं आपके मसले को समझने में लगा हूँ । मैं ही उम्मीद हूँ, कहकर मेरा भावनात्मक शोषण न करें। मुझे आपकी पीड़ा का अहसास है। जो बात कह रहा हूँ पहले समझिये। अगर आप वाक़ई एक लाख हैं तो सड़क पर आकर दिखाइये। लड़िए। हिन्दू मुस्लिम टापिक पर लड़ लड़ कर आपने समाज को पगला दिया है, उसे ठीक कीजिए। मुझे फोन करने से कुछ नहीं होगा।
आपकी उम्मीद, रवीश कुमार
साभार जनसत्ता 
(www.newsforall.in में खबरों और विज्ञापनों के प्रकाशन के लिए संपर्क करें, फोन- 8922002003)
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