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जानें बिहार के सियासी घमासान का पूरा सच, छठी बार सीएम बने नीतीश

पटना। महागठबंधन सरकार से इस्तीफा देने के बाद गुरुवार को नीतीश कुमार ने राज्य में छठी बार बतौर सीएम पद की शपथ ली। उनके अलावा बीजेपी नेता सुशील मोदी डिप्टी सीएम बने। बिहार के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने दोनों को शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर दोनों को बधाई दी। 28 जुलाई को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा के विशेष सत्र में विश्वास मत प्राप्त करेंगे। नई राज्य कैबिनेट ने विशेष सत्र की स्वीकृति दी। इसके साथ ही उन्होंने बिहार के उज्जवल भविष्य की कामना की। समारोह में केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा और भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री अनिल जैन भी शामिल हुए। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार ने कहा मैंने बिहार के हित में फैसला लिया है, समय आने पर सबको जवाब दूंगा। वहीं डिप्टी सीएम सुशील मोदी बोले कि विकास हमारी प्राथमिकता है, बिहार को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ गठबंधन करने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनपर निशाना साधा है। पत्रकारों के साथ बातचीत में राहुल ने कहा कि मुझे कुछ महीने पहले नीतीश कुमार मिले थे। राहुल गांधी ने कहा, 'मुझे पहले से ही पता था ये खिचड़ी पक रही है। तीन से चार महीने पहले से ये सब चल रहा था। सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं।' बता दें कि बुधवार को इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार ने कहा था, जैसे हालात बिहार में बन रहे थे काम करना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में ये कदम उठाना जरूरी था। उन्होंने आगे कहा कि अब बिहार की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत होगी। लालू यादव ने नीतीश कुमार के फैसले के बाद उनपर पलटवार किया और कहा ये सब पहले से ही सेट था, उन्होंने मुझे धोखा दिया। महागठबंधन की सरकार को अगले पांच साल तक बिहार में सत्ता चलाने के लिए जनता ने चुना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजद राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। इसके लिए पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी से समय मांगा है। तेजस्वी ने ट्वीट कर राज्यपाल से समय मांगने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि विधानसभा में सबसे बड़ा दल होने के नाते राजद को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। भाजपा के साथ जाने से नाराज जदयू विधायक भी उनके इस मुहिम में साथ देंगे। उन्होंने दावा किया कि शरद यादव जैसे कई बड़े नेता नीतीश कुमार के इस रुख से नाराज हैं।इससे पहले नीतीश कुमार ने बुधवार शाम 6:30 बजे राज्यपाल से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप दिया था। इसके साथ ही राज्य में पिछले 20 माह से चल रहा जदयू-राजद और कांग्रेस का महागठबंधन टूट गया। राजभवन से लौटने के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जैसा माहौल चल रहा था उसमें काम करना मुश्किल हो गया था। मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा दिया है।  
शपथ में नहीं पहुंचे शरद यादव 
बिहार के मुख्यमंत्री पद से बुधवार (26 जुलाई) को इस्तीफा देकर गुरुवार (27 जुलाई) को दोबारा भाजपा के साथ मिलकर छठी बार सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार से उनके ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष शरद यादव नाराज बताए जा रहे हैं। पटना में सुबह 10 बजे हुए शपथ ग्रहण समारोह में शरद यादव नहीं पहुंचे। वो दिल्ली में ही रहे। पिछले दिनों 18 विपक्षी दलों की दो बैठकों में शामिल होने वाले शरद यादव ने हर वक्त कहा था कि वो और उनकी पार्टी जेडीयू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ती रहेगी लेकिन नीतीश कुमार ने उनकी एक नहीं सुनी और आखिरकार 20 महीने तक लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस के साथ सरकार चलाने के बाद गठबंधन तोड़ दिया। इधर, लालू यादव ने रांची में आज (27 जुलाई) को कहा कि वो पल-पल बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि वो शरद यादव से बातचीत करेंगे। माना जा रहा है कि 70 साल के लालू यादव और 70 साल के ही शरद यादव मिलकर 66 साल के नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। बहरहाल, घटनाक्रम इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है कि इन दोनों नेताओं द्वारा नीतीश के खिलाफ कुछ भी कदम उठाने से पहले नीतीश कुमार विधानसभा में बहुमत परीक्षण पास कर सकते हैं। नीतीश के इस फैसले से उनकी पार्टी के कई नेता नाराज बताए जा रहे हैं। शरद यादव के अलावा राज्य सभा सांसद अली अनवर का भी नाम नाराज नेताओं में है। अली अनवर ने कहा था कि नीतीश कुमार अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर बीजेपी के साथ सरकार बना रहे हैं, लेकिन मेरी अंतरात्मा इस बात को नहीं मानती है। अगर मुझे अपनी बात कहने का मौका मिलेगा, तो मैं पार्टी के मंच पर अपनी बात जरूर रखूंगा। गौरतलब है कि बुधवार को कई घंटों तक चले सियासी ड्रामे के बाद शाम करीब साढ़े छह बजे नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा देने के बाद मीडिया से बात करते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि उनके लिए मौजूदा परिस्थितियों में सरकार चलाना मुश्किल हो रहा था।
नीतीश की पोल खोल रहे पुराने बयान 
समय चक्र पर नजर डालें तो नीतीश ने जो तल्ख बयान भाजपा, आरएसएस के खिलाफ दिए थे, लेकिन कहते हैं कि राजनीति में हर सुबह और शाम एक जैसी नहीं होती है। तकरीबन चार सालों तक भाजपा से अलग रहने वाले नीतीश कुमार ने जिस वक्त एनडीएस का साथ छोड़ा था उस वक्त वह 17 सालों से एनडीए के साथ थे। इसके बाद नीतीश कुमार ने कई मौकों पर भाजपा और आरएसएस के खिलाफ बयान दिए और यहां तक कह दिया था कि वह संघ मुख्त भारत चाहते हैं। नीतीश ने इससे आगे जाते हुए कहा कि ये लोग अटल बिहारी, लालकृष्ण आडवाणी को भूल गए हैं। हमें भाजपा से डरने की जरूरत नहीं एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि अधिक से अधिक विपक्ष के नेताओं को एक साथ आने की जरूरत है और यह इस समय की मांग है, हमें पुरानी बातों को भूलना होगा। यही नहीं नीतीश ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि आखिर क्यों भाजपा ही सारे मुद्दे निर्धारित करेगी, मौजूदा समय में देश को एकजुट विपक्ष की जरूरत है, जब ऐसा होगा तो आप देखिएगा कि क्या होता है। हमें डरने की जरूरत है, हमें अपने एजेंडा को 90 फीसदी तक फॉलो करने की जरूरत है। संघ मुक्त भारत की जरूरत संघ मुक्त भारत की जरूरत वहीं मई 2016 में पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नीतीश कुमार ने संघमुक्त भारत और शराब मुक्त भारत का नारा दिया था। इसके अलावा भी कई कार्यक्रम के दौरान में नीतीश ने संघ और भाजपा के खिलाफ तल्ख बयानबाजी की। गत वर्ष अप्रैल माह में नीतीश कुमार ने एक बार फिर से संघ मुक्त भारत की बात करते हुए कहा था कि अब ऐसी परिस्थिति में आज सीधे दो धुरी होगी, भाजपा एक तरफ है और दूसरी तरफ सब लोगों को मिलना पड़ेगा। वरना अलग-अलग रहेंगे तो अलग-अलग ये सबका बुरा हाल कर देंगे, ये सबको एकत्रित होना होगा। एक बार लोहियाजी ने गैर कांग्रेसवाद की बात की थी, आज वही दौर आ गया है जब आपको गैर संघवाद करना पड़ेगा। इसके लिए सबको एकजुट खड़ा होना होगा। संघ मुक्त भारत बनाने के लिए सभी गैर भाजपा पार्टी को एक होना होगा। बिहार में जब महागठबंधन का गठन हुआ तो नीतीश कुमार ने पटना में 24 सितंबर 2015 को अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि भाजपा के लिए आरएसएस सुप्रीम कोर्ट की तरह है। भाजपा विकास की बात करती है, लेकिन वह लोगों को बांटने का काम करती है, वह धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटने का काम करती है। पीएम के डीएनए क बयान को बताया था बिहार का अपमान पीएम के डीएनए क बयान को बताया था बिहार का अपमान बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार पर जमकर हमला बोला था, उन्होंने यहां तक कह दिया था कि बिहार के राजनीतिक डीएनए में कुछ कमी है, जिसके चलते उन्हें अपने साथी को छोड़ना पड़ा। पीएम के इस बयान के जवाब में नीतीश ने कहा था कि यह बिहार के लोगों का अपमान है, उन्होंने पीएम से अपना बयान वापस लेने की भी मांग की थी। इसके लिए बकायदा एक अभियान चलाया गया जिसमें 50,000 लोगों ने पीएम मोदी को अपना डीएनए सैंपल भेजेंगे। कभी टोपी पहननी पड़ेगी, कभी तिलक लगाना पड़ेगा कभी टोपी पहननी पड़ेगी, कभी तिलक लगाना पड़ेगा 6 अगस्त 2013 को भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने अल्पसंख्यकों के राष्ट्रीय कांफ्रेंस में बोलते हुए कहा था कि आजक हवा की बात होती है, ये कुदरत की हवा है ,लेकिन वो ब्लोवर की हवा है। नीतीश ने यह बयान मोदी लहर पर दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत जैसे देश को आगे ले जाने के लिए सबको साथ लेकर चलना होगा, कभी टोपी भी पहननी पड़ेगी, कभी तिलक भी लगाना पड़ेगा। नीतीश कुमार के इस बयान को पीएम मोदी के खिलाफ माना जा रहा था, जब पीएम ने 2011 में एक कार्यक्रम के दौरान टोपी पहनने से इनकार कर दिया था।
नीतीश की 'घर वापसी' में ऐसे कामयाब हुए भाजपा के रणनीतिकार  
बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ एक बार फिर 2019 के चुनाव में जाने की बात कह चुकी है और यह मानकर चल रही है कि वह सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी तो बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन की थी। इतना ही नहीं बीजेपी और एनडीए के सामने भी यह सबसे बड़ी मुश्किल होती कि यह महागठबंधन अपना दायरा बढ़ाता और यूपी जैसे राज्य में भी एनडीए के सामने एक विराट चुनौती पेश करता। 2015 में बिहार के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी और सहयोगी दलों को जो हार मिली वह बीजेपी के लिए अप्रत्याशित थी और बीजेपी के रणनीतिकारों के गणित को फेल करती दिखी। यह वही दौर था जब बीजेपी ने अपने भीतर बदलाव किया और धीरे-धीरे नीतीश कुमार पर हमले कम करने की योजना बना ली और केवल लालू यादव और आरजेडी पर हमले तेज हो गए। इसी दौरान बीजेपी ने लालू यादव के केंद्र में कार्यकाल और राज्य की राजनीति के मामलों को लेकर हमले तेज कर दिए। राज्य बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने तो बाकायदा महीने की एक तारीख तक तय कर दी थी जब वह एक नया मुद्दा लेकर लालू यादव और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने लगे। बीजेपी ने लालू यादव और उनके परिवार को घेरना शुरू कर दिया। लालू यादव पहले ही भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार हैं और फिलहाल बेल पर जेल से बाहर हैं। केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में चल रही सरकार ने कई योजनाओं को 2022 और 2024 तक के लिए घोषित किया है और पार्टी तथा सरकार की मंशा साफ है कि देश में उनके हिसाब से जो बदलाव हो रहे हैं उसका श्रेय कोई और न ले। यही वजह है कि बीजेपी किसी भी तरह राजनीतिक दृष्टि से देश में सबसे अहम राज्य यूपी-बिहार में किसी प्रकार का कोई रिस्क नहीं लेती। इस कारण पिछले दो सालों में बीजेपी की केंद्र की सरकार और राज्य में बीजेपी की इकाई ने भ्रष्टाचार को ही सबसे अहम मुद्दा बनाया। धीरे-धीरे बीजेपी के इस हमले की छीटें नीतीश कुमार पर भी पड़ने लगी। बीजेपी लगातार नीतीश कुमार पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने का दबाव बनाती रही। वहीं, नीतीश कुमार जिन्हें बिहार में लोग 'सुशासन बाबू' भी कहने लगे हैं, इससे परेशान हो उठे। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की छवि बेदाग ही है। उनपर अभी तक कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है और शराबबंदी और नोटबंदी के समर्थन और बेनामी संपत्ति पर उनके वार ने उन्हें और ऊंचा बना दिया। तभी यह तय हो गया कि महागठबंधन के दो अहम दलों में तनाव बनना तय था और गठबंधन की डोर पर टेंशन इतना बढ़ा की वह बुधवार शाम को टूट गया. इसी के साथ नीतीश कुमार की 'घर वापसी' हो गई। अब जाकर बीजेपी के राजनीतिक रणनीतिकारों को कुछ राहत मिली होगी। क्योंकि 2019 में अगर बीजेपी को कहीं से सबसे बड़ी चुनौती मिलनी थी तो वह बिहार और यूपी में मिलनी थी। इतना ही नहीं बीजेपी ने सीधे तौर पर एनडीए के सामने लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्यों पर उन्हें कड़ी चुनौती देने वालों को शांत कर दिया है। बीजेपी ने न केवल बिहार में महागठबंधन तोड़ा है बल्कि बीजेपी ने इसी के साथ यूपी में बन रही महागठबंधन की संभावनाओं पर भी सेंध लगा दी है।
इस तरह बढ़ रही थीं नीतीश और बीजेपी की नजदीकियां 
2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जदयू, राजद और कांग्रेस साथ आई। तीनों पार्टियों ने मिलकर महागठबंधन बनाया जो 20 महीने की साझेदारी के बाद, नीतीश कुमार के इस्तीफे से अपने अंजाम तक पहुंच गया है। नीतीश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया लेकिन 24 घंटे से भी कम समय में वह दोबारा बीजेपी के समर्थन से सत्ता पर काबिज होंगे। आइए जानते नीतीश कुमार के दोबारा बीजेपी के करीब आने के पूरे घटनाक्रम को। नीतीश की बीजेपी सरकार से करीबी के कयास नवंबर 2016 से लगने शुरू हुए। नीतीश ने केंद्र सरकार की नोटबंदी के फैसले का समर्थन किया। जनवरी 2017 में पीएम नरेंद्र मोदी ने नीतीश की शराबबंदी के फैसले के लिए तारीफ की। इसके बाद अप्रैल 2017 में बीजेपी के सुशील मोदी ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। आरोप के बाद सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने जांच शुरू की। इसके बाद मई 2017 से नीतीश की महागठबंधन से दूरियां नजर आने लगीं। नीतीश, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा आयोजित भोज और बैठक से नदारद होते हैं लेकिन पीएम मोदी द्वारा मॉरीशस के प्रधानमंत्री के सम्मान में आयोजित भोज में वह शामिल होते हैं। जून 2017 में राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग जाकर एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन किया। नीतीश कुमार उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में थे जिन्होंने 22 जुलाई को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से सम्मान में, पीएम मोदी द्वारा आयोजित भोज में शिरकत की। आखिर में 25 जुलाई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शपथ ग्रहण समारोह में भी नीतीश कुमार संसद के सेंट्रल हॉल में मौजूद नजर आते हैं। बता दें यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार बीजेपी के करीब आए हों। 1990 में बिहार में जनता दल की सरकार बनी जिसमें लालू सीएम बनें और नीतीश कुमार को कैबिनेट में जगह मिली। लेकिन यह साझेदारी ज्यादा समय तक नहीं चल सकी और 1994 में नीतीश ने लालू से अलग होकर, जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई। 1996 के लोकसभा चुनाव में समता पार्टी ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया था।
मोदी के हर ‘विवादित’ फैसले की तारीफ की नीतीश ने 
बिहार में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम की शुरुआत दरअसल काफी पहले ही हो चुकी थी। महागठबंधन के टूटने और बीजेपी से हाथ मिलाने के कई संकेत नीतीश कुमार लंबे समय से देते रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का समर्थन हो या फिर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए पीएम मोदी की तारीफ। बीजेपी और जेडीयू के बीच की तल्खियां काफी पहले से ही कम होती नजर आने लगी थीं। 26 जुलाई 2017 को आरजेडी विधायक दल की बैठक के बाद लालू प्रसाद यादव ने साफ कर दिया कि तेजस्वी इस्तीफा नहीं देंगे और न ही नीतीश ने इस्तीफा मांगा है। 18 जुलाई को काफी जद्दोजहद के बाद नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव के साथ गुपचुप बैठक की, हालांकि सूत्रों ने यही कहा था कि इस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला। 15 जुलाई को अपने इस्तीफे की बढ़ती मांग के बाद तेजस्वी ने बिहार सरकार के कार्यक्रम में ऐन वक्त पर जाना टाल दिया। हालांकि मंच पर उनकी नेमप्लेट लगाई गई थी जिसे बाद में ढक दिया गया। 14 जुलाई को लालू प्रसाद ने उन खबरों को खारिज किया कि सोनिया ने नीतीश कुमार और उनसे फोन पर बात करके मतभेद सुलझाने को कहा है। 10 जुलाई को आरजेडी ने बैठक कर के तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को फिर खारिज किया। 8 जुलाई को राजधानी दिल्ली में लालू की बेटी मीसा भारती के निवास और अन्य संपत्तियों पर छापे पड़े। 7 जुलाई को सीबीआई ने होटल आंवटन में घोटाले के मामले में 5 शहरों की 12 जगहों पर छापे मारे, लालू के साथ तेजस्वी और राबड़ी देवी के नाम भी एफआईआर में दर्ज। 21 जून को राष्ट्रपति पद के लिए नीतीश ने एनडीए के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को समर्थन दिया। 27 मई को मॉरिशस के प्रधानमंत्री के सम्मान में दिए गए मोदी के भोज पर नीतीश कुमार ने भी शिरकत की। उन्होंने पीएम से अलग से मुलाकात भी की। 26 मई को एक दिन पहले नीतीश कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा संयुक्त उम्मीदवार चुनने के मकसद से दिए गए भोज से किनारा किया और जेडीयू का प्रतिनिधि भेजा। 5 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के साथ मंच साझा किया। मोदी ने नीतीश के नशा मुक्ति अभियान की तारीफ की और दूसरे के लिए प्रेरणा बताया। 9 नवंबर 2016 को विपक्ष के विचार के उलट नीतीश ने नोटबंदी की तारीफ की। 29 सिंतबर को नीतीश ने पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक पर बीजेपी की तारीफ की थी।
लालू-नीतीश के रिश्ते की कहानी 
लालू-नीतीश के रिश्ते की कहानी किसी फिल्म स्क्रिप्ट से कम नहीं है। 1970 के दशक में लालू और नीतीश पहली बार जयप्रकाश नारायण के सोशलिस्ट आंदोलन के दौरान साथ आए। इसके बाद दोनों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव ज्वार-भाटे की तरह आता रहा। महागठबंधन से अलग होने के बाद जहां नीतीश की घर वापसी हो गई है, वहीं पुत्र मोह में फंसकर लालू एक बार फिर से हाशिये पर चले गए हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में महागठबंधन बनाकर पीएम मोदी के जादू को फीका करने के बाद ऐसा लग रहा था कि नीतीश और लालू की जोड़ी अटूट रहेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। महागठबंधन 2 साल भी नहीं चल सका। लालू और नीतीश की दोस्ती का अध्याय 1970 से शुरू होता है। 1990 को बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को बहुमत मिला। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नीतीश कुमार ने लालू की पूरी मदद की और लालू पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार बिहार के लालू के अहम सलाहकार के रूप में उभरे। 1994 दो साल बाद ही नीतीश और लालू के बीच मनमुटाव हो गया। कथित तौर पर नौकरियों में एक जाति को प्राथमिकता देने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार की वजह से नीतीश कुमार मौजूदा राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू से नाराज थे। नीतीश लालू के खिलाफ बगावत करने वाले खेमे में शामिल हो गए। 1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडीज के साथ मिलकर समता पार्टी बनाकर लालू से अलग राह जुदा कर ली। लेकिन उनका यह दांव कामयाब नहीं हुआ। विधानसभा चुनाव में नीतीश को केवल सात सीटें मिली, जबकि लालू दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने। 1996-97 में पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश दिए। लालू को सत्ता गंवानी पड़ी। जेल भी जाना पड़ा। कहा जाता है कि मामले में जांच के लिए दाखिल याचिका के पीछे नीतीश कुमार का बड़ा हाथ था। हालांकि लालू ने जेल जाने से पहले अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। अगले विधानसभा चुनाव में भी बाजी मार ले गए। 2003 में नीतीश ने शरद यादव के जनता दल और अपनी पार्टी समता पार्टी का विलय करके जनता दल यूनाइटेड का गठन किया। 2003 में बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया। 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और बीजेपी ने लालू के खिलाफ हाथ मिलाया लालू से सत्ता छीनी। नीतीश पहली बार मुख्यमंत्री बने। जून 2013 नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने पर बीजेपी से अपना 17 वर्ष पुराना नाता तोड़ लिया। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश को केवल दो सीटें से संतोष करना पड़ा जबकि लालू के खाते में चार सीटें गईं। जुलाई 2014 में नीतीश कुमार ने लालू के साथ मिलकर गठबंधन का ऐलान किया. 20 साल बाद दोनों नेता गले मिले और फिर महागठबंधन की नींव पड़ी। कांग्रेस भी साथ आई और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को करारी मात दी। सितंबर 2016 में नीतीश कुमार ने आरजेडी से उलट सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया। इसके बाद नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी का समर्थन किया। यहीं से नीतीश, लालू से दूर जाने लगे और बीजेपी के करीब होते गए।
बिहार में राजद-कांग्रेस निभा सकते हैं मजबूत विपक्ष की भूमिका 
बिहार में मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफा देने के बाद भाजपा का समर्थन करने की घोषणा से राजनीतिक हलचलें तेज हो गयी। ऐसे में राजद को कांग्रेस से उम्मीदें बढ़ गयी है। दोनों एक साथ रह कर मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सकते हैं। राजद के 80 तो कांग्रेस के 27 विधायक हैं। महागठबंधन में जदयू, राजद व कांग्रेस शामिल थी। जदयू के अलग होने से महागठबंधन में राजद व कांग्रेस बच गयी है। सांप्रदायिक ताकतों को परास्त करने व सत्ता से दूर रखने के लिए राजद व कांग्रेस पूरजोर प्रयास करेगी. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने संकेत दिये कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए नये नेता का चयन तीनों दलों के विधायकों की बैठक कर होनी चाहिए। लेकिन नीतीश कुमार को भाजपा द्वारा समर्थन करने की घोषणा से जदयू का राजद व कांग्रेस के साथ वापस होना संभव नहीं है। पहले भी राजद व कांग्रेस मिल कर सत्ता में रही है। पिछले एक दशक से अधिक समय बाद पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति अच्छी रही। कांग्रेस के 27 उम्मीदवार चुनाव में जीते. महागठबंधन में शामिल होने का फायदा कांग्रेस को मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस बात को जोर देकर कह रहे हैं कि सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखने के लिए महागठबंधन बना था। पांच साल के लिए यह गठबंधन हुआ था। जदयू का उससे अलग होना दुर्भाग्यपूर्ण है। नीतीश कुमार ऐसे लोगों के साथ जाकर फिर मिल गये जिसे देश से मुक्त करने के लिए निकले थे। ऐसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ.अशोक चौधरी पटना से बाहर हैं। कांग्रेस के सूत्र ने बताया कि राजद के साथ कांग्रेस के तालमेल को लेकर आलाकमान निर्णय लेगा। जानकारों की माने तो राजद को कांग्रेस का साथ मिलना तय है। दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का यह भी कहना है कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी व पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव पर सीबीआइ ने केस किया है। ऐसे में कांग्रेस का राजद को साथ देने से भ्रष्टाचार का समर्थन करने का आरोप कांग्रेस पर लगेगा। इससे कांग्रेस बचने की कोशिश करेगी। पहले भी कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के कई आरोप को लेकर उसकी देश भर में किरकिरी हुई है। अब देखना है कि राजद व कांग्रेस का क्या स्टैंड रहेगा।
एनडीए में नीतीश कुमार प्लस, उपेंद्र कुशवाहा माइनस! 
एनडीए में नीतीश कुमार का पूरी पार्टी जदयू समेत शामिल होने की घोषणा के साथ ही एनडीए में राजनीतिक दलों की संख्या में इजाफा होने जा रहा है। परंतु क्या यह इजाफा बना रहेगा, शायद नहीं। क्योंकि एनडीए में पहले से शामिल उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली रालोसपा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) का एनडीए से दूर होना तकरीबन तय माना जा रहा है। इसकी बुनियाद भी पड़ने लगी है। रालोसपा के भूदेव चौधरी ने नीतीश कुमार के खिलाफ काफी कड़ा बयान दिया है। उन्होंने नीतीश कुमार को मौका परस्त बताते हुए जमकर भड़ास निकाली है। सिर्फ रालोसपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो एनडीए में नीतीश कुमार के शामिल होने का विरोध कर रही है। जबकि उसकी अन्य दोनों सहयोगी पार्टियां लोजपा और हम इस फैसले का स्वागत कर रही हैं। भाजपा की नयी सरकार को समर्थन देने की घोषणा के साथ ही रालोसपा के तेवर पूरी तरह से बदल गये हैं। यह दीगर बात है कि नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा दोनों एक साथ किसी दल या गठबंधन में रहें। शायद भाजपा भी इस बात के लिए पहले से तैयार भी थी। तभी इस विरोध को लेकर भाजपा की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि रालोसपा के अलग होने से बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। रालोसपा के तीन विधायक और पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा समेत तीन सांसद हैं। इससे केंद्र और राज्य दोनों सरकार की सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उधर, हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने नीतीश कुमार के इस्तीफे का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने उच्च नैतिकता को फिर से स्थापित किया है। देर से ही सही पर उन्होंने दुरुस्त निर्णय लिया है। नीतीश कुमार द्वारा जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद वे काफी नाराज थे। व्यक्तिगत रूप से नीतीश कुमार की वे तारीफ करते रहे। तेजस्वी का इस्तीफा नहीं लिये जाने पर जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार पर आरोप भी लगाये थे। उन्होंने कहा था कि दलित होने के कारण हमसे इस्तीफा ले लिया गया था।
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