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गुजरात में भाजपा के लिए फिर से सियासी जमीन तैयार करने में जुटे पीएम मोदी!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते दिनों गुजरात में एक साथ कई बड़े सियासी समीकरणों को साधा। ये तमाम राजनीतिक समीकरण 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर हैं। इन समीकरणों को साधने की शुरुआत सूरत एयरपोर्ट पर मोदी के कदम रखते ही हो गई थी। सूरत एयरपोर्ट से सर्किट हाउस के करीब ग्यारह किलोमीटर लंबे मार्ग पर मोदी जब रोड शो की शक्ल में लोगों के सामने आए, तो मोदी की निगाह सूरत के लोगों से अपने रिश्ते को प्रगाढ़ करने की थी। सूरत में रोड शो के दौरान पीएम मोदी लाखों लोगों से रूबरू हुए। इस दौरान उनकी सरकार की योजनाओं का प्रचार भी होता रहा और मोदी लोगों की नब्ज भी मापते रहे। सूरत शहर के लोगों के चेहरों के भाव से मोदी को भली-भांति इस बात का अंदाजा लग गया कि अब भी यहां के लोग उसी शिद्दत के साथ उनके पीछे खड़े हैं, जैसा पिछले चुनावों में थे। जहां तक पिछले चुनावों की बात है तो 2012 के विधानसभा चुनाव के नतीजे साफ तौर पर बताते हैं कि सूरत और यहां के लोगों ने मोदी का किस कदर साथ दिया था। उस समय मोदी गुजरात के सीएम थे और 2012 के विधानसभा चुनावों की सफलता उन्हें प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर आगे ले जा सकती थी, इसका अंदाजा न सिर्फ उन्हें और उनक समर्थकों को था, बल्कि सियासी विरोधियों को भी था। ऐसे में 2012 के विधानसभा चुनावों में मोदी को जो बड़ी कामयाबी मिली, उसमें सूरत और यहां के लोगों का बड़ा हाथ रहा। सूरत जिले में विधानसभा की जो कुल सोलह सीटें हैं, उसमें से पंद्रह पर बीजेपी 2012 में कब्जा करने में कामयाब रही थी। इन पंद्रह सीटों में से ज्यादातर शहरी सीटें है। इस तरह का बीजेपी का जोरदार प्रदर्शन इस बात का सबूत था कि सूरत के लोगों ने किस तरह मोदी और बीजेपी का साथ दिया था। खास बात ये है कि सूरत गुजरात का सिर्फ दूसरा बड़ा शहर ही नहीं, बल्कि यह वो शहर है, जहां सबसे ज्यादा आप्रवासी वोटर हैं यानी वो वोटर जो मूल गुजराती न होकर ओडीशा और बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक के हैं। इन्हीं मतदाताओं ने न सिर्फ गुजरात में मोदी का साथ दिया, बल्कि अपने गांवों में जाकर वहां भी मोदी के लिए 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान हवा बनाने का काम किया था। मोदी का रोड शो इस बात का सबूत है कि अब भी शहरी मतदाताओं पर उनका प्रभाव कायम है। मोदी की इस बार की यात्रा बतौर प्रधानमंत्री गुजरात की उनकी बारहवीं यात्रा थी। ऐसे में इस दफा मोदी ने कुछ और समीकरण भी साधे। मसलन जिन पाटीदारों की नाराजगी 2017 चुनावों की जीत की राह में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बाधा मानी जाती रही है, उसी पाटीदार समुदाय के दो कार्यक्रमों में मोदी शरीक हुए। मोदी ने किरण हॉस्पिटल का उदघाटन किया, जिस हॉस्पिटल के निर्माण के लिए भूमि पूजन का काम बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने 2013 में किया था, तब वे बीजेपी के पीएम कैंडिडेट भी बन चुके थे। उस वक्त आयोजकों ने कही थी कि मोदी को बतौर पीएम इसके उदघाटन के लिए आना होगा। मोदी ने अपना वादा तो निभाया ही, साथ में पाटीदार समुदाय की भावनाओं को सहला भी दिया। किरण हॉस्पिटल का निर्माण पाटीदार समुदाय से जुड़े कारोबारियों के दान से हुआ और दान भी कोई छोटा-मोटा नहीं, पांच सौ करोड़ रुपये से भी अधिक का। जाहिर है, जो पाटीदार समुदाय के लोग हाल तक बीजेपी से आरक्षण के मुद्दे को लेकर खफा थे, उन्हीं के सबसे प्रभावशाली हिस्से ने मोदी को अपना मेहमान बनाया। मोदी पाटीदार समुदाय से जुड़े एक बड़े हीरा कारोबारी सवजी धोलकिया की कंपनी हरेकृष्ण डायमंड्स के नये मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का उदघाटन भी किए। एक दिन में पाटीदार समुदाय के दो कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर मोदी ने संकेत दे दिया कि वो पाटीदारों को अब भी अपने करीब समझते हैं और पाटीदारों को भी न तो उनसे और न ही उनकी पार्टी बीजेपी से ऐसी कोई चिढ़ है। पाटीदार समुदाय को सकारात्मक संदेश देने के बाद मोदी ने आदिवासियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। मोदी के तापी और सिलवास के कार्यक्रम इसी दिशा में थे। तापी जिले के मुख्यालय व्यारा के नजदीक बाजीपुरा गांव में सुमूल डेरी के कैटलफीड प्लांट का उदघाटन करने के बाद मोदी बगल में मोजूद दादरा नगर हवेली के मुख्यालय सिलवास भी गये और वहां करीब आधी दर्जन सरकारी योजनाओं का लोकार्पण किया, जो मोटे तौर पर गरीब आदिवासियों के कल्याण से जुड़ी हैं। तापी और केंद्रशासित प्रदेश दादरा नगर हवेली, ये दोनों ही आदिवासी बहुल इलाके हैं। तापी जिले में जब 2012 में चुनाव हुए थे, तो जिले की एक सीट निझर बीजेपी के पास थी, तो व्यारा की सीट कांग्रेस के खाते में। व्यारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अमरसिंह चौधरी का इलाका रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मोदी की अगुआई में बीजेपी ने इस आदिवासी इलाके में अपनी पकड़ को बढ़ाया है। यही हाल दादरा नगर हवेली का भी है। एक समय मोहन डेलकर का दादरा नगर हवेली की राजनीति पर पूरी तरह नियंत्रण था, जहां से वो छह बार सांसद रहे। लेकिन ये लोकसभा सीट भी 2009 में बीजेपी के कब्जे में आई और 2014 की मोदी लहर में बीजेपी इसे स्वाभाविक तौर पर जीतने में कामयाब रही। अभी दादरा, नगर हवेली और दमण-दीव के प्रशासक की भूमिका में प्रफुल्ल पटेल हैं, जो मोदी की अगुआई वाली गुजरात की तत्कालीन बीजेपी सरकार में गृह राज्य मंत्री रह चुके हैं। प्रफुल्ल पटेल की तरफ से सिलवास में मोदी की सभा का आयोजन हुआ। सिलवास गुजरात के आदिवासी बहुल इलाकों वलसाड और डांग से सटा है। इसलिए मोदी का असर इन इलाकों पर पड़ेगा। मोदी के दौरे का आखिरी पड़ाव बोटाद रहा। यहां मोदी सौनी सिंचाई परियोजना के एक चरण का उदघाटन तो दूसरे चरण का शिलान्यास करने आए। बोटाद का ये इलाका कोली समुदाय के प्रभुत्व वाला है। जब हार्दिक पटेल की अगुआई में पाटीदारों का आरक्षण आंदोलन चल रहा था तब सबसे अधिक असर इस इलाके में था। कोली समुदाय के बीच ओबीसी युवा नेता अल्पेश ठाकोर अपनी जड़ जमाने में लगे हैं। ऐसे में बोटाद की यात्रा और सभा के जरिये मोदी ने न सिर्फ एक तरफ अल्पेश के प्रभाव को कम करने की कोशिश की तो दूसरी तरफ हार्दिक के प्रभाव को भी। मोदी की कामयाबी का सबसे बड़ा सबूत ये है कि इस दौरे में किसी ने एक बार न तो हार्दिक पटेल की नोटिस ली और न ही अल्पेश ठाकोर की, जिनके बारे में ये कहा जा रहा था कि 2017 के विधानसभा चुनावों के ये बड़े गेम चेंजर होंगे। जाहिर है, मोदी गुजरात में बीजेपी के सबसे बड़े कैंपेनर हैं पिछले दो दशक से और यही भूमिका उनकी इस बार भी रहने वाली है। इस भूमिका में मोदी चुनाव तारीखों की घोषणा का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि उससे पहले ही ग्राउंड कवर करने में लग गये हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत बीते 4 माह में ही मोदी की गुजरात की तीन यात्रा है। आखिर करें भी क्यों न? 1995 से ही लगातार गुजरात में विधानसभा चुनाव जीत रही है बीजेपी और गृह प्रदेश होने के नाते गुजरात को अपने कब्जे में रखना मोदी के अपने सियासी वर्चस्व के लिए जरूरी है। घर में मजूबत रहकर ही आप बाहर भी मजबूत हो सकते हैं। इसका एहसास मोदी को है। इनपुट साभार एबीपी 
राजीव रंजन तिवारी, फोन- 8922002003
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