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यूपी चुनावों में 'नोटबंदी' रही फेल, 1000 करोड़ रुपये में खरीदे गए वोट: सीएमएस

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री ने जब 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोटों की बंदी का ऐलान किया था, तो सबसे ज्यादा चर्चा चली कि प्रधानमंत्री ने यूपी चुनावों को देखते हुए यह कठोर फैसला लिया है। उस समय यह भी चर्चा थी कि नोटबंदी का असर सीधे विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा और शायद बड़े-बड़े नेता पैदल घूम-घूम कर चुनाव प्रचार करेंगे तथा चुनाव की रौनक फीकी रहेगी, लेकिन नोटों के सौदागर कहे जाने वाले राजनेताओं ने सारे अनुमानों को धता बता कर चुनावों में दोनों हाथ खोलकर पैसा लुटाया। यहां तक कि नोट के बदले वोट का कारोबार भी बेखौफ चला. यानी कुल मिलाकर नेताओं ने न केवल सारे कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाईं बल्कि इस कवायद के आगे बेचारी नोटबंदी भी फेल हो गई। सीएमएस के चुनाव पूर्व एवं पश्चात सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश के चुनाव में विभिन्न दलों ने 5500 करोड़ रुपये खर्च किए जिनमें करीब 1000 करोड़ रपये ‘वोट के बदले’ नोट पर खर्च किए गए। सर्वे के दौरान करीब एकतिहाई मतदाताओं ने नकद या शराब की पेशकश की बात मानी है। सीएमएस के सर्वेक्षण के अनुसार अकेले उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में बड़े राजनीतिक दलों ने 5500 करोड़ रुपये खर्च किए। वैसे चुनाव आयोग हर उम्मीदवार को 25 लाख रुपये चुनाव पर खर्च करने की इजाजत देता है, लेकिन सभी जानते हैं कि ज्यादातर उम्मीदवार इस मान्य राशि से अधिक तथा चुनाव के बाद वे जो घोषणा करते हैं, उससे कहीं ज्यादा खर्च करते हैं। चुनाव प्रचार गतिविधियों में पारंपरिक एवं गैर पारंपरिक गतिविधियां शामिल हैं। इस चुनाव में चौड़े पर्दे पर प्रदर्शन और वीडियो वैन समेत प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक सामग्री पर ही 600-900 करोड़ रपये खर्च हुए। सर्वेक्षण कहता है, ‘उत्तर प्रदेश में डाले गए हर मत पर करीब 750 रुपये खर्च आए जो देश में सर्वाधिक है।’ रिपोर्ट के मुताबिक इस विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में करीब 200 करोड़ रुपये और पंजाब में 100 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि जब्त की गई. सर्वेक्षण कहता है, ‘रूझान के मुताबिक वर्ष 2017 में 1000 करोड़ रुपये मतदाताओं के बीच वितरित किए जाने का अनुमान है।’ जितने मतदाताओं पर सर्वेक्षण किया गया उनमें से 55 फीसदी अपने आसपास में किसी न किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिन्होंने इस या पिछले विधानसभा चुनावों में वाकई पैसे लिए। अध्ययन के अनुसार सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि नोटबंदी से चुनाव व्यय काफी बढ़ गया. कुछ निर्वाचन क्षेत्रों, जहां मुकाबला कड़ा था, मतदाताओं की संख्या और मतदाता की भूमिका को प्रभावित करने के हिसाब से लोगों के बीच 500 से लेकर 2000 रुपये तक बांटे गए। दोतिहाई मतदाताओं के हिसाब से उम्मीदवारों ने पहले से ज्यादा खर्च किए। सर्वे में पाया गया कि पिछले साल यूपी में हुए ग्राम पंचायत के चुनावों में ही प्रधानपद के उम्मीदवार ने एक परिवार पर तकरीबन 3000 रुपये खर्च किए थे। इस तरह से अगर विधानसभा चुनावों की बात करें तो यह खर्चा कहीं ज्यादा बैठता है। खुद एक रोडशो में वाहनों की ही गिनती की जाए तो चुनाव आयोग द्वारा खर्च की तय सीमा महज एक रोड शो में ही खर्च हो जाती है। गौरतलब है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कई सभाओं में वोट के बदले नोट लेने की बात कही थी। इस बात को लेकर उनको नोटिस भी जारी किए गए। इस दौरान कई ऐसे वीडियो भी वायरल हुए जिनमें चुनावी सभा में 500-500 रुपये के नोट बांटते हुए दिखाया गया।
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