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कांग्रेस ने जीता पंजाब, मणिपुर व गोवा तो भाजपा को मिला यूपी, उत्तराखंड

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव नतीजों ने बीजेपी को केसरिया होली खेलने का मौका दे दिया है तो पंजाब, मणिपुर व गोवा ने कांग्रेस। पांच राज्यों के चुनावों के लिए 11 मार्च को हुई मतगणना में बीजेपी ने 403 सीटों वाले यूपी में 300 के पार, जबकि 70 सीटों वाले उत्तराखंड में 50 से भी ज्यादा सीटें जीत गई है। दोनों राज्यों में बीजेपी का यह अब तक का सबसे बड़ा स्कोर होगा। हालांकि पंजाब में बीजेपी को झटका लगा है। आम आदमी पार्टी के अरमानों को रौंदते हुए कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी-अकाली सरकार को सत्ता से बेदखल कर चुकी है। गोवा और मणिपुर में भी कांग्रेस सरकार बनाने के करीब है। आम चुनाव 2014 की तरह ही बीजेपी ने यूपी में बाकी पार्टियों का गेम ओवर कर दिया। पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे के सहारे चुनाव लड़ रही बीजेपी की यूपी में ऐसी सुनामी चली कि सारे विपक्षी धराशायी हो गए। यह लहर यूपी में 1991 में बीजेपी की सरकार बनते वक्त छाई राम लहर से भी तेज थी। मंदिर आंदोलन के वक्त जनता के चरम समर्थन के सहारे यूपी में सरकार बनाने वाली बीजेपी को उस वक्त 221 सीटें मिली थीं। उस वक्त कांग्रेस को महज 46 सीटें ही मिली थीं। मोदी की इस लहर का असर पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भी दिखा और कांग्रेस को वहां हारना पड़ा है। बीजेपी राज्य में 70 में से 56 सीटों पर जीत गई है। हालांकि इस भारी भरकम जीत के बावजूद बीजेपी के लिए झटके वाली बात यह रही कि प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट चुनाव हार गए। गढ़वाल के सांसद और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने उत्तराखंड में भाजपा की जीत को अप्रत्याशित बताया और कहा कि यह मोदी की कार्यशैली की जीत है। दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे खंडूरी ने कहा कि यह मोदी की कार्यशैली की जीत है, देश की भलाई के लिए उनके द्वारा किये जा रहे कामों पर जनता का विश्वास है, यह मोदी लहर है, यह अप्रत्याशित जीत है।
पंजाब में पंजा, आप के अरमानों पर चला झाड़ू  
कांग्रेस को पंजाब में बढ़त मिली है। पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन को सत्ता से बेदखल करने में कामयाब रही। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 77 सीटें जीती है। वहीं, शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन केवल 15 सीटें (अकाली दल-15, बीजेपी-3) जीती है। यहां पहली बार चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी (आप) मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है, जिसने 20 सीटें जीती हैं। आम आदमी पार्टी को इस सीमावर्ती राज्य में सरकार बनाने लायक बहुमत की उम्मीद थी, लेकिन इस लिहाज से परिणाम उसके लिए निराशाजनक रहा। 
गोवा, मणिपुर में कांग्रेस सत्ता के करीब
मणिपुर और गोवा में भी कांग्रेस सरकार बनाने के करीब पहुंच गई है। गोवा में 40 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस सत्ता के करीब है। बीजेपी मुकाबले से दूर हो गई है। 40 सीटों के नतीजों में कांग्रेस 17 सीटें जीती है और बीजेपी को केवल 13 सीटें मिली हैं। क्षेत्रीय पार्टियों गोवा फॉरवर्ड और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने 3-3 सीटें जीती हैं। एनसीपी को एक सीट है, 3 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 21 सीटें जीती थीं, जब वह 2012 में सत्ता में आई थी। बीजेपी को तगड़ा झटका लगा है, क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर मांद्रे सीट से चुनाव हार गए। उनके कैबिनेट सहयोगियों दयानंद मांद्रेकर (शियोली) और दिलीप परुलेकर (सालगाव) भी चुनाव हार गए। प्रमुख कांग्रेस विजेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत भी शामिल हैं। तटवर्ती राज्य गोवा के चुनावी मुकाबले में पहली बार उतरने वाली आप कोई सीट नहीं जीत पाई। आरएसएस के बागी सुभाष वेलिंगर का गोवा सुरक्षा मंच, शिवसेना को भी कोई सफलता नहीं मिली, लेकिन उनकी गठबंधन सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को तीन सीटें मिलीं। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी चार फरवरी के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी से अलग हो गई थी और तीन पार्टियों के साथ गठबंधन बना लिया था। पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में कांग्रेस व बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर रही। कांग्रेस ने यहां 28 सीटें जीती, जबकि बीजेपी 21 पर जीत दर्ज की।
नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राईक का भी असर? 
पिछले साल 8 नवंबर को नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी का बेहद कड़ा फैसला किया। नोटबंदी के इस फैसले का विपक्षी पार्टियों ने जोरदार विरोध किया। फैसले को जनता के खिलाफ बताया गया और संसद से लेकर सड़क तक विरोध प्रदर्शन किया गया। हालांकि सरकार इस फैसले को हर बार कालेधन पर लगाम कसने वाला बताती रही और यह भी कहती रही की जनता समर्थन फैसले के साथ है। अब 5 राज्यों में से दो राज्यों के नतीजों ने भी सरकार के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। रिकॉर्ड जनाधार और विपक्षी पार्टियों के सफाए ने साबित कर दिया कि नोटबंदी के फैसले को जनता ऐतिहासिक और बेहतर मान रही है। महाराष्ट्र, गुजरात और ओडिशा के निकाय चुनाव से लेकर 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक पार्टियों ने नोटबंदी को ही अपना हथियार बनाया। एक तरफ बीजेपी इसे जनता के हित वाला फैसला बताकर वोट मांग रही थी. दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां नोटबंदी को देश के लिए बेहद 'घातक' बताने में जुटी हुई थीं। हर रैली, जनसभा यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी नोटबंदी को ही हथियार बनाया गया। मतलब साफ था कि इस चुनाव में नोटबंदी के फैसले पर ही चुनाव लड़ा जा रहा था। नोटबंदी के अलावा सर्जिकल स्ट्राइक के फैसले को भी बीजेपी ने बेहतर तरीके से भुनाया। बीजेपी लगातार कोशिश कर रही थी कि वो साबित करे कि बीजेपी के अलावा दूसरी पार्टियां सर्जिकल स्ट्राइक पर बेवजह सवाल खड़ा कर रही हैं। ऐसे में 'राष्ट्रभक्ति' की भावना वाले इस सर्जिकल स्ट्राइक के फैसले को जनता ने समर्थन दिया है।
बीजेपी की गहरी पैठ से उखड़ी अखिलेश की कुर्सी! 
भाजपा ने यूपी विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल करते हुए सभी अनुमानों को गलत साबित कर दिया। यूपी जैसे बड़े प्रदेश में बीजेपी की जीत के बड़े मायने हैं और इसका असर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा. विरोधी पार्टियों को समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर कमी कहां रह गई। खासतौर से सपा और कांग्रेस तो गठबंधन के बाद से जैसे जीत के प्रति आश्वस्त थी, लेकिन यह भी उनके काम नहीं आया। वैसे तो बीजेपी की जीत में कई अहम कारक हैं और विरोधियों के बीच अनिश्चितता के माहौल ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई, लेकिन उसका जनता के बीच पहुंचाया गया एक संदेश ऐसा कारक साबित हुआ कि यूपी की जनता ने कांग्रेस, सपा और बीएसपी से दूरी बना ली और उन्होंने बीजेपी के पास जाने में ही भलाई समझी। विरोधी दलों में जारी उठापटक के बीच बीजेपी एक ऐसे बड़े संदेश को जनता के बीच स्थापित करने में सफल रही, जिसने गेमचेंजर की भूमिका निभाई। उसके कार्यकर्ताओं ने गुप्त तरीके से इसे लक्षित वर्ग तक पहुंचाना जारी रखा। हालांकि पीएम मोदी ने इशारों-इशारों में प्रचार के अंतिम दौर में इसका जिक्र किया था. यह संदेश था कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को केवल दो की ही चिंता है- यादव और मुसलमान! इतना ही नहीं उसने इसके लपेटे में कांग्रेस और बसपा को भी ले लिया। सपा सरकार पर मुसलमानों पर भी अधिक ध्यान देने का आरोप लगा, जिससे एक हद तक हिंदू भी एकजुट होकर बीजेपी की ओर चले गए। कांग्रेस से गठबंधन होने के बाद भी उन्हें इसका फायदा नहीं मिला, क्योंकि कांग्रेस पर तो पहले से ही मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप थे. विकास के नाम पर 'काम बोलता है' का नारा भी फेल रहा, क्योंकि कई लोगों का मानना है कि लखनऊ को छोड़कर कहीं भी विकास कार्य ज्यादा नहीं हुए. खुद उनके विज्ञापन भी लखनऊ केंद्रित रहे। दूसरी ओर बसपा सरकार के दौरान मायावती पर जाटवों को ही वरीयता देने का आरोप लग चुका था। मतलब जनता के बीच यह संदेश गया कि मायावती वापस सत्ता में आने पर फिर वही करेंगी। फिर क्या था बीजेपी के चुनाव प्रबंधकों और प्रचारकों ने जनता के बीच इस तथ्य को स्थापित कर दिया कि भाजपा ही एक ऐसा दल है जो सबके बारे में सोच रहा है और उसी को वोट देने से सबका कल्याण होगा। इससे अखिलेश यादव और राहुल गांधी को जनता के बीच युवाओं के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने का कांग्रेस और सपा का प्रयास पूरी तरह फेल हो गया। भाजपा ने उत्तरप्रदेश की जनता के बीच पैठ बनाने के लिए न केवल अपने संगठन को मजबूत बनाया, बल्कि उसने बिहार वाली गलती नहीं दोहराई और चुनाव को विकास जैसे मुद्दे से नहीं भटकने दिया। कुछ विवाद भी हुए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उसके स्टार प्रचारकों ने इनके साथ ही जनता का ध्यान विकास की ओर केंद्रित रखा और ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली।
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