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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा- नोटबंदी से धीमी हो सकती है अर्थव्यवस्था की रफ्तार

(अंदर पढ़ें) क्या भारत में नोटबंदी के पीछे है अमेरिका का हाथ? 
नई दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि नोटबंदी के बाद आर्थिक मंदी के कारण गरीबों को होने वाली अपरिहार्य परेशानियों को दूर करने के लिए अतिरिक्त ध्यान दिया जाना चाहिए। मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन से वीडियो-कांफ्रेंसिंग के माध्यम से राज्यपालों और उपराज्यपालों को संबोधित करते हुए कहा कि कालेधन को समाप्त करने और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए लागू नोटबंदी से अर्थव्यवस्था में अस्थाई मंदी आ सकती है। उन्होंने कहा, ‘हमें लंबे समय की अपेक्षित प्रगति के लिए गरीबों के लिए अपरिहार्य हो गयीं परेशानियों को समाप्त करने के लिहाज से अतिरक्त सावधानी बरतनी होगी।’ राष्ट्रपति ने कहा कि गरीबी उन्मूलन के लिए अधिकार की सोच से उद्यमशीलता की ओर बढ़ने पर जोर देने का वह स्वागत करते हैं लेकिन उन्हें पता नहीं कि क्या गरीब लोग इतना इंतजार कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘उन्हें तत्काल मदद की जरूरत है ताकि वे भूख, बेरोजगारी और उत्पीड़न से मुक्त भविष्य की ओर राष्ट्रीय अभियान में सक्रियता से भाग ले सकते हैं।’ मुखर्जी ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में घोषित पैकेज कुछ राहत देगा। उन्होंने कहा कि इस साल सात राज्यों में चुनाव होंगे और पांच में चुनावों की तारीख घोषित हो चुकी हैं। राष्ट्रपति ने कहा, ‘निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों ने हमारे देश को दुनिया के सबसे जीवंत लोकतंत्रों में शामिल किया है। चुनाव राजनीतिक माहौल के प्रति जनता के रवैये, मूल्यों और विश्वास को प्रदर्शित करते हैं।’ चुनावों में बयानबाजी और वोटबैंक की राजनीति के प्रति चेताते हुए मुखर्जी ने कहा कि हो-हंगामे वाली बहस समाज में विभाजन रेखा को और अधिक गहरा कर सकती है। राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव बना रहना चाहिए। कई बार निहित स्वार्थों के लिए सद्भाव को खतरे में डाला जा सकता है। सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। इस तरह की किसी भी चुनौतीपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए कानून का शासन ही एकमात्र आधार होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि राज्यपाल और उपराज्यपाल अपने राज्य की जनता का सम्मान और आदर पाते हैं और वे समाज में तनाव कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। मुखर्जी ने अपने संबोधन में कहा, ‘आप अपने विचारों और बुद्धिमतापूर्ण सलाह से समाज में तनाव कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हमारे जैसे बहुलवादी लोकतंत्र में सहिष्णुता, विरोधाभासी विचारों के लिए सम्मान और धैर्य जरूरी हैं जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।’  
जर्मन अर्थशास्त्री का दावा, अमेरिका के इशारे पर हुई नोटबंदी  
8 नवंबर को भारत में नोटबंदी का फैसला लागू हुआ था और 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए थे। लोगों को पैसे बदलवाने के लिए बैंक और एटीएम की लाइनों में लगना पड़ा। लेकिन शायद किसी को यह भनक तक नहीं लगी होगी कि नोटबंदी के इस फैसले के पीछे अमेरिका का हाथ है। एक लेख में जर्मन अर्थशास्त्री नॉर्बर्ट हैरिंग ने यह दावा किया है। उन्होंने कहा कि भारत के साथ बेहतर विदेश नीतियों को बढ़ावा देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सामरिक साझेदारी की घोषणा की थी। इसमें चीन पर लगाम कसने की बात भी थी। इस साझेदारी के बारे में अमेरिकी सरकार की विकास एजेंसी यूएसएआईडी ने भारतीय वित्त मंत्रालय के साथ सहयोग समझौतों पर बातचीत की थी। इसमें एक गोल यह भी था कि भारत और वैश्विक स्तर पर कैश को पीछे कर डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दिया जाएगा। उनके मुताबिक नोटबंदी फैसले के चार हफ्ते पहले यूएसएआईडी ने कैटलिस्ट नाम की स्कीम शुरू की, जिसका मकसद भारत में कैशलेस पेमेंट्स को बढ़ावा देना था। 14 अक्टूबर की प्रेस स्टेटमेंट कहती है कि कैटलिस्ट यूएसएआईडी और वित्त मंत्रालय की बीच साझेदारी का अगला दौर है। लेकिन अब यूएसएआईडी की वेबसाइट पर मौजूद प्रेस रिलीज में यह स्टेटमेंट अब दिखाई नहीं देता। लेकिन पहले नीरस दिखाई देने वाला यह बयान उस वक्त सच साबित हुआ जब 8 नवंबर को भारत में नोटबंदी का आदेश लागू हुआ। उन्होंने कहा कि कैटलिस्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आलोक गुप्ता हैं जो वॉशिंगटन के वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट के सीओओ रहे हैं। वह उस टीम का हिस्सा भी रहे हैं, जिन्होंने भारत में आधार सिस्टम को डिवेलप किया। वहीं स्नैपडील के पूर्व वाइस प्रेजिडेंट बादल मलिक को कैटलिस्ट का सीईओ बनाया गया है। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि कैटलिस्ट का मिशन कम आय वाले ग्राहकों और मर्चेंट्स के बीच डिजिटल पेमेंट्स में आने वाली समस्याओं को दूर करना है। हम एक स्थायी मॉडल बनाना चाहते हैं, लेकिन सरकार को भी इसके लिए काम करना होगा। मलिक ने सभी समस्याओं के बारे जो बताया था उनकी यूएसएआईडी की 2015 में आई रिपोर्ट में समीक्षा की गई थी। इस रिपोर्ट को साल 2016 में रिलीज किया गया था। यह रिपोर्ट भारतीय वित्त मंत्रालय के साथ नकदी विरोधी भागीदारी को लेकर थी। गांव ही नहीं, अब शहर में गूंजने लगे 'हम हैं धरा धाम' के नारे, 8 को आएंगे सिने अभिनेता राजपाल पूर्वांचल सेना और धरा धाम ट्रस्ट के तत्त्वावधान में 'एक कदम धरा के नाम' नामक निकाली गई रैली में उमड़ी भीड़ गोरखपुर। महानगर की सड़कों पर गुरुवार की सुबह 'हम हैं धराधाम' गूंज उठा। पूर्वांचल सेना के अध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप के नेतृत्व में धरा धाम की अवधारणा सर्वधर्म समभाव को मजबूत करने और 8 जनवरी को भस्मा-डवरपार स्थित 'धरा धाम' परिसर में होने वाले शिलान्यास समारोह में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित कराने के उद्देश्य से एक भव्य जागरूकता रैली निकली गई। 'एक कदम धरा के नाम' नामक यह रैली मुंशी प्रेम चंद्र पार्क से निकल कर शास्त्री चौक तक पहुंची। इस दौरान बच्चों ने पम्पलेट बांटे और 'हम हैं धरा धाम' के नारे लगाये। रैली के उपरांत धीरेंद्र प्रताप ने धरा धाम प्रमुख सौरभ पाण्डेय के विचारों से प्रभावित होकर 8 जनवरी को होने वाले धराधाम के शिलान्यास में अपने पूरे संगठन के साथ शामिल होने की प्रतिबद्धता जताई. इस दौरान जितेन्द्र प्रताप, सचिन कुमार, श्याम किशुन, बालमुकुंद वर्मा, योगेंद्र प्रताप, रामु चौहान, विजय कन्नौजिया, मंजेश कुमार, सतेंद्र, सनी कुमार निषाद, सविनय पाण्डेय आदि उपस्थित थे। गौरतलब है कि गांव भस्मा-डवरपार स्थित 'धरा धाम' परिसर में 8 जनवरी को दुनिया के सभी धर्मों के प्रतीक स्थल का शिलान्यास होगा। इस भव्य शिलान्यास समारोह में बतौर मुख्य अतिथि चर्चित सिने स्टार राजपाल यादव उपस्थित रहेंगे। धीरेन्द्र प्रताप ने लोगों से भारी संख्या में 8 जनवरी को भस्मा-डवरपार पहुंचने की अपील की।
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