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खादी के कैलेंडर पर मोदी से भड़का विपक्ष, साधा निशाना

नई दिल्ली। चर्खा, खादी और बापू इन तीनों को एक दूसरे से अलग करके नही देखा जा सकता। लेकिन अब इस फॉर्मूले में क्या बापू आउट और मोदी इन हो गए है। खादी विलेज इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन यानी केवीआईसी के इस साल के कैलेंडर और डायरी पर गांधी जी के बजाय मोदी जी चर्खा चलाते दिखे। इसका तुरंत विरोध शुरू हो गया इस आरोप के साथ कि मोदी गांधी जी की जगह लेने की कोशिश कर रहे है। जवाब में बीजेपी ने कहा है कि खादी को बढ़ावा देने के लिए जो प्रधानमंत्री मोदी ने किया है वो कभी पहले हुआ नहीं हुआ। खादी ग्राम्य उद्योग आयोग यानी केवीआईसी के कैलेंडर को लेकर विवाद हो गया है। इस बार के कैलेंडर और डायरी पर पीएम मोदी की चर्खा चलाते हुए तस्वीर छपी है। पिछली बार कैलेंडर पर महात्मा गांधी की तस्वीर छपी है। संस्था ने कहा है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि सिर्फ गांधी की तस्वीर ही छापी जा सकती है। पहले भी बिना गांधी की तस्वीर के खादी इंडिया का कैलेंडर छपता रहा है। पीएम मोदी इस वक्त खादी के सबसे बड़े ब्रांड अंबेसडर हैं, इसलिए उनकी तस्वीर छापी गई है। उधर मोदी की तस्वीर छपने पर केवीआईसी के कर्मचारियों ने भी काली पट्टी बांध कर विरोध किया है। कांग्रेस ने गांधी की जगह मोदी की तस्वीर छापने को पाप बताया है। केवीआीसी कैलेंडर को लेकर छिड़े विवाद पर कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीएम मोदी को आड़े हाथ लिया। उन्होने कहा कि मोदी पहले खुद को पटेल समझते थे, अब मोदी खुद को गांधी भी समझते हैं। पीएम ने नेहरू जी के बारे में अपमानजनक बातें बोली, आरएसएस ने विचारधारा के आधार पर गांधी जी की हत्या की। महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी ने इस मामले पर चुटकी लेते हुए कहा कि ये देश की सबसे अक्षम और निष्ठाहीन संस्था की विश्वसनीयता हासिल करने की कोशिश है। पीएम को इस संस्था का चेहरा बनने पर चिंता होनी चाहिए। खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर में महात्मा गांधी की जगह पीएम मोदी की तस्वीर लगाने पर केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने सफाई दी है। कलराज मिश्र ने कहा है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि केलेंडर में पीएम का फोटो कैसे लगी। गांधी की बराबरी कोई नहीं कर सकता। इधर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा है कि मोदी की तस्वीर को लेकर बेकार का विवाद पैदा किया जा रहा है। बीजेपी की सफाई है कि कैलेंडर पर गांधी की तस्वीर 7 बार पहले भी नहीं छपी है। पीएम मोदी ने खादी को बढ़ावा दिया है। पीएम ने खादी फॉर नेशन, खादी फॉर फैशन का नारा दिया। यूपीए के दौर में खादी की बिक्री में औसतन 5 फीसदी बढ़ी जबकि मोदी सरकार आने के बाद बिक्री 35 फीसदी बढ़ी है। मोदी सरकार गांधी दर्शन को घर-घर पहुंचा रही है। राजनीतिक विरासत की इस लड़ाई पर नजर डालें तो नेहरू, इंदिरा की विरासत को दरकिनार करने की कोशिश नजर आती है। मोदी सरकार ने अपनी इस निति के तहत आंबेडकर पर जोरशोर से कार्यक्रम किए। वल्लभ भाई पटेल की याद में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की योजना है। बीजेपी का जेपी की जयंती बड़े पैमाने पर मनाने फैसला है। नेहरू संग्रहालय की काया-पलट करने की योजना है। अब सवाल ये है कि क्या खादी के कैलेंडर पर मोदी की तस्वीर पर विवाद जायज है, क्या मोदी खादी के सबसे बड़े ब्रांड एम्बैसडर बन गए हैं, क्या मोदीगांधी की विरासत हथियाने की कोशिश कर रहे हैं मोदी? आज के आवाज़-अड्डा में इन्ही सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की जा रही है।
नियम नहीं है कि कैलेंडर पर महात्माद गांधी की ही तस्वींर लगे 
 खादी ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) के कैलेंडर और डायरी पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर पर विपक्ष के हमलों का केवीआईसी ने जवाब दिया है। उसने इस मामले पर हो रही राजनीति को आधारहीन और बेबुनियाद बताया है। केवीआईसी सूत्रों ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि इससे पहले भी कई बार केवीआईसी के सामानों पर बापू की तस्वीर नहीं थी। उन्होंने कहा कि साल 1996, 2005, 2011, 2013 और 2016 में भी आयोग के कैलेंडर और डायरी पर महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं लगाई गई थी। उन्होंने कहा कि एेसा कोई नियम नहीं है कि कैलेंडर पर बापू की तस्वीर होनी ही चाहिए। यह कहना गलत होगा कि बापू की तस्वीर को पीएम मोदी ने रिप्लेस कर दिया है। वहीं महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने कहा कि बापू की तस्वीर हटाने के पीछे केंद्र सरकार की सोची समझी रणनीति है, ताकि वह अपनी साख बढ़ा सके। तुषार ने मीडिया से कहा कि इस सरकार को गलतियां करने की आदत हो गई है, लेकिन यह गलती नहीं लगती। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए कहा कि वह केवीआईसी को भंग करें क्योंकि यह एक अयोग्य और अक्षम संस्था है। आपको बता दें कि खुद केवीआईसी के कर्मचारी भी यह कैलेंडर देखकर हैरान रह गए। वहीं बीजेपी सरकार ने शुक्रवार (13 जनवरी) को इस बारे में सफाई देते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने कहा कि मैंने अब तक कैलेंडर नहीं देखा है उन्होंने कहा कि कैलेंडर पूरे 12 महीने का है और सिर्फ एक ही पेज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोटो है। मिश्र ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि मोदी ने बापू की जगह ले ली है। मोदी की यह तस्वी र गांधी के सूत कातने वाले क्लाकसिक पोज में है। जहां एक साधारण से चरखे पर अपने ट्रेडमार्क पहनावे में खादी बुनते गांधी की ऐतिहासिक तस्वीलर थी, वहां अब कुर्ता-पायजामा-वेस्टीकोट पहने मोदी नया चरखा चलाते दिखते हैं।  
नजरियाः गांधी का खादी, मोदी का खादी नहीं है 
अरविंद मोहन, वरिष्ठ पत्रकार 
"खादी वस्त्र नहीं, विचार है", इस सूत्रवाक्य के रचयिता महात्मा गांधी की जगह, दस लाख का सूट पहनने वाले नरेंद्र मोदी का कैलेंडर पर आना खादी के कुछ कर्मचारियों को स्वाभाविक रूप से अखरा। कुछ कर्मचारियों ने काली पट्टी लगाकर इसका मौन विरोध किया तो उनकी गांधी भक्ति, खादी भक्ति से भी ज्यादा उनके नैतिक बल की तारीफ़ करनी चाहिए। शायद यह काम नरेंद्र मोदी ने न किया होगा, न कराया होगा, लेकिन हर सरकारी विज्ञापन, कलेंडर और डायरी का उपयोग जब उनकी छवि चमकाने के लिए हो रहा हो तब खादी आयोग क्यों पीछे रहता? सूचना-प्रसारण मंत्रालय के कैलेंडर में तो बारहों पन्नों की शोभा 'परिधान मंत्री' बढ़ा रहे हैं। गांधी की जगह मोदी की तस्वीर छापने की उनकी यह 'दिलेरी' तब और बड़ी लगती है जब हम पाते हैं कि पिछले साल भी ऐसी कोशिश हुई थी और तब भी विरोध हुआ था, बेशक पिछली बार मोदी जी एकदम मुख्य भूमिका में न दिखकर कहीं हल्का दर्शन भर दे रहे थे। खादी और चरखा हमारी आजादी की लड़ाई का कितना प्रमुख हिस्सा रहे हैं यह दोहराने की जरूरत नहीं है। हमारी दो-तीन बुनियादी जरूरतों में एक, वस्त्र की इस लड़ाई को गांधी ने टिकाऊ और विकेंद्रित विकास के साथ जोड़ा था। हम जानते हैं कि अगर बंदे में हो दम तो वह इतिहास की गति को भी मोड़ लेता है। गांधी ने पुराने चरखे से मैनचेस्टर की सबसे आधुनिक मिलों को पीट दिया था। और गांधी ने खुद तो खादी पहना ही, लगभग पूरे देश को खादी पहना दिया, खादी पहनने को शान की चीज़ बना दिया. पर खादी महज कपड़े भर का नाम नहीं है। गांधी ने इसे जीने के तरीक़े और सादगी से जोड़ा। और यह बात स्थापित हो गई कि खादी पहनकर दुराचार करना या शराब पीना पाप माना जाने लगा और शायद तभी कहा भी गया कि खादी वस्त्र नहीं विचार है. ये और बात है कि खादी पहनने वालों ने आज़ादी के बाद खादी पहनकर हर तरह के कुकर्म किए। खादी ग्रामोद्योग आयोग के कलेंडर पर वे एक आधुनिक किस्म के चरखे के सामने डिज़ाइनर खादी की पूरी पोशाक में गांधी बाबा की मुद्रा में बैठे चरखा चलाते दिखते हैं जो किसी हीरो-हीरोइन के कटआऊट के सामने खड़े होकर फोटो खिंचाने जैसा ही है। ऐसा फोटो खिंचाना एक शौक़ हो सकता है, किसी मौके की ज़रूरत हो सकती है। अब खादी आयोग ने इसे अपने कलेंडर पर छापने लायक फोटो माना, और वह भी गांधी जी को हटाकर, तो इसे सिर्फ़ किसी एक अधिकारी की कलाकारी, चापलूसी या कैरियर चमकाने की जुगत नहीं माना जा सकता। सल में, आज़ादी के बाद से खादी का उपयोग हमारा प्रभुवर्ग करता रहा है। दिखाने के लिए खादी और इस्तेमाल के लिए ब्रांडेड और महँगा विदेशी सामान। नाम खादी का लेना और लाभ मुनाफ़ाख़ोरों को पहुँचाना। खादी सिर्फ़ दिखावे और ज़बानी जमा-खर्च की चीज़ तो आज़ादी के बाद से ही बनने लगी थी, ख़ास तौर पर हमारे नेताओं और शासकों के लिए। जब राजीव गांधी ने नाइकी-प्युमा-एडिडास और ब्रैंडेड चश्मे के साथ खादी पहनना शुरु किया तो यह नए युग की निशानी थी। फिर डिजाइनर खादी, पोलीवस्त्र, विदेशी कंसल्टेंट और न जाने क्या-क्या बदलाव हुए. इन सबका कहीं विरोध भी हुआ तो बहुत सुनाई नहीं दिया। और साथ ही खादी के पारंपरिक केंद्र नष्ट होते गए, पावरलूम पर तैयार माल खादी के नाम पर बिकने लगा। खादी आयोग की अध्यक्षता खादी का काम करने वालों की जगह चापलूसों को या हारे हुए नेताओं को मिलने लगी। खादी को फ़ैब इंडिया और अनोखी जैसे व्यावसायिक ब्रांडों ने नए तरीक़े से बाज़ार में उतारा जबकि सरकारी खादी हाशिए की ओर खिसकती रही। आज मॉडलों की तरह हर अवसर पर कपड़े बदलने का चलन है, और ऐसा करने वालों में प्रधानमंत्री अकेले नहीं हैं बल्कि पूरे दिन एक कपड़ा पहने रहने वाले बड़े लोग कम ही रह गए हैं। और एक ही कपड़े को हर दूसरे-तीसरे दिन पहनना तो हमारे-आपके लिए भी ग़रीबी का प्रतीक बन गया है। ऐसे में अगर खादी बोर्ड मोदी जी के आने के बाद से खादी की बढ़ी बिक्री का आंकड़ा देकर उनकी तस्वीर को केंद्रीय बनाने का तर्क देता है तो उसकी सोच साफ़ दिखाई देती है। लेकिन वो सोच खादी के काम में जीवन लगाने वाले कर्मचारियों, देश के गांधी प्रेमियों, खुद गांधी और खादी के तर्क से उलट है। बाक़ी देश में न सही, कम-से-कम गांधीवादी संस्थाओं में तो गांधी का तर्क ही चलना चाहिए। मोदी जी के लिए वस्त्र और विचार में फर्क हो सकता है, खादी के लिए वस्त्र और विचार में अंतर नहीं है।
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