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13 साल की उम्र में बाल कलाकार से शुरू किया करियर, विपक्ष को चुनौती देकर बनी थीं तमिलनाडु की सीएम  
चेन्नई (संतोष तिवारी)। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता का सोमवार ( 5 दिसंबर) को चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में 68 की आयु में निधन हो गया। छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रह चुकीं जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को मैसूर के एक परंपरागत तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जब वो दो साल की थीं तो उनके पिता का निधन हो गया था। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने 1961 में महज 13 साल की उम्र में बाल कलाकर के तौर पर फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। 1964 में कन्नड़ फिल्म चिन्नादा गोमबे (सोने की गुड़िया) से उन्होंने व्यस्क भूमिकाएं करनी शुरू की। उन्होंने फिल्मी जीवन की शुरुआत भले ही कन्नड़ फिल्मों से की हो लेकिन उन्हें बड़ी सफलता तमिल फिल्मों में मिली। 1965 में जयललिता ने अपनी पहली तमिल फिल्म “वेन्निरा अदाई” (सफेद लिबास) की। इसी साल उन्होंने तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) के साथ भी पहली बार काम किया। एमजीआर और जयललिता की जोड़ी सुनहरे परदे पर हिट रही। दोनों ने एक साथ 28 फिल्मों में लीड रोल किया। 1970 के दशक में दोनों ने अज्ञात कारणों से एक साथ फिल्में करनी बंद कर दी थीं। दोनों ने आखिरी बार 1973 में आई फिल्म पट्टीकट्टू पोनैया में काम किया था। हालांकि जयललिता 1980 तक फिल्मों में काम करती रहीं। उन्होंने अपने करीब बीस साल लंबे फिल्मी करियर में करीब 300 फिल्मों में काम किया। उन्होंने कुछ हिंदी और एक अंग्रेजी फिल्म में भी अभिनय किया था लेकिन वहां वो सफलता का स्वाद नहीं चख सकीं। फिल्मों में जयललिता के मेंटर रहे एमजीआर राजनीति में भी उनके गुरु बने। 1977 में एआईएडीएमके के नेता के तौर पर एमजीआर पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उनके पीछे-पीछे जयललिता भी आज्ञाकारी शिष्या की तरह 1982 में एआईएडीएमके की सदस्य बनकर राजनीति में आ गईं। 1983 में उन्हें पार्टी के प्रचार विभाग का सचिव बनाया गया। 1984 में एमजीआर ने उन्हें राज्य सभा का सांसद बनाया। हालांकि कुछ समय बाद ही एमजीआर से उनके मतभेद शुरू हो गए। जब 1987 में एमजीआर का देहांत हुआ तो पार्टी में विरासत की जंग छिड़ गई। पार्टी का एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था तो दूसरा धड़ा जयललिता के साथ। एआईएडीएमके के कुल 132 विधायकों में से 97 के समर्थन से जानकी 1988 में राज्य की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन राजीव गांधी की तत्कालीन केंद्र सरकार ने 21 दिन बाद ही उनकी सरकार को बरखास्त कर दिया। 1989 के तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में एआईएडीएमके की अंदरूनी कलह का साफ असर दिखा और डीएमके सत्ता में वापस आ गई। जयललिता के गुट को चुनाव में 27 सीटें मिली थीं वहीं जानकी गुट को महज दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव में करारी हार के बाद जानकी ने राजनीति से किनारा कर लिया और एआईएडीएमकी और एमजीआर की राजनीतिक विरासत की एकमात्र उत्तराधिकारी जयललिता बन गईं। तमिलनाडु और जयललिता के राजनीतिक इतिहास में 25 मार्च 1989 का दिन काफी अहम है। उस दिन विधान सभा के अंदर क्या हुआ इस पर विवाद है लेकिन इतना तय है कि डीएमके और एआईडीएमके विधायकों की हाथापाई के बीच जयललिता के संग सदन में अभद्रता की गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जयललिता उस दिन सदन से यह कहते हुए बाहर चली गईं कि वो दोबारा मुख्यमंत्री बनकर ही विधान सभा में वापस आएंगी। विधान सभा में हुई बदसलूकी के महज दो साल बाद जयललिता के नेतृत्व वाले एआईएडीएमके और कांग्रेस गठबंधन ने राज्य की 234 सीटों में से 225 पर जीत हासिल कर ली और जयललिता पहली बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही वक्त बाद जयललिता पर आय से अधिक संपत्ति, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था इत्यादि के आरोप लगने लगे। नतीजा ये हुआ कि जब 1996 में विधान सभा चुनाव हुए तो उनकी पार्टी महज चार सीटों पर सिमट गई। इसी साल उनके खिलाफ करुणानिधि सरकार ने भ्रष्टाचार के करीब 48 मामले दर्ज कराए। जयललिता को कई महीने जेल में बिताने पड़े। 1997 में सुब्रमण्यम स्वामी ने उनके ऊपर करीब 66 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति हासिल करने का मामला दर्ज कराया जो एक दशक से अधिक समय तक जयललिता के गले की फांस बना रहा। साल 2001 के विधान सभा चुनाव में एआईडीएमके ने 196 सीटों पर जीत हासिल करके भारी बहुमत हासिल किया। भ्रष्टाचार के मुकदमे के कारण खुद जयललिता चुनाव नहीं लड़ सकी थीं फिर भी चुनावी जीत के बाद उनकी पार्टी ने उन्हें ही सीएम चुना। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। उन्होंने अपनी जगह ओ पनीरसेल्वन को सीएम बनाया। साल 2003 में हाई कोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार के कई मामलों में बरी किए जाने के बाद उन्हें विधान सभा चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गई। चुनाव जीतकर वो फिर राज्य की सीएम बनीं। साल 2006 के विधान सभा चुनाव में उन्हें डीएमके गठबंधन के हाथों हार का सामना करना पड़ा। साल 2011 के विधान सभा चुनाव में एआईडीएमके को 203 सीटों पर जीत मिली। जयललिता एक बार फिर राज्य की सीएम बनीं। 27 सितंबर 2014 को अदालत ने उन्हें आय से अधिक संपत्ति मामले में चार साल की सजा सुनाते हुए 100 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। जयललिता को करीब एक महीने जेल में रहना पड़ा। उनकी जगह ओ पनीरसेल्वम एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। साल 2015 में हाई कोर्ट ने जयललिता को आय से अधिक संपत्ति मामले में बरी कर दिया और वो फिर से राज्य की सीएम बन गईं। साल 2016 में हुए विधान सभा चुनाव में जयललिता ने रिकॉर्ड जीत हासिल की। तमिलनाडु के इतिहास में 32 साल बाद किसी पार्टी को लगातार दूसरी बार बहुमत मिला था। तीन दशक पहले ये कारना उनके राजनीतिक गुरु एमजीआर ने किया था। मई 2016 में जयललिता छठवीं बार राज्य की सीएम बनीं। 68 वर्षीय जयललिता 22 सितंबर को तबीयत खराब होने के कारण अपोलो अस्पताल में भर्ती हुईं। राहुल गांधी, अमित शाह और अरुण जेटली जैसे कई प्रमख नेताओं को अस्पताल में उनके मिलने नहीं दिया गया। रविवार (3 दिसंबर) को पहले खबर आई कि वो समान्य वार्ड में स्थानांतरित कर दी गईं और किसी भी वक्त घर जा सकती हैं लेकिन थोड़ी देर बाद ही ये खबर आने लगी कि उन्हें कार्डिएक अरेस्ट हुआ। सोमवार को सुबह से ही उनके स्वास्थ्य को लेकर रहस्य का वातावरण बना रहा और शाम को उनके निधन की सूचना आई। रविवार को उन्हें हार्ट अटैक आया था इसके बाद सोमवार सुबह से उनकी स्थिति नाजुक बताई जा रही थी सोमवार देर रात उनके निधन की घोषणा कर दी गई।  
मौत से 74 दिन लड़ीं, 68 साल की उम्र में हारीं 
तमिलनाडु की मुख्यममंत्री जे जयललिता के निधन की घोषणा हो गई है। सोमवार देर रात पार्टी ने उनकी निधन की आधिकारिक घोषणा कर दी है। राज्य में तीन दिन के शोक की घोषणा की कर दी गई है। तीन दिन तक राज्य में स्कूल और कॉलेज बंद रहेंगे। 68 वर्ष की जयललिता को रविवार को अचानक दिल का दौरा पड़ा था। अस्प ताल की एक्जीवक्यू्टिव डायरेक्टेर संगीता रेड्डी ने कहा है कि ‘अपोलो और एम्सज के डॉक्टीर्स की एक बड़ी टीम सभी जीवनरक्षक उपाय कर रही है।’ इसके बाद सोमवार दोपहर के समय कुछ तमिल टीवी चैनलों ने जयललिता की मौत की खबर चलाई थी, जिसका अस्पहताल ने खंडन किया है। अस्पेताल के बाहर उनके हजारों समर्थक इकट्ठे हो रखे हैं। हालांकि बाद में देर रात करीब 12 बजे इस बात की पुष्टि कर दी गई। बुखार एवं निर्जलीकरण की शिकायत के चलते जयललिता को 22 सितंबर को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। करीब 74 दिन तक जयललिता मौत से लड़ती रही। कुछ दिन पहले अपोलो हॉस्पिटल्स के चेयरमैन प्रताप सी रेड्डी ने कहा था कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ‘‘पूरी तरह स्वस्थ हो गई हैं।’’ अस्प ताल की ओर से चार दिसंबर को जारी बुलेटिन में कहा गया, ”कार्डियोलॉजिस्टस, पल्मोमनोलॉजिस्टल और क्रिटिकल केयर स्पेषशलिस्ट्सन उनका ट्रीटमेंट और मॉनिटरिंग कर रहे हैं। वह एक्ट्रा कार्पोरियल मेमब्रेन हर्ट असिस्टक डिवाइस पर हैं। लंदन से डॉक्ट र रिचर्ड बैली से भी परामर्श लिया गया है।” पुलिस ने अब संभावित शोक को देखते हुए इंतजाम कर लिए हैं। हॉस्पिटल जाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए गए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट करके दुख प्रकट किया है। जयललिता 1982 में एआईएडीएमके की सदस्य बनकर राजनीति में आईं। 1983 में उन्हें पार्टी के प्रचार विभाग का सचिव बनाया गया। 1984 में एमजीआर ने उन्हें राज्य सभा का सांसद बनाया। हालांकि कुछ समय बाद ही एमजीआर से उनके मतभेद शुरू हो गए। जब 1987 में एमजीआर का देहांत हुआ तो पार्टी में विरासत की जंग छिड़ गई। पार्टी का एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था तो दूसरा धड़ा जयललिता के साथ। इसके बाद से जयललिता तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में रही। 2016 में दूसरी बार विधानसभा का चुनाव जीतनी वाली वो एमजीआर के बाद दूसरी नेता बनी।
एक साधारण महिला एसे असाधारण बनीं जयललिता 
68 साल की जयललिता 22 सितंबर से अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं. पत्रकारों और विरोधियों को मानहानि के आरोपों में अदालत में खींच लेने वाली एक सख़्त राजनेता, माफ़ न करने वाली लीडर, बदला लेने वाली विरोधी, गैरदोस्ताना रवैया रखने वाली असहनशील और निष्ठुर मुख्यमंत्री की छवि ने उनके राज में लिए गए अच्छे प्रशासनिक फ़ैसलों को छाया में ढके रखा. प्रशंसकों और निष्ठावान वोटरों के लिए वो 'अम्मा' थीं. गुलाब की तरह खूबसूरत महिला. फ़िल्म से राजनीति में आए एमजीआर की राजनीतिक वारिस...एमजीआर ने ही ऑल इंडिया द्रविड मुनेत्र कडगम (एआईएडीएमके) की नींव रखी थी. बीबीसी वर्ल्ड के कार्यक्रम हॉर्ड टॉक के लिए करण थापर ने जयललिता का इंटरव्यू किया था. समर्थकों के लिए जयललिता एक ऐसी महिला थीं, जिन्हें उनके विरोधियों ने खूब परेशान किया. खासकर विरोधी दल डीएमके नेता करुणानिधि ने. उनके समर्थकों पर लुभावनी योजनाओं की बौछार होती रहती थी. मसलन मिक्सी, ग्राइंडर, सिलाई मशीन, बकरी, उनके बच्चों के लिए साइकिल और लैपटॉप. उन्हें राशन की दुकानों से बीस किलो चावल के बैग मुफ़्त मिलते थे. उन्हें 'अम्मा कैंटीन' से रियायती दर पर खाना उपलब्ध कराया जाता था. समर्थकों के नज़रिए से देखें तो हक़ीकत ये थी कि उनकी पार्टी के नेता, उनके मंत्री अजीबो-गरीब तरीके से उनके कदमों में सर झुकाते थे. जब वो हेलीकॉप्टर में सवार होकर आसमान में उड़ान भरती थीं तब भी वो ज़मीन पर उसी तरह दंडवत की मुद्रा में होते थे जैसे कि उनकी मौजूदगी में किया करते थे. वो ऐसा इस वजह से करते थे क्योंकि ये साफ था कि जयललिता ही पार्टी का चेहरा हैं. वो चाहते थे कि जयललिता की उनके बारे में राय अच्छी रहे जिससे चुनाव के दौरान उन्हें टिकट मिल सके. उनके लिए जयललिता के नाम पर चुनाव में जीत दर्ज कर लेना भर ही काफी था. उनका व्यक्तित्व ऐसा ही था. साफ रंग और खूबसूरत दिखने वाली महिला. उन्होंने भद्र और सम्मानित महिला की छवि तैयार करने के लिए जान बूझकर खुद को ग्लैमर से दूर कर लिया. एक ऐसी महिला जो पूरी दृढ़ता के साथ राज चला सकती है. वो अपनी ताकत से वाकिफ थीं और अपनी कमजोर नसों को भी पहचानती थीं. वो कॉन्वेंट में पढ़ी थीं. मिज़ाज से किसी भी तरह की बकवास से दूर रहने वाली महिला थीं. जब पुरुष उनके पैरों में पड़ जाते थे तो उन्हें यकीनन खुशी मिलती होगी. ये सिलसिला साल 1991 में उनके पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ शुरु हो गया था. तब उनकी उम्र 40 साल से थोड़ी ही ज्यादा थी. लेकिन उन्होंने ऐसा करने वालों को नहीं रोका. इसकी वजह से उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं से एक दूरी कायम रखने में मदद मिली. जयललिता कभी नहीं चाहती थीं कि वो उनसे वाकिफ हो पाएं. उनके शासन के दौरान सत्ता के गलियारों में डर का माहौल रहता था. मंत्री और उच्चाधिकारी चुप्पी साधे रहते थे. वो उनकी मर्ज़ी के बिना एक भी शब्द बोलने से डरते थे. उनके करिश्मे और पार्टी की उन पर निर्भरता ने एक ऐसा रिश्ता बना दिया जिसे बाहरी लोगों के लिए समझना मुश्किल है. हालांकि, वो एक साधारण महिला ही थीं जिनकी ज़िंदगी असाधारण बन गई. उनका नाता कर्नाटक से था. उन्होंने एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था. वो एक अभिनेत्री रह चुकी थीं. उनके साथ ऐसी तमाम चीजें जुड़ी थीं जो उन्हें कामयाब होने से रोक सकती थीं लेकिन वो एक द्रविड पार्टी की प्रमुख बनीं, जिसकी नींव ब्राह्मणों के विरोध के लिए पड़ी थी और वो अपने मेंटर एमजीआर की जगह लेने में कामयाब रहीं जिन्हें 'देवतुल्य' माना जाता था. उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों में कई अदालती मामले थे. आय से अधिक संपत्ति के मामले में उन्हें बरी किए जाने के आखिरी मामले में उन्हें कुछ देर के लिए जेल भी जाना पड़ा लेकिन फिर उन्होंने कोर्ट से ही इस मामले में राहत मिली. इन तमाम मामलों के बावजूद वो अपनी पार्टी और राज्य के लिए किवदंती सरीखी थीं.
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