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और जटिल हो रही कश्मीर की समस्या, अशांत फार्मूले से शांति का सोल्यूशन ढूंढने का प्रयास, मोदी सरकार फेल!

राजीव रंजन तिवारी 
आखिरकार प्रधानमंत्री ने महीने भर बाद कश्मीर की स्थिति पर चुप्पी तोड़ी। इस बार भी उन्होंने ऐसी जगह बयान दिया, जहां उसकी जरूरत नहीं थी। वे भारत छोड़ो आंदोलन की जयंती के मौके पर मध्यप्रदेश में चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली गए थे। पिछले एक महीने से कश्मीर में जो स्थिति बनी हुई है, वह कोई सामान्य घटना नहीं है, जिसे पीएम नजरअंदाज भी कर दें तो बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। अगर वे सचमुच इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत में यकीन करते हैं तो उन्हें इस मसले पर आंख चुराने की क्या जरूरत है! अलगाववादी बुरहान वानी के जनाजे के वक्त पैदा हुई आंदोलन की स्थिति और फिर हिंसा पर उतारू भीड़ पर काबू पाने के लिए छर्रे वाली बंदूक के इस्तेमाल को लेकर जो मामला गरम हुआ उस पर पीएम ने कुछ बोलने से क्यों गुरेज किया? किसी मसले पर प्रधानमंत्री के बोलने का असर पूरी पार्टी पर दिखता है, मंत्रालयों के कामकाज पर नजर आता है। इसलिए उनकी चुप्पी को लेकर तरह-तरह के सवाल उठते रहे। जो बात उन्होंने मध्यप्रदेश में जाकर कही, उसे संसद में कहने से वे क्यों बचते रहे। कश्मीर देश का सबसे संवेदनशील राज्य है और वहां के युवा किस कदर गुमराह हो रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। अगर उन्हें सचमुच अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों पर यकीन है तो उन्हें कश्मीर के अवाम से संवाद का रास्ता तलाशना चाहिए। केंद्र की संवादहीनता का ही नतीजा है कि कश्मीरी युवा फिर कश्मीर की आजादी की मांग उठाने लगे हैं। क्या इससे पार पाने को लेकर पीएम को चिंतित नहीं होना चाहिए? संसद सत्र के आखिरी दिन यानी 12 अगस्त को कश्मीर में कर्फ्यू लगे हुए एक माह से अधिक यानी करी 36 दिन बीत चुके है। कश्मीर में हालात को समान्य बनाने के लिए संसद भवन में 12 अगस्त को हुई सर्वदलीय बैठक हुई। पर अफसोस कि सरकार कश्मीर को लेकर जितना आज चिंतित दिख रही है, उतना पहले दिखी होती तो शायद हालात बिगड़े ही नहीं होते। दरअसल, कश्मीर में 8 जुलाई को कथित आतंकवादी बुरहान वानी (जबकि कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने बुरहान वानी को आतंकी मानने से इनकार कर दिया है।) की एक मुठभेड़ में हुई मौत के बाद से हिंसा शुरु हुई थी, जिससे हालात बिगड़ गये थे। कश्मीर और दलित मामले में केंद्र सरकार ने सब कुछ संसद सत्र के बिल्कुल आखिर में किया। जम्मू कश्मीर में अशांति का माहौल पिछले 36 दिन से है। राज्य के कई हिस्सों में हिंसा भड़की और अभी तक कई इलाकों में कर्फ्यू लगी है। इसमें 15 अगस्त के बाद ही ढिलाई दी जाएगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार अलगाववादियों के उदारवादी धड़े के साथ बातचीत के लिए तैयार है। यह काम बहुत पहले भी किया जा सकता था। जब राजनाथ सिंह कश्मीर दौरे पर गए थे, उसी समय वे अपने साथ सभी पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल ले जा सकते थे और हुर्रियत आदि के नेताओं से बात कर सकते थे। लेकिन तब सरकार ने ऐसा नहीं किया। बताया जा रहा है कि सरकार ने पहले यह मैसेज जाने दिया कि वह कश्मीर के मामले में बहुत सख्त है। जब सरकार की सख्ती का प्रचार हो गया, तबतक संसद सत्र का आखिरी दिन आ गया। माना जा रहा है कि सत्र खत्म होने के बाद इस पर से फोकस हट जाएगा। इस बीच 10 अगस्त को राज्यसभा में चर्चा के दौरान कई बातों का खुलासा भी हुआ। सरकार के विरोधी एनसीपी के नेता डीपी त्रिपाठी ने बताया कश्मीर में कर्फ्यू अब तक का सबसे लंबा कर्फ्यू नहीं है। 1969 में गुजरात के अहमदाबाद में दंगों के बाद 65 दिन तक लगातार कर्फ्यू जारी रही थी। कहने की जरूरत नहीं है कि उस समय गुजरात में किसकी सरकार थी। वर्ष 1947 से आज तक कश्मीर की आजादी की बात करने वाले वे लोग है जिन्होने धर्म के आधार पर दो देश की थ्योरी में मुसलमानों का पाकिस्तान बनवाया। यदि कश्मीर को मुस्लिम बहुसंख्या के आधार पर आजादी देनी है तो फिर भारत राष्ट्र-राज्य के अस्तित्व, उसकी सेकुलर बुनावट का क्या होगा? कश्मीरी और उसके पीछे पाकिस्तानी पिछले 70 साल से बता रहे है कि दो धर्म साथ नहीं रह सकते। उसी के लिए बुरहान वानी ने बंदूक उठाई। उसके माता-पिता ने उसकी मौत के बाद कहां था कि वह इस्लाम की राह पर शहीद हुआ। बुरहान कश्मीर में इस्लामी निजाम कायम करने के लिए लड़ा। बुरहान वानी के जनाजे में लाखों यूथ इकठ्ठा हुए तो उनके आजादी के नारे कश्मीर को इस्लामी देश बनाने के लिए थे। फिलहाल कश्मीर का मसला यक्ष प्रश्न है और मोदी सरकार में भी इस पर नया कुछ नहीं हुआ तो इस देश का भगवान मालिक है। कश्मीर घाटी के अलगाववादी, सीमा पार बैठे आतंकी और पाकिस्तान के हुक्मरानों को लग रहा है कि कश्मीर में आजादी की नई लहर आई हुई है। तभी हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं से लेकर लश्कर-ए-तैयबा के हाफिज सईद, हिज्बुल मुजाहिदीन के सैयद सहाउद्दीन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सब एक जैसी भाषा बोल रहे हैं। इनकी कोशिश घाटी में शांति लौटने की हर कोशिश को फेल करने की है। एक तरफ पाकिस्तान के हुक्मरान भारत को कूटनीतिक रूप से उकसा रहे हैं तो आतंकी संगठन सुरक्षा बलों को उकसा रहे हैं। कुछ दिन पहले नियंत्रण रेखा पर मुठभेड़ में आतंकियों ने बीएसएफ के तीन जवानों को मारा और बयान दिया कि बुरहान की मौत का बदला लिया है। इन हालातों में एक तरफ हिजबुल मुजाहिदीन के सईद सलाउद्दीन है तो दूसरी ओर जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती है। एक ने पाकिस्तान से कहां कि कश्मीरियों की समझौते में दिलचस्पी नहीं है। यह बात मतलब नहीं रखती कि पाकिस्तान या दुनिया व संयुक्त राष्ट्र उनका समर्थन करे या नहीं करे। कश्मीरियों ने खून के आखिरी कतरे तक लडने की कसम खाई है। पिछले दिनों गृह मंत्रालय की बैठक में शामिल होने आईं सीएम महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली में पीएम मोदी से अपील की कि कश्मीरियों का दिल जीते। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जो काम शुरू हुआ था, वहीं काम मोदी करे। जाहिर है हिजबुल मुजाहिदीन के कथित आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में जो अशांति है उसने हिजबुल के सलाउद्दीन को बेखौफ बनाया है। जानकार बताते हैं कि पिछले 15 साल में कश्मीर घाटी के बाद कैसे एक डिजाइन के तहत जम्मू की जनसंख्या की संरचना बदली है। जम्मू का इलाका भी कैसे आतंकवाद की चपेट में आया है और कैसे फिर से कश्मीर में बाहर से आए आतंकियों को पनाह व समर्थन मिलने लगी। बहरहाल, संसद सत्र के आखिरी दिन यानी 12 अगस्त को भारत प्रशासित कश्मीर में जारी कर्फ्यू, हिंसा और मौत पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए लोकसभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया। लोकसभा में सर्वसम्मित से ये विचार व्यक्त किया गया कि भारत की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। कश्मीर पुलिस के अनुसार कई दिनों से जारी तनाव में सुरक्षाकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक मुठभेड़ की 1100 घटनाएं हुई हैं। करीब 60 लोगों की मौत हुई है और 3000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। 400 युवा आंखों में छर्रे या पैलेट लगने से घायल हुए हैं। आखिरकार, 12 अगस्त को कश्मीर मुद्दे पर हुई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह कश्मीवर के लोगों के प्रति एक दृष्टिकोण बनाए और उनसे बात करे। यह भी फैसला हुआ कि सभी दलों के लोग कश्मीर जाकर अपने-अपने धड़ों को समझाएं-बुझाएं। फिलहाल, कश्मीर में एहतियाती तौर पर बीएसएनएल की पोस्टपेड सुविधा को छोड़कर बाकी सभी मोबाइल टेलीफोन सेवाओं पर प्रतिबंधित कर दिया गया है। जानकारों का कहना है कि कश्मीर के हालात को सामान्य बनाने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल रोक देना चाहिए। सीआरपीएफ और पुलिस जैसे सुरक्षा बल भीड़ को नियंत्रित करने में फेल हो गए हैं। वैसे कश्मीर की जो ज़मीनी सच्चाई है, उससे लोगों को बहुत उम्मीद नहीं है कि वहां शांति बहाल हो सके। खैर, देखना यह है कि सरकार क्या कर पाती है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित स्तंभकार हैं। उनसे फोन नं. 08922002003 पर संपर्क किया जा सकता है)
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