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‘सरकारों ने आजादी की मूल भावनाओं की कर दी हत्या’

बलिया। मुसलमानों से सेक्यूलरिज्म के नाम पर सिर्फ वोट लेने का काम पार्टियों ने किया है और बदले में उन्हें सिर्फ दंगे, फर्जी एनकाउंटर और फर्जी मुकदमें ही दिए हैं। इसलिए अब मुसलमानों को खुद अपने राजनीतिक अधिकार के लिए आगे आना होगा और ये तभी सम्भव है जब जमीनी स्तर पर मुस्लिम समाज अपने सवालों को लेकर संघर्ष करे। इस संघर्ष में सामाजिक न्याय के नाम पर सपा और बसपा जैसी पार्टियों से ठगा गया पिछड़ा और दलित समाज उसके स्वाभाविक साथी होंगे। 1947 में मिली आजादी देश की गरीब, दलित और मुसलमानों के लिए झूठी साबित हुई है। इन वर्षों में सरकारों ने आजादी और संविधान की मूल भावनाओं की हत्या की है। संविधान के इन हत्यारों के खिलाफ जनसंघर्ष ही वास्तविक आजादी का रास्ता तैयार करेगा। रिहाई मंच इस बदलाव की राजनीति के लिए शुरूआती जमीन तैयार करने का प्रयास कर रहा है। ये बातें रिहाई मंच आजमगढ़ मंडल प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर बलिया के ऐतिहासिक बापू भवन में आयोजित ‘वर्तमान राजनीति और मुसलमान’ विषयक सम्मेलन में कहीं। गौरतलब है कि यह वही ऐतिहासिक भवन है जहां 1942 में बलिया की आजादी की घोषण हुई थी। श्री संजरी ने कहा कि सपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुसलमानों को सरकार बनते ही छोड़ दिया जाएगा, जो बेगुनाह दस-दस साल जेल में रहने के बाद बरी हुए हैं उन्हें मुआवजा और पुर्नवास दिया जाएगा, सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाएगा, मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन एक भी वादा सपा सरकार ने पूरा नहीं किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों में राजनीतिक चेतना नहीं होने के कारण ही मुलायम सिंह जैसे लोगों का राजनीतिक उदय हुआ। जिन्होंने अपनी संघी मानसिकता के तहत ही आजमगढ़ में एक ऐसे गांव तमौली को गोद लिया जिसमें एक भी मुसलमान नहीं हैं। वहीं पूरे देश में दलितों से जैसे अम्बेडकर द्वारा जनपक्षधर और सामंतवाद विरोधी संविधान लिखने के लिए उन पर हमले करके उनसे बदला लिया जा रहा है। उनके हिस्से की जमीन छीन कर अडानी और अम्बानी को मुफ्त में दी जा रही है। गुजरात में उठा दलित विद्रोह जिसमें मुसलमान उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहा है इतिहास को नई दिशा देने जा रहा है। बदलाव की इस आंधी में सिर्फ मोदी ही नहीं उड़ेंगे सेक्यूलर और सामाजिक न्याय के नाम पर वोट पाने वाले धोकेबाज दल भी उड़ने जा रहे हैं। रिहाई मंच बलिया इकाई के अध्यक्ष डाॅक्टर अहमद कमाल ने कहा अखिलेश सरकार में जितने दंगे हुए हैं उतने दंगे सभी सरकारों ने मिलकर भी नहीं करवाए हैं। मुजफ्फरनगर से लेकर फैजाबाद तक दंगों के आरोपी सरकारी संरक्षण में खुलेआम घूम रहे हैं। सरकारी मशीनरी और उसका पूरा पुलिसिया अमला मुसलमानों से साम्प्रदायिक आधार पर सौतेला व्यवहार कर रहा है जिससे सूबे के मुसलमानों मंे डर और भय व्याप्त है। उन्होंने कहा कि सपा ने मुसलमानों से किए वादे तो नहीं निभाए वो इतनी दलित विरोधी पार्टी है कि उसके घोषणा पत्र में दलितों का जिक्र तक नहीं है। उन्होंने कहा कि अखिलेश सरकार में प्रदेश फर्जी मुठभेड़ों और हिरासती हत्याओं में शीर्ष पर पहंुच गया है। जिनमें सबसे ज्यादा दलित और मुसलमान मारे जाते हैं। उन्होंने कहा कि मथुरा में अखिलेश यादव के चाचाओं की काली सम्पत्ति के लिए इतना बड़ा हत्याकांड रच दिया गया। रिहाई मंच बलिया के महासचिव बलवंत यादव ने कहा कि सपा के समाजवाद में बलिया के शिवपुर दीयर में 60 दलितों और आदिवासियों के घर सामंतों ने फंूक दिए। लेकिन सपा विधायक नारद राय वहां झांकने तक नहीं गए। यहां तक कि दोषियों को बचाने का काम भी उन्होंने किया। बलवंत यादव ने कहा कि आजादी की लड़ाई में बलिया की ऐतिहासिक भूमिका को पुनः स्थापित करने के लिए जरूरी है कि सामंतों और साम्प्रदायिक तत्वों को बलिया की धरती से बेदखल किया जाए। वहीं रिहाई मंच नेता मंगल राम ने कहा कि बलिया की राजनीतिक और सामाजिक चेतना अभी भी सामंती मानसिकता से संचालित है। यहां आज भी दलितों को बात-बात पर सामंती और सवर्ण जाति के लोग उत्पीड़ित करते हैं। जिला प्रशासन उन पर सामंतों के झूठे तहरीरों पर मुकदमें लाद देता है। लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर वोट लेने वाले नेता और दल कुछ भी नहीं बोलते। इस राजनीति ने भी बलिया में सिर्फ सवर्ण और सामंती जातियों के नेताओं को ही मजबूत करने का काम किया है। वहीं रिहाई मंच सचिव मंजूर आलम ने शिवपुर दियर कांड में एसपी मनोज कुमार झा की भूमिका की जांच की मांग करते हुए कहा कि शिवपुर के दलितों और आदिवासियों ने घटना से पहले ही एसपी से मिलकर सामंतों से घर फंूक देने की मिलने वाली धमकी की लिखित सूचना दी थी। लेकिन सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त एसपी ने उनकी कोई मदद नहीं की। उन्होंने कहा कि बलिया के लिए यह शर्म की बात है कि उसके पुलिस कप्तान खुद खालिद मुजाहिद की हिरासती हत्या में 302 के आरोपी हैं और उनके खिलाफ निमेष जांच कमीशन ने बेगुनाह मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप में फंसाने के लिए सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होेंने कहा कि जिसे जेल में होना चाहिए उसे एसपी बनाकर जिले में भेजना सरकार की मंशा पर ही सवाल खडे़े कर देता है। सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए डाॅ इलियास ने कहा कि रिहाई मंच के इंसाफ के लम्बे संघष ने राजनीतिक धोकाधड़ी के शिकार कमजोर तबकों में उम्मीद जगाई है। रिहाई मंच ने उन सवालों को राजनीति के केंद्र में लाने का काम किया है जिस पर बोलने से कथित सेक्यूलर पार्टियां भी बचती रही हैं। मंच का विस्तार दमित तबकों के इंसाफ के संघर्ष का विस्तार साबित होने जा रहा है। इस मौके पर भाकपा माले के लक्ष्मण यादव, इंडियन पीपुल्स सर्विसेज के अरविंद गांेडवाना, पीयूसीएल के रणजीत सिंह, तनवीर उर्फ बब्बू, शैलेंद्र रवि, एडवोकेट मधुसूदन श्रीवास्तव, डाॅ हैदर अली खान, माकपा के रामकृष्ण यादव, तेजनारायण, विश्वनाथ चैधरी, धमेंद्र यादव आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
(रिपोर्टः मंजूर आलम, सचिव, रिहाई मंच, बलिया)
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