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स्मृति और अनुप्रिया के सहारे यूपी की जंग जीतने की कोशिश में भाजपा!

बीच में स्मृति ईरानी और सबसे दाएं अनुप्रिया पटेल
राजीव रंजन तिवारी
राजीव रंजन तिवारी 
वर्ष 2017 में होने वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तैयारियां आरंभ हो गई हैं। चुनाव की तैयारियों की झलक पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में भी देखने को मिली। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के सियासी महासमर में भाजपा अपने जिन दो मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को आगे कर चुनाव जीतना चाहती हैं, उनमें स्मृति ईरानी और अनुप्रिया पटेल के नाम की चर्चा है। दिलचस्प यह है कि ये दोनों नेत्रियां कथित रूप से विवादित हैं और इनके नाम पर अक्सर हल्ला-हंगामा होते रहा है। सनद रहे कि पिछले दिनों जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तब खबरों में विस्तार की बातें कम और स्मृति ईरानी तथा अनुप्रिया पटेल की चर्चाएं ज्यादा थीं। दरअसल, स्मृति से एचआरडी मंत्रालय छीने जाने की चर्चाएं गूंज रही थीं और अनुप्रिया का अपनी मां से झगड़ा का मामला सियासी सतह पर कुलांचे मार रहा था। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी को आगे कर चुनाव लड़ना चाहती है। इसकी भनक लगते ही भाजपा द्वारा स्मृति और अनुप्रिया को आगे करने की योजना बनाई गई है। यदि तुलनात्मक चर्चा करें तो प्रियंका गांधी साफ-सुथरी छवि वाली हैं तो स्मृति और अनुप्रिया के नाम विवादों की लम्बी फेहरिस्त है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर द्वारा काम आरंभ करने के बाद हताश भाजपा इन्हीं दोनों महिला नेत्रियों के भरोसे यूपी की चुनावी समर में फतह करने की तैयारी में है। गौरतलब है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटा कर स्मृति ईरानी को कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि शिक्षा संस्थानों से उनके टकराव के चलते सरकार को बदनामी झेलनी पड़ रही थी, इसलिए उनका मंत्रालय बदला गया। जबकि कुछ का कहना है कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें प्रचार-प्रसार की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, इसलिए उन्हें हल्के कामकाज में लगाया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी बदलने से खासकर शिक्षा जगत के लोग खुश हैं कि अब कुछ बेहतर फैसले हो सकेंगे। शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभालने के साथ ही स्मृति ईरानी विवादों में घिर गई थीं। निर्वाचन आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने खुद को स्नातक बताया था, पर बाद पता चला कि वे स्नातक पूरी नहीं कर पाई थीं। इसलिए सवाल उठने लगा कि जो खुद स्नातक नहीं है, उसे शिक्षा जैसे जिम्मेदार विभाग का कामकाज क्यों सौंपा जाना चाहिए? उन्हें यह विभाग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीबी होने की वजह से मिला था। मगर शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह के फैसलों और दूरदर्शिता की जरूरत होती है, उस कसौटी पर वे लगातार विफल नजर आर्इं। फिर हैदराबाद विवि के कुलपति को पत्र लिखने और विवि प्रशासन की ओर से लगातार पड़ते दबावों की वजह से रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर भी ईरानी को कठघरे में खड़ा होना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से जुड़े फैसलों को लेकर भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते रहे। संभव है, सरकार ने इस किरकिरी से बचने के लिए उनका मंत्रालय बदला हो। संसद के बजट सत्र में स्मृति ईरानी ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए जैसा तल्ख तेवर अपनाया उससे पार्टी का उन पर भरोसा बढ़ा। वैसे भी अभिनेत्री होने के नाते आम लोगों में उनका आकर्षण है और चुनाव प्रचार में उन्हें उतारा जाता रहा है। इसलिए पार्टी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में भाजपा उन्हें प्रचारक के रूप में उतारना चाहेगी। मगर, कामकाज बदल कर चुनाव प्रचार के लिए उन्हें अवकाश देने का फैसला तर्क से परे है। दरअसल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रहते हुए स्मृति ईरानी ने जैसी किरकिरी सरकार और पार्टी की कराई, वैसी किसी दूसरे मंत्री की वजह से नहीं हुई। जर्मन भाषा हटा कर सरकारी स्कूलों में संस्कृत पढ़ाने के उनके फैसले के चलते जर्मनी की सरकार के सामने भी केंद्र को सफाई देनी पड़ी थी। ईरानी के कामकाज को देखते हुए शायद प्रधानमंत्री को यह भी समझ में आया हो कि किसी को उपकृत करने की मंशा से मंत्री बना देने पर सरकार को इसी तरह परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फिर अचानक शिक्षा मंत्रालय से हटाकर कपड़ा मंत्रालय अगर मोदी के बहुत करीबी को दे दिया तो ये चर्चा होना लाजिमी है कि उनके पर कतर दिए गए। लेकिन राजनीतिक पंडित मानते हैं कि ये स्मृति ईरानी के पर कतरने की नहीं बल्कि पर फैलाने का इंतजाम किया है। स्मृति ईरानी की छवि जिस तरह से युवाओं में बढ़ रही है और जिस तरह से लोकसभा चुनाव से ही वह गांधी परिवार से उनके ही गढ़ में लोहा ले रही हैं, उन्हें यूपी महासमर का प्रणेता बनाया जा सकता है। बीजेपी लगातार यूपी के चुनावी महासंग्राम की न सिर्फ तैयारी में लगी है बल्कि विरोधी पार्टियों की चाल को भी पढ़ने में जुटी है। कांग्रेस में जिस तरह से यूपी में ब्रम्हास्त्र छोड़ने की तैयारी प्रियंका गांधी के रूप में किया जाना तय माना जा रहा है, उसी तरह से भाजपा भी स्मृति को सीएम कैंडिडेट के तौर पर यूपी चुनाव में उतार सकती है। कांग्रेस की प्रियंका गांधी से मुकाबला के लिए भाजपा नीत एनडीए की ओर से दूसरा नाम अनुप्रिया पटेल का है। अनुप्रिया मोदी सरकार में नया चेहरा हैं। उन्हें भी पांच जुलाई को राज्यख मंत्री की शपथ दिलाई गई। बीजेपी को शायद उनमें बड़ी संभावना दिखी है। खास कर यूपी चुनाव के संदर्भ में। बीजेपी मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया को भाजपा में लेकर ओबीसी चेहर के रूप में यूपी में प्रोजेक्टी कर सकती है। लेकिन, वह खुद पारिवारिक झगड़े में फंसी है। झगड़ा भी इस हद तक है कि अनुप्रिया पटेल को उन्हीं के अपना दल ने पार्टी से निष्कारसित कर दिया था। ऐसे में वह भाजपा के लिए कितना फायदेमंद हो पाएंगी, यह वक्ती ही बता पाएगा। मई में अपना दल में पारिवारिक विवादों के चलते अनुप्रिया पटेल को पार्टी ने बाहर कर दिया था। अनुप्रिया की मां कृष्णा पटेल ने मीटिंग की और अनुप्रिया को पार्टी से निकाले जाने का एलान किया। इसके पहले से ही पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई थी। इस घटना के बाद तो यह बंटवारा और मजबूत हो गया है। कई नेता खुल कर कृष्णा तो कुछ नेता अनुप्रिया के साथ खड़े होते दिख रहे हैं। अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल से खटपट नई नहीं है। यह तभी से शुरू हो गई थी जब कृष्णा ने बड़ी बेटी को पल्लवी पटेल को अपना दल का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया था। कृष्णा पटेल अपना दल की अध्यबक्ष हैं। इस पार्टी की स्थाापना कृष्णाष के पति और कुर्मी समाज के बड़े नेता सोनेलाल पटेल ने की थी। कृष्णा और अनुप्रिया के बीच पार्टी पर अपना वर्चस्व कायम करने को लेकर संघर्ष चल रहा है। पिछले साल अक्टूबर में कृष्णा ने अनुप्रिया को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटा दिया था। अब उन्हेंट पार्टी से ही निकाल दिया गया है। और इसकी वजह भी आश्चपर्यजनक बताई है। बैठक के स्थामन को लेकर अनुप्रिया को पार्टी से निकाला गया है। कृष्णा् पटेल के मुताबिक 5 मई को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक लखनऊ के दारुलशफा में होनी थी। बैठक के लिए बुक किए गए हॉल में पार्टी के सदस्य पहुंचे तो मैनेजर ने हॉल देने से मना कर दिया। कहा गया कि सांसद अनुप्रिया पटेल का पत्र आया है कि हॉल उनके नाम से बुक किया जाए। बकौल कृष्णा , इस वजह से पार्टी की मासिक बैठक प्रभावित हुई और पार्टी सदस्यों ने सर्वसम्मति से अनुप्रिया पटेल को बर्खास्त करने का निर्णय लिया। अनुप्रिया भले ही पहली बार मंत्री बनी हैं, पर राजनीति में वह एकदम नई नहीं हैं। मोदी लहर में जीत कर मिर्जापुर से संसद पहुंचने से पहले वह विधायक रह चुकी हैं। वह वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक थीं। सांसद बनने के बाद से मां के साथ उनकी अदावत बढ़ती ही चली गई। मां ने उन पर सियासी साजिश रचने और धोखाधड़ी कर उनके (राष्ट्रीय अध्यक्ष के) सभी अधिकार खुद हथिया लेने का आरोप भी लगाया है। उनकी ही पार्टी के दूसरे सांसद कुंवर हरिवंश सिंह ने दावा किया कि बीजेपी ने इस बारे में उनकी पार्टी से राय नहीं ली। बहरहाल, अब देखना यह है कि भाजपा अपने इन दोनों कथित विवादित नेत्रियों के भरोसे यूपी में क्या खास कर पाती है?       
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित स्तंभकार हैं। इनसे फोन नं.- 08922002003 पर संपर्क किया जा सकता है।)
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