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हमारे भीतर कट्टरता कैसे पैदा होती है?

रवीश कुमार
नई दिल्ली (रवीश कुमार)। भारत में सैकड़ों न्यूज़ चैनलों के साथ धर्म दर्शन के नाम पर कई चैनल लांच हुए हैं जो कई बार धर्म के नाम पर अंधविश्वास का प्रसार करते रहते हैं। इसके लिए कई प्रकार के बाबा, फकीर और मैसेंजर चैनलों के स्टूडियो में अवतरित हुए हैं। इनमें से कोई न कोई डॉक्टर होता है, इंजीनियर होता है, कई बार पुलिस वाला भी होता है। ये लोग आराम से विज्ञान की बातों को धर्म की किताबों से साबित करते रहते हैं कि कैसे धर्म विज्ञान से महान है। कहीं फिजिक्स का फार्मूला आसमानी किताबों की देन बता देते हैं तो कहीं रसायन शास्त्र को वैदिक मंत्रों की देन। हम सब सभी विषयों में पारंगत तो होते नहीं लिहाज़ा यही सोचते हैं कि सामने वाला बाबा फकीर बढ़िया बोल रहा है। ऐसे बाबाओं की एक और खूबी होती है। वो अंग्रेज़ी भी बोलते हैं। वैसे अंग्रेज़ी बोलने वाले भी ऐसे बाबाओं की चपेट में आ जाते हैं। यह प्रवृत्ति इस्लाम, हिन्दू ईसाई और अन्य धर्मों के नाम पर पसरी हुई है। ज़ाकिर नाईक भी पेशे से डॉक्टर रहे हैं। अंग्रेज़ी बोलते हैं। खुद को कई विषयों और कई धर्मों के ज्ञाता बताते रहते हैं। एक जीवन में अच्छे-अच्छे संत एक धर्म को नहीं समझ सके फिर भी ज़ाकिर नाईक कई धर्मों के चलते फिरते गाइड बुक जैसे अवतरित होते रहते हैं। अपना चैनल भी है। मुंबई के रहने वाले हैं। ज़ाकिर नाईक वहाबी इस्लाम प्रचारक हैं। वहाबी का मतलब यूं समझिये कि जो जैसा था वैसा ही आज हो की बात करने वाले। ज़ाकिर नाईक कहते हैं कि मन्नत मांगना, मज़ार पर जाना ग़ैर इस्लामी है। इन बातों को लेकर भारत में देवबंदी बनाम बरेलवी फिरका होता रहता है। ज़ाकिर नाईक ओसाम बिना लादेन को आतंकवादी नहीं मानते। वैसे तो अमरीका में ही कई अमरीकन ओसामा को अमरीका का खेल मानते हैं। नाईक अमरीका को आतंकी मानते हैं और अमरीका से लड़ने वाले हर आतंकी को अपना साथी बताते हैं। मुसलमानों को आतंकी हो जाने के लिए कहते हैं। ज़ाकिर नाईक से ही कहा जाना चाहिए वो क्यों नहीं अमरीका से लड़ने चले जाते हैं। धार्मिक शुद्धिकरण की विचारधारा कई बार आकर्षक लगने लगती है। एक सनक की तरह हावी होती है और कोई बंदूक लेकर जाता है और अमजद साबरी को गोली मार देता है। गनीमत है कि उसी पाकिस्तान में अमजद साबरी के जनाज़े में लाखों लोग उमड़ आते हैं। भारत में भी केरल में बड़ा सम्मेलन हुए जिसमें आतंक को ग़ैर इस्लामी बताया गया। जमीयत से लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तक सबने आतंकवाद को ग़ैर इस्लामी कहा है। बांग्लादेश हमले पर उर्दू अखबार इंकलाब के संपादक ने लिखा कि यह कुरआन पर हमला है। ज़ाकिर नाईक ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि वे आईएसआईएस को ग़ैर इस्लामी मानते हैं। हमें इस सत्य का सामना करना ही होगा कि दुनिया भर में धर्म के नाम पर ख़ूनी खेल चल रहा है। इसलिए मज़हब के बारे में भावुकता से सोचने का वक्त चला गया। कहीं कोई इसके नाम पर हमें सांप्रदायिक बना रहा है तो कहीं कोई आतंकवादी। कोई तो है जो हमसे खेल रहा है। ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया में इन पर बैन है और भारत के कई शहरों में इनके कार्यक्रमों पर रोक लगाई जा चुकी है। भारत के गृह राज्य मंत्री ने कहा है कि अगर बांग्लादेश आग्रह करेगा, तो हम नाईक को बैन कर सकते हैं। यह भी एक तथ्य है कि नाईक की बात से कई मुस्लिम धर्मगुरु भी नाराज़ हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद ने हमारे सहयोगी कमाल ख़ान से कहा है कि जो व्यक्ति यज़ीद की हिमायत कर रहा हो उससे ज़्यादा दहशतगर्द का हामी कौन हो सकता है। यज़ीद ने इमाम हुसैन को शहीद किया, उसकी हिमायत कर रहे हैं। इसका मतलब है कि आप दहशतगर्दी की हिमायत कर रहे हैं। प्रमोट कर रहे हैं। ज़ाकिर नाईक ने कहा है कि जो भी इस्लाम के दुश्मन के खिलाफ लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं। अगर वो अमरीका को आतंकित कर रहे हैं जो खुद आतंकवादी है तो मैं उनके साथ हूं। हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए। हम सभी को आतंक के हर ठिकानों और विचारों की पहचान करनी ही चाहिए जहां से इस जुनून को खुराक मिलती है। नौजवानों को बार- बार बताना ज़रूरी है कि हर धर्म के पास नाइंसाफी के तमाम किस्से हैं। पूरी दुनिया नाइंसाफी से भरी है। आतंकवाद उसका समाधान नहीं है। कई वर्षों से नाईक के विचार सार्वजनिक हैं पर ऐसी बात अब उठ रही है। नाईक की समीक्षा यू ट्यूब पर खूब हुई है। उनके डार्विन थ्योरी को चैलेंज करने वाली तकरीर का किसी ने बिंदुवार चुनौती दी है। गूगल में एक प्रसंग मिला कि श्री श्री रविशंकर और ज़ाकिर नाईक के बीच सार्वजनिक बहस हुई थी। बाद में एक वीडियो में श्री श्री रविंशकर ज़ाकिर नाईक की कई बातों को कुतर्क बताते हैं। श्री श्री की बातों को सुनते हुए आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे। हो सकता है नाईक ने भी उन्हें ऐसा ही कहा होगा। फिर भी श्री श्री रविशंकर और नाईक के बीच वाद-विवाद ही एक बेहतर विकल्प है। वैसे हमारे सहयोगी कमाल ख़ान को धर्मगुरु मौलाना इरफान मियां फिरंगीमहली ने कहा है कि नाईक के ऊपर पाबंदी लगा कर उसको जेल में ठूंस दिया जाए तो उसके लिए बहुत अच्छा होगा। ये दूसरा विकल्प है। एक तीसरा विकल्प है। टीवी की चर्चा जिसने ज़ाकिर नाईक को प्रसिद्ध किया। अब वही टीवी उन्हें आतंकवादी बता रहा है। टीवी को एक नया चेहरा मिल गया है जिसके नाम पर वो एक तबके को ऐसे चित्रित करेगा जैसे सारे नाईक की बात सुनकर ही खाना खाते हैं। चूंकि हम सब आतंकवाद के किसी भी सोर्स को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं इसलिए आंख कान खोलकर जाकिर नाईक की बातों की समीक्षा करनी ही चाहिए। (साभार एनडीटीवी इंडिया)
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