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उत्तर प्रदेश में बसपा बनाम क्षत्रिय स्वाभिमान की छिड़ी जंग

लखनऊ। हजरतगंज थाने में 22 जुलाई को जमा भीड़ जब मायावती मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी तो बहुजन समाज पार्टी के समर्थकों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। मायावती की चिंता की वजह उस वोट बैंक के हाथ से निकल जाने की थी जिसे अपनी तरफ आकर्षित करने की रणनीति बना रही थीं। इस भीड़ में क्षत्रिय समाज के लोगों की संख्या बहुतायत में थी। दरअसल, मायावती की रणनीति आगामी विधानसभा चुनाव में क्षत्रियों को सबसे अधिक टिकट देने की थी। वह ब्राह्मणों और दलितों के साथ क्षत्रियों को भी मिलाने की कोशिश में थीं। वर्ष 2007 के चुनाव में मायावती ने 86 ब्राह्मणों के साथ 45 क्षत्रियों को टिकट दिए थे और पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सक्षम हुई थीं। 2012 के चुनाव में मात्र 33 क्षत्रियों को टिकट दिए। मायावती ने 2017 में 50 क्षत्रियों को टिकट दिए जाने की रणनीति बनाई थी, लेकिन दयाशंकर सिंह कांड ने उनकी रणनीति में दरार पैदा कर दी है। बसपा समर्थकों का मानना है कि बसपाइयों के अतिरेक ने जीती बाजी पलट दी है। दयाशंकर सिंह की जुबान फिसलने से बसपा को जो फायदा हुआ था, उसपर पानी फिर गया है। हालांकि बसपा विधायक उमा शंकर सिंह कहते हैं कि यह लड़ाई क्षत्रिय बनाम बसपा न होकर, स्त्री सम्मान बनाम भाजपा ही है। उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती को जब 2012 के विधानसभा चुनाव में पराजय मिली थी तो उन्होंने इस हार का ठीकरा मुसलमानों द्वारा धोखा दिए जाने और अपने मूर्ति प्रेम पर फोड़ा था। बड़े-बड़े पार्कों में ढेर सारी मूर्तियां लगवाने को लेकर समाजवादी पार्टी ने मायावती को भ्रष्ट ठहराया और अपने इस अभियान में सफलता हासिल कर ली थी। जहां तक मुसलमानों का मुद्दा है, मायावती उससे भी उबर चुकी हैं। ‘मायावती कहने लगी हैं। मुसलमानों को आबादी के आधार पर आरक्षण दिलाने का वादा करने वाली सपा केवल धोखा दे रही है।’ विधानसभा चुनाव की तैयारियों में मायावती ने पार्टी में अनुशासनहीन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी। पार्टी विरोधी गतिविधियों में बसपा से निष्कासित होने वाले सिटिंग विधायकों की संख्या अब आठ हो गई है। वहीं, मायावती ने यह भी सुनिश्चित किया कि बसपा की किसी भी चुनावी रणनीति की हवा प्रतिद्वंद्वी पार्टियों को नहीं लगे। अब पार्टी के कैडर कैंप बंद कमरों में लगेंगे। पिछले दो महीनों में खुले में लगाए गए सभी कैडर कैंपों को मायावती ने खारिज कर दिया है। एक और परिवर्तन दिखा। बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती का जन्मदिन अपनी भव्यता और तड़क-भड़क के लिए जाना जाता है। उनका 60वां जन्मदिन एकदम अलग दिखा। न नोटों की माला लिए समर्थकों की कतार थी, न रमाबाई रैली स्थल पर कोई रैली। राजधानी में 12 मॉल एवेन्यू में मायावती के बंगले और बहुजन समाज प्रेरणा स्थल को छोडक़र कहीं और नीली रोशनी नहीं दिखी। एक तरह मायावती उन सारे छिद्रों को बंद करने में जुटी हैं, जिनको लेकर उन्हें बदनाम किया जाता रहा है। बसपा के समर्थक दबी जुबान से मान रहे हैं कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा का किला भले ही बच जाए लेकिन उसमें दरार तो आ ही गई है। स्वामी प्रसाद मौर्या और आरके चौधरी के अलग होने से बसपा का सामाजिक समीकरण गड़बड़ा गया है। अब बसपा के पास कोई बड़ा पासी चेहरा नहीं है और न ही मौर्या/शाक्य/काची समाज के लिए कोई चेहरा बचा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट जीत न पाने के बावजूद बसपा की ताकत को कम करके आंकना भूल होगी। बसपा का 22-25 प्रतिशत वोट बैंक अभी भी मजबूत है। बसपा की राजनीतिक ताकत सामाजिक समूहों या जातियों के साथ गठबंधन करने में निहित रही है और यही उसकी सोशल इंजीनियरिंग है। यूपी में सपा की सरकार है और भाजपा दावेदार है। ऐसे में मायावती बड़ी कुशलता से अपने वोटों को समेट रही थीं। लेकिन तात्कालिक रूप से दयाशंकर कांड और गुजरात में दलितों की हुई पिटाई की घटना और उसके बाद वहां दलितों द्वारा प्रदर्शित किए गए आक्रोश ने बसपा के कैडर के लिए संजीवनी का ही काम किया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार क्षत्रियों द्वारा मायावती के प्रति आक्रोश व्यक्त करना उनकी फौरी प्रतिक्रिया है, जो मायावती की लहर देखकर अपने आप खत्म हो जाएगी। लोग यह भूल जाते हैं तिलक-तराजू और तलवार का नारा देने वाली बसपा को 2007 में उन्हीं लोगों ने सत्ता के शीर्ष पर बहुमत के साथ बिठाया था, जिनके खिलाफ वह नारा गढ़ा गया था। देखना यह है कि मायावती अपने तरकश में से कौन सा नया तीर निकालती हैं।
घटनाक्रम के साथ-साथ बदलते रहे समीकरण 
उत्तर प्रदेश भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने पिछले दिनों मऊ में पत्रकारों से वार्ता करते हुए मायावती द्वारा टिकट बेचे जाने की आलोचना की थी। साथ में वह यह भी कह गए थे कि जिस तरह मायावती टिकट की कीमत बार-बार बढ़ाती जाती हैं, वह ...(अपशब्द) की ही तरह है। इस पर राज्यसभा में मायावती ने आपत्ति जताते हुए दयाशंकर सिंह की गिरफ्तारी की मांग कर डाली थी। भाजपा ने दयाशंकर सिंह को सभी पदों से मुक्त करते हुए छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित भी करने की घोषणा कर दी थी लेकिन इस मुद्दे को पार्टी और स्त्रियों के सम्मान के साथ जोड़ते हुए उन्होंने शक्तिप्रदर्शन करने का भी निर्णय ले लिया। 21 जुलाई को लखनऊ में भारी संख्या में बसपाइयों ने दयाशंकर सिंह और उनके परिवार के खिलाफ अपशब्द कहते रहे। बाद में जिलाधिकारी द्वारा 36 घंटे के भीतर दयाशंकर सिंह की गिरफ्तारी का आश्वासन पाकर आंदोलन स्थगित कर दिया गया। लेकिन इस आंदोलन से क्षत्रिय समाज रुष्ट हो गया। सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक सबका यही कहना था कि दयाशंकर सिंह ने गलत किया। दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह और मां तेतर देवी की तरफ से थाने में मायावती, बसपा महासचिव नसीमुद्दीन, बसपा प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर, सचिव मेवालाल गौतम के खिलाफ धारा 153ए, 504, 506, 509 और 120बी के अंतर्गत एफआईआर लिखाई गई। दयाशंकर सिंह की पत्नी का कहना है कि उनके पति ने जो गलत किया, उसके लिए उनका परिवार कहां से दोषी हो गया? उन्होंने बसपा नेता नसीमुद्दीन को भी आड़े हाथों लिया? (साभार आउटलूक)
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