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पंजाब को नशे की लत में क्यों डुबोये रखना चाहती हैं सभी पार्टियां?

चंडीगढ़। पंजाब में पिछले एक दशक के दौरान नशे की लत इस कदर बढ़ी है कि राज्य का भविष्य ही अंधकार में नजर आने लगा है, लेकिन फिर भी इस समस्या के प्रति आंखें क्यों बंद किए रहती हैं राजनीतिक पार्टियां? पंजाब के मालवा से आने वाले जगदीश सिंह भोला बचपन से एक बेहतरीन पहलवान बनने का सपना देखते थे. भोला ने मेहनत की और एशियाई खेल और कॉमनवेल्थ खेलों जैसी कई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भोला को अर्जुन अवॉर्ड भी मिला लेकिन इसके बाद जो हुआ वह बहुत ही दुखद और हैरान करने वाला है। भोला को 2008 में पुलिस ने ड्रग्स सप्लाई के मामले में पकड़ा, जिसके बाद उससे अर्जुन अवॉर्ड छीन लिया गया। इसके बाद पंजाब पुलिस ने भी भोला को डीएसपी पद से बर्खास्त कर दिया। लेकिन भोला यहीं नहीं रुका और जेल से बाहर आकर और भी बड़े पैमानै पर ड्रग्स के कारोबार से जुड़ गया। 2014 में भोला को 700 करोड़ के सिंथेटिक ड्रग्स स्कैंडल में अरेस्ट किया गया। कहा जाता है कि भोला ने अपने बयान में कहा था कि वह तो ड्रग्स के इस खतरनाक खेल का मामूली प्यादा भर है, असली खिलाड़ी तो बड़े-बड़े पदों पर बैठे मंत्री और नेता हैं। भोला ने अपने खुलासे में ड्रग्स के कारोबार में शामिल ऐसे कई बड़े नामों का खुलासा किया जो पंजाब में सरकार चलाते हैं। भोला की ये कहानी पंजाब को दीमक की तरह खोखला करते और वहां की एक बड़ी आबादी की नसों में समाते चले गए ड्रग्स का आंखें खोल देने वाला सच है। ऐसा नहीं है कि पंजाब में ड्रग्स के फैलते जहर के लिए सिर्फ सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली और बीजेपी जिम्मेदार हैं, बल्कि इस खेल में पंजाब की सभी राजनीतिक पार्टियां बराबर की जिम्मेदार रही हैं। आइए जानें कि आखिर क्यों ये पार्टियां पंजाब को नशे की गिरफ्त से बाहर नहीं आने देना चाहती हैं। जिस पंजाब को पांच नदियों की भूमि होने का गौरव प्राप्त है, उसी राज्य को अब उसकी एक बड़ी आबादी के नशे की गिरफ्त में पड़ने के लिए जाना जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ड्रग्स के शिकंजे में पंजाब के कसते चले जाने की हकीकत ये है कि इस साल पठानकोठ आतंकी हमले के बाद आई एम्स की एक रिपोर्ट के में बताया गया है कि पंजाब में हर वर्ष 7500 करोड़ के नशीले पदार्थों की सेवन किया जाता है। इनमें से अकेले 6500 रुपये की हेरोइन की खपत होती है। पंजाब में पहुंचने वाली सारी हेरोइन के आने का एक ही जरिया है, और वह है पाकिस्तान। इस स्टडी के मुताबिक पंजाब की 2.77 करोड़ की आबादी में से करीब 0.84 फीसदी (2.3 लाख) लोग नशीले पदार्थों के एडिक्टेड या आदी हैं। इनमें से करीब 1.23 लाख लोग हेरोइन के आदी हैं, जबकि पंजाब में ड्रग्स का सेवन करने वालों की संख्या करीब 8.7 लाख है। रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में हर दिन ड्रग्स के आदी लोग अपने नशे की खुराक के लिए करीब 20 करोड़ रुपये खर्च करते हैं, जबकि हेरोइन के आदी हर व्यक्ति करीब 1400 रुपये प्रति दिन खर्च करता है। पंजाब के ड्रग्स के आदी लोगों में से 76 फीसदी 18 से 35 की उम्र के हैं, यानी कि ड्रग्स की समस्या ने राज्य के भविष्य को भी अंधकारमय बना दिया है। पंजाब किस कदर तेजी से नशे की चपेट में आता जा रहा है, इसका अंदाजा NDPS (नारकोटिक्स ड्रग्स ऐंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस) द्वारा ड्रग्स के व्यापार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारियों से पता चल जाता है। NDPS द्वारा 2009 में ड्रग्स स्मगलिंग और डीलिंग के मामले में 5091 लोगों को अरेस्ट किया गया था जबकि 2014 में 17001 लोगों को अरेस्ट किया गया। इस दौरान जब्त की गई हेरोइन की मात्रा भी 155 किलो से 637 किलो तक पहुंच गई। पंजाब में आने वाले ड्रग्स का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी देश पाकिस्तान से स्मगलिंग के जरिए यहां पहुंचता है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI न सिर्फ पंजाब की सीमा से भारत में आतंकवादियों को घुसाने की कोशिश करती है बल्कि उसने पंजाब को नशे के अड्डे में तब्दील कर दिया है। लेकिन सीमापार से होने वाली इस ड्रग्स स्मगलिंग के खेल में न सिर्फ पाकिस्तान और वहां स्थित आंतकी संगठन शामिल हैं, बल्कि इसमें ड्रग्स माफिया से लेकर पंजाब के मंत्री, ताकतवर नेता, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तक शामिल हैं। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ईडी से पूछताछ में 700 करोड़ के ड्रग्स स्कैंडल में पकड़े गए भोला ने राज्य के उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल के साले और राज्य के राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया और केंद्रीय मंत्री हरिसिमरत कौर के भाई का नाम भी ड्रग्स के व्यापार से जुड़े होने के लिए लिया था। 2014 में ईडी ने मजीठिया से इस मामले में पूछताछ की थी। लेकिन इस रिपोर्ट के बारे में न तो सरकार और न ही पुलिस कुछ भी कहने को तैयार है। पिछले साल जून में राजस्थान पुलिस ने फजिलका के ब्लॉक स्तर के अकाली और बीजेपी के दो नेताओं को उनकी गाड़ी में 7.5 किलो हस्क ले जाते हुए अरेस्ट किया था. बीजेपी नेता पंजाब इंफ्रास्ट्रक्चर डिवेलेपमेंट बोर्ड का अध्यक्ष था और उसे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुरजीत कुमार जयंती का करीबी माना जाता है. लेकिन इनकी गिरफ्तारी के बाद दोनों ही पार्टियों ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। अलजाजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ड्रग्स की समस्या से जूझने वाले युवाओं का कहना है कि चुनावों के समय पार्टियों का स्थानीय ताकतवर व्यक्ति सभी युवाओं को एक जगह इकट्ठा करके उनके बीच ड्रग्स बांटता है, उस समय आप जिस भी ड्रग्स का नाम लो, सब मिल जाता है। ड्रग्स से होने वाली मोटी कमाई का इस्तेमाल पार्टियां और नेता चुनाव प्रचार के दौरान जबर्दस्त खर्च पर करते हैं। एक दिन के चुनाव प्रचार का खर्च कई लाख रुपये का होता है, जो ड्रग्स से होने वाली मोटी कमाई के जरिए पूरा किया जाता है. यही वजह है कि चुनाव जीतने से लेकर सत्ता में आने के बाद भी ड्रग्स बिजनेस को प्रश्रय देने का खेल जारी रहता है। इस खेल में न सिर्फ नेता बल्कि पुलिस अधिकारी और बड़े प्रशासनिक अधिकारी तक सबकी मिलीभगत होती है. लेकिन इन सबमें अगर कोई मारा जाता है तो वह है इस नशे की जकड़ में आया आम आदमी। पंजाब में नशे की बढ़ती लत की वजह कृषि क्षेत्र का कमजोर होना, बढ़ती हुई बेरोजगारी प्रमुख है। बेरोजगार पंजाबी युवाओं की महत्वाकांक्षाएं तो बहुत ज्यादा है लेकिन उसे पूरा करने के लिए न तो वहां नौकरियां है और न ही कोई कामकाज सिखाने वाले बढ़िया ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट। लेकिन इन कारणों के अलावा ड्रग्स की बढ़ती लत के पीछे पाकिस्तान का भी बहुत बड़ा हाथ है। इसलिए उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों पर रोक लगाकर सरकारें ड्रग्स की समस्या पर पर्दा तो डाल सकती हैं लेकिन उसे खत्म नहीं कर सकती।
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