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मोदी सरकार, भाजपा और संघ कर रहे हैं संकीर्ण राष्ट्रवाद की वकालत: राजमोहन गांधी

नई दिल्ली (इक़बाल अहमद, बीबीसी संवाददाता)। महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने कहा है कि मोदी सरकार, भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस जिस तरह से संकीर्ण राष्ट्रवाद की वकालत कर रहे हैं, इसके ख़िलाफ़ सभी पार्टियों को मिलकर राजनीतिक कार्रवाई करनी चाहिए। शनिवार को 'जामिया कलेक्टिव' के कार्यक्रम 'गुफ़्तुगू' में राजमोहन गांधी ने कहा कि अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाला विधानसभा चुनाव मायावती, मुलायम सिंह और कांग्रेस को एक साथ मिलकर लड़ना चाहिए। राजमोहन गांधी के मुताबिक़, यूपी के मुस्लिम मतदाता मायावती और मुलायम पर साथ चुनाव लड़ने के लिए दबाव डाल सकते हैं। राजमोहन गांधी ने कहा कि अगर जेएनयू में कुछ छात्रों ने आपत्तिजनक नारे लगाए भी हैं तो इसे राष्ट्रद्रोह नहीं कहा जा सकता। अगर नारे लगाना ही राष्ट्रद्रोह है तो ठीक उन्हीं दिनों हरियाणा में जो हिंसा हुई, क्या उसे राष्ट्रद्रोह नहीं कहा जाना चाहिए?. उन्होंने कहा कि कौन 'नेशनल' और कौन 'एंटी-नेशनल' है, यह संविधान से तय होता है, किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार के कहने से नहीं। उनके मुताबिक़, दलितों की गांधी से नाराज़गी जायज़ है। उन्होंने कहा कि गांधी ख़ुद कहते थे, "उच्च जाति, जिसमें मैं भी शामिल हूं, के लोगों ने हज़ारों वर्षों तक दलितों पर अत्याचार किया है। इसलिए अगर कोई दलित मुझ पर थूकता है, तो भी सही है।" लेकिन राजमोहन गांधी ने कहा कि धीरे-धीरे दलितों को अहसास हो जाएगा कि इस पूरे संघर्ष में गांधी उनकी तरफ थे। राजमोहन गांधी ने कहा कि पीएम मोदी जब लड़कियों और स्वच्छ भारत की बात करते हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री केवल 'एडिटोरियल राइटर' नहीं होता। राजमोहन गांधी ने कहा कि जब धर्म या बीफ़ खाने या फ़र्ज़ी मुठभेड़ के नाम पर लोग मारे जाते हैं, जब सार्वजनिक कार्यक्रम में मुसलमानों के सिर से देवी की पूजा की बात कही जाती है, तब लीडरशिप का इम्तेहान होता है। ऐसे में नेतृत्व लंबी-लंबी बातें करता है लेकिन इन मुद्दों पर ख़ामोश रहता है तो लीडरशिप फ़ेल हुई है। उनके मुताबिक जब भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो मोदी न तो उसकी हिमायत करते हैं और न ही उसकी कड़ी निंदा करते हैं, वो ख़ामोश रहते हैं। राजमोहन गांधी ने कहा, "जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया है। लेकिन उसे कन्हैया ही रहने दें उसे गांधी, नेहरू या सुभाष न बनाएं। उसके कांधों पर अपनी आकांक्षाओं का बोझ न डालें।"
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