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विश्वास मत हासिल करने से पहले ही उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू

देहरादून। उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। हालांकि मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की भाजपा की पैरवी को असंवैधानिक बताया है। साथ ही भाजपा के एक सांसद की राज्यपाल को हटाने की मांग की भी निंदा की। बीजापुर स्टेट गेस्ट हाउस में मीडिया से बातचीत में अपने कथित स्टिंग पर भी सवाल उठाये। स्टिंग करने वाले पत्रकार और भाजपा के रिश्तों पर तंज़ कसा। कहा कि अब फैसला राज्य की जनता ही करेगी। उत्तराखंड विधानसभा में कल हरीश रावत सरकार के विश्वास मत हासिल करने की चुनौती से पहले अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल द्वारा नौ बागी कांग्रेसी विधायकों की सदस्यता पर लिये जाने वाले निर्णय पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। विधानसभा सूत्रों के अनुसार, अध्यक्ष कुंजवाल विधानसभा पहुंच चुके हैं जहां उनके कार्यालय में बागी सदस्यों द्वारा उनके कारण बताओ नोटिस के जवाबों की जांच तथा कानूनी सलाहकारों से बैठकें चल रही हैं। प्रदेश में पिछले एक सप्ताह से ज्यादा समय से मचे सियासी तूफान के मददेनजर अध्यक्ष कुंजवाल के फैसले पर देश भर की नजरें टिकी हुई हैं लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फिलहाल विधानसभा परिसर में मीडियाकर्मियों का प्रवेश रोक दिया गया है। हांलांकि, इस बीच, बागी विधायकों के वकील भी विधानसभा पहुंचे हैं और समझा जा रहा है कि अध्यक्ष उन्हें सदन में 18 मार्च को उन विधायकों के भाजपा विधायकों के साथ खडे होकर नारे लगाने संबंधी साक्ष्य दिखायेंगे। गौरतलब है कि इन साक्ष्यों को दिखाये जाने की मांग स्वयं बागी विधायकों ने की थी। इससे पहले, अध्यक्ष कुंजवाल द्वारा नौ बागी कांग्रेसी विधायकों की सदस्यता दल-बदल विरोधी कानून के तहत समाप्त करने के लिये 19 मार्च को दिये नोटिस का जवाब दाखिल करने की कल शाम पांच बजे समयसीमा समाप्त होने से पहले विधायक सुबोध उनियाल ने अपने वकीलों के साथ विधानसभा पहुंचकर बागी विधायकों की तरफ से अपना पक्ष रखा था। बागी विधायकों की अगुवाई कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री बहुगुणा ने आरोप लगाया कि अध्यक्ष के सामने बागी विधायकों के वकीलों को अपने पक्ष में बहस तक नहीं करने दी गयी और वह मुख्यमंत्री हरीश रावत के इशारे पर विधायकों को सदस्यता से अयोग्य घोषित करने पर आमादा हैं । उन्होने कहा, यहां तो वही बात हो रही है कि खाता न बही, जो हरीश रावत कहें, वहीं सही। उनियाल से पहले मुख्यमंत्री रावत और संसदीय कार्य मंत्री इंदिरा हदयेश भी अध्यक्ष कुंजवाल के निर्देश पर विधानसभा पहुंची थीं और अपना पक्ष रखते हुए दल-बदल विरोधी कानून के तहत बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का समर्थन किया था। उधर, भाजपा सूत्रों ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से दिल्ली, गुडगांव और जयपुर में विभिन्न स्थानों पर घूम रहे उत्तराखंड के भाजपा विधायक देहरादून के लिये रवाना हो गये हैं और रात तक उनके यहां पहुंचने की संभावना है। कल विधानसभा में होने वाले शक्तिपरीक्षण की चुनौती से निपटने के लिये कांग्रेस की सारी आशायें अध्यक्ष कुंजवाल के नौ बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने के कदम पर टिकी हुई हैं जिससे सदन की प्रभावी क्षमता घटकर 61 रह जाये और बहुमत का आंकडा भी कम हो कर 31 पर आ जाये। सत्तर सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा में सत्ताधारी कांग्रेस के नौ विधायकों के बागी होकर भाजपा के साथ खडे हो जाने के बाद अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के अलावा उसके पास अपने 26 विधायक हैं जबकि हरीश रावत सरकार में शामिल प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा के छह सदस्यों के समर्थन को मिलाकर उसके पक्ष में कुल 32 विधायक हैं। दूसरी तरफ भाजपा के पास 28 विधायक हैं जिनमें से उसके घनसाली से विधायक भीमलाल आर्य की वफादारी पर फिलहाल यकीन नहीं किया जा सकता। कमल के फूल के निशान पर जीतने के बावजूद, आर्य अपनी पार्टी के विरोध में और रावत सरकार की तारीफ करने में कभी पीछे नहीं रहे जिसके चलते वह भाजपा से निलंबन झेल रहे हैं। भाजपा अपने पक्ष में अपने 27 और नौ बागी विधायकों सहित कुल 35 विधायकों के समर्थन का दावा कर रही है लेकिन अध्यक्ष कुंजवाल के बागियों को सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की सूरत में संख्या बल के खेल में उसके कांग्रेस से पिछडने का अनुमान लगाया जा रहा है।
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