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मोदी सरकार के मंत्री किनारे, अब सब कुछ सचिवों के सहारे!

नई दिल्ली (टीएसआर सुब्रमण्यम, पूर्व कैबिनेट सचिव)। नरेंद्र मोदी सरकार ने मई 2014 में चुनावी जीत के बाद नई नीति और कार्यक्रमों के प्रति शुरुआती रूझान ज़रूर दिखाए, पर आर्थिक मोर्चे पर, ग्रामीण और औद्योगिक सेक्टर में कोई नई पहल नज़र नहीं आई है। डिजिटल इंडिया के कार्यक्रम में आमूलचूल बदलाव लाने की क्षमता है, लेकिन इसका ज़मीन पर असर का अंदाज़ा कुछ साल बाद ही संभव है। स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी भी ज़मीन पर तब तक नहीं दिखेगी जब तक लोगों की सोच नहीं बदलती। छोटी यूनिटों को वित्तीय मदद देने की शुरुआत मुद्रा कार्यक्रम के तहत हुई है, पर इसे भी स्थिर होने में वक़्त लगेगा। मेक इन इंडिया कार्यक्रम भी गंभीरता से शुरू नहीं हो पाया है- इसकी वजह घरेलू नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की प्रतिकूल स्थितियां हैं जहां मांग में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। हाल ही में सरकार ने फ़सल बीमा योजना शुरू की है, इससे भी लोगों को बड़े पैमाने पर फ़ायदा हो सकता है, लेकिन इसमें भी समय लगेगा। मोदी सरकार की इन अहम पहलों का आकलन तभी होगा, जब ये कार्यक्रम आम लोगों तक पहुँचेंगे। अच्छे दिन आए या नहीं आए, इसे जानने में वक़्त लगेगा। हालांकि दिल्ली और उसके बाद बिहार चुनाव के नतीजों से इसे बल मिला कि सरकार को नई योजनाओं का फायदा नहीं हो रहा है, हालांकि यह निराशावादी नज़रिया अपने हित देखने वाले लोग ही फैला रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने अपने ही अंदाज़ में, वरिष्ठ सचिवों के आठ समूहों के गठन की घोषणा की है। इन्हें समाज और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए नए आइडिया तलाशने को कहा गया है। प्रधानमंत्री ने नाटकीय अंदाज़ में सचिवों की बैठक बुलाई और उन्हें आठ समूहों में बांट दिया। इसके बाद इनसे कहा गया कि वे विभिन्न सेक्टरों में बेहतर असर डालने वाले आइडिया के बारे में सोचें और नए सुधारों के लिए ठोस प्रस्ताव बनाकर दें। जिन थीमों के आधार पर सचिवों के समूह बनाए गए हैं, वो हैं- ‘सुशासन- चुनौती और अवसर’, रोजगार सृजित करने की रणनीति, किसानों के लिए खेती और अन्य क्षेत्रों के लिए पहल, शिक्षा और स्वास्थ्य- सब तक एकसमान पहुँच, बजट का बेहतर और प्रभावी उपयोग, समावेश और समानता के साथ तेज विकास, स्वच्छ भारत और नमामि गंगे और ऊर्जा संरक्षण और किफ़ायती उपयोग। इन समूहों को योजनाओं का ख़ाका तैयार करने के लिए कुछ दिन दिए गए. दो समूहों ने प्रधानमंत्री को अपनी रिपोर्ट दे भी दी। हालांकि सभी समूहों को सोमवार तक अपनी योजनाएं देनी थीं। इस नई पहल को अभी योजनाएं लागू करने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसका शासन से भी लेना-देना नहीं है, लेकिन इसने यूपीए सरकार के समय के जीओएम (मंत्रियों के समूह) की याद ज़रूर दिला दी है। इसका गठन यूपीए सरकार के दौरान किसी मसले पर विचार-विमर्श के लिए और या तो असहज मुद्दे को टरकाने, लंबित करने या फिर उसे तेज़ रफ़्तार देने के लिए किया जाता था। वैसे प्रभावी शासन के बदले जीओएम असहज मुद्दे टालने का काम करता रहा। जबकि जीओएम के पास अधिकांश मामलों में कैबिनेट जैसी ताक़त थी। यह पहले के फ़ैसलों को नज़रअंदाज़ भी करता रहा, जिसके चलते यूपीए-2 सरकार के दौरान 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन, कोलगेट एंट्रिक्स-देवास जैसे मामले सामने आए थे। दरअसल पिछली सरकार ने जीओएम का इस्तेमाल मुश्किल मामलों में फ़ैसलों की उपेक्षा के लिए किया था। मोदी सरकार की स्थिति दूसरी है। इसमें कोई शक़ नहीं कि मौजूदा सरकार में कुछ करने की वास्तविक इच्छा नज़र आती है। हालांकि कई मंत्री अनुभवहीन हैं. उनमें क्षमता का अभाव है और कई के साथ प्रबंधन की भी मुश्किल है। वहीं दूसरी ओर, नीतिगत बदलावों की रूपरेखा तय करने वाले वरिष्ठ नौकरशाहों में भी नए विचारों के मामलों में अग्रणी रहने की क्षमता नहीं बची। हालांकि अब पहले वाले दिन भी नहीं रहे. आजकल के सचिवों के पास काफ़ी जानकारी होती है, वे काफ़ी अनुभवी भी हैं लेकिन उनमें नेतृत्व का गुण कम होता है, क्योंकि राजनेता खुलेतौर पर उनकी बात पलट देते हैं या फिर नुक़सान पहुँचाते हैं। यही नहीं, नेताओं का एक वर्ग कुछ ग़लत होने पर उसे भी नौकरशाहों पर मढ़ देता है। ऐसे में प्रधानमंत्री का क़दम एक बार फिर से सचिवों की सक्रियता बढ़ाने वाला नजर आता है, जो सचिवों को नेतृत्व की भूमिका निभाने और बदलाव का वाहक बनने का मौक़ा देने वाला है। साफ़ है कि प्रधानमंत्री व्यवस्था मं जल्दी बदलाव चाहते हैं, सुधार करना चाहते हैं। वे अधीर हैं क्योंकि कई दशक भ्रष्ट व्यवस्था और अक्षमता के चलते बीत चुके हैं। उनका ये क़दम न तो कैबिनेट को नज़रअंदाज़ करने वाला है और न राजनीतिक वर्ग को। दरअसल वे चाहते हैं कि उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं खड़ी हों, आगे आएं और व्यवस्था में संभावनाओं की पूरी जानकारी होने के चलते नए क़दम सुझाएं। हालांकि इस पहल को नीति बनाने से पहले उसे राजनीतिक स्वीकृति हासिल करनी होगी और व्यवहारिक तौर पर उसे कामयाब भी होना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि सचिव इस मौक़े का फ़ायदा उठाएंगे। (साभार बीबीसी हिंदी डॉटकॉम)
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