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दिल से अमीर हैं रफ्फुगिरी में माहिर दीन मोहम्मद

गोरखपुर। छाया टाकिज मार्केट के भीतर मॉडर्न चिराग ड्राइक्लिनर्स एंड डायर्स के बाहर अमीरों की फटी-पुरानी रंगबिरंगी कपड़ों के बीच बेहद बारीक सुई-धागा उस दीन (गरीब) की कहानी इस कदर बयां करती है, जिसे सुनकर अच्छे हैरत में पड़ जाएंगे। रफ्फुगर दीन मोहम्मद पिछले करीब चालीस वर्षों से इस काम को अंजाम दे रहे हैं। एक से एक सस्ते-महंगे कपड़ों की रफ्फुगिरी कर दीन मोहम्मद अमीरों को तो खूब तन्मयता से सजाते संवारते हैं, पर उस दीन मोहम्मद पर किसी की नजर नहीं जाती कि उसकी जिंदगी संवारने के लिए भी कुछ किया जाना चाहिए। गीता वाटिका के निकट रहने वाले दीन मोहम्मद के परिवार में उनकी पत्नी नसीबुन निशा, एक बेटी और चार बेटे हैं। चारों बेटे रोजी-रोजगार की तलाश में गोरखपुर से बाहर विभिन्न शहरों में कुछ ना कुछ करके जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं। अपनी जिंदगी के बारे में दीन मोहम्मद बताते हैं कि उनके संघर्ष की बहुत पुरानी कहानी है। ज्यादा शिक्षा-दीक्षा ना होने के कारण दीन मोहम्मद ने कानपुर से रफ्फुगिरी का का सीखा। फिर लखनऊ में आकर इस रोजगार को आगे बढाया। वर्ष 1986 से सर्वप्रथम गोरखपुर में आकर बख्शीपुर में उन्होंने आदर्श रफ्फुगर के नाम से एक दुकान खोली। जहां इनकी कारीगरी की इतनी तारीफ हुई कि शहर के लोग दीन मोहम्मद के मुरीद बन गए। बताते हैं कि वे वर्ष 1975 से रफ्फुगिरी का काम करते हैं। फिलहाल छाया मार्केट स्थित माडर्न चिराग ड्राईक्लिनर्स एंड डायर्स के बाहर बैठकर सुई-धागा के सहारे की जाने वाली अपनी कारीगरी नगर के रफ्फुगरों में दीन मोहम्मद का नाम बड़े सलीके से लिया जाता है। मॉडर्न चिराग ड्राइक्लिनर्स एंड डायर्स के मालिक दिवाकर पाण्डेय भी दिल खोलकर दीन मोहम्मद की तारीफ करते हैं। कहते हैं-‘रफ्फुगिरी की कारीगरी में जिन बारीकियों की तालीम दीन मोहम्मद के पास है, शायद ही किसी और के पास होगा।’ दीन मोहम्मद बताते हैं कि उनके पास काम का बोझ हर वक्त रहता है। कभी फुर्सत नहीं मिली। बातचीत करने में बेहद सभ्य और शालीन दीन मोहम्मद का अंदाज हर किसी को अच्छा लगता है। क्या मजाल कि उनसे कोई नाराज हो जाए। हमेशा चेहरे पर मुस्कान बिखेरने वाले दीन मोहम्मद कहते हैं-‘जिन्दगी मिलेगी ना दुबारा। इसलिए प्यार-मोहब्बत और हंसते-मुस्कुराते हुए जिंदगी काटना ही बेहतर है।’ उनका फलसफा है चाहें कुछ भी हो जाए, ग्राहक को मायूस और नाराज नहीं करना है। हां, उन्हें एक बात का मलाल है कि सरकार की ओर से उनकी इस तालीम के मद्देनजर किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली है। लगता है कि यदि उन्हें कोई मदद मिली होती तो शायद रफ्फुगिरी के इस काम में उनका और ऊंचा मुकाम होता। फिर भी अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं। कहते हैं-‘अल्लाह का शुक्र है, सब कुछ ठीकठाक चल रहा है। उम्मीद है, आगे भी अच्छा ही रहेगा।’
प्रस्तुतिः आशीष चतुर्वेदी   
गोरखपुर और आसपास के जिलों-कस्बों से संबंधित किसी भी तरह का कमर्शियल, कारोबारी व व्यापारिक खबर प्रकाशित कराने के लिए आशीष चतुर्वेदी (फोन- +91 7379417374) से संपर्क करें। 
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