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यही है प्यार! पत्नी से मिलने साइकिल से पहुंच गया दिल्ली से स्वीडन

नई दिल्ली (सुशील कुमार महापात्रा)। प्यार के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते हैं। मिलिए इस चित्रकार से जो पत्नी से मिलने के लिए दिल्ली से स्वीडन पहुंचा, वह भी साइकिल से। यहां जिस शख्स की बात हो रही है, उनका नाम है प्रद्युम्न कुमार महानंदिया। महानंदिया का जन्म 1949 में ओडिशा के एक बुनकर दलित परिवार में हुआ था। दलित होने की वजह से कई बार उनको परेशानियों का भी सामना करना पड़ा था। लोग घर पर पत्थर फेंकते थे, स्कूल में अलग बैठना पड़ता था। प्रद्युम्न के पिता पोस्ट मास्टर के साथ-साथ एक ज्योतिष भी थे। उन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि प्रद्युम्न की शादी किसी दूसरे देश की लड़की से होगी। बचपन से प्रद्युम्न की ललित कला की पढ़ाई के प्रति रुचि थी, लेकिन पैसों की कमी की वजह से अच्छे कॉलेज में चयन होने की बावजूद उनका दाखिला नहीं हो पाया। हालांकि उनकी काबिलियत को देखते हुए ओडिशा सरकार ने उनकी मदद की और वह दिल्ली कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स में पढ़ाई करने के लिए रवाना हो गए। दिल्ली में भी उनकी दिक्कतें ख़त्म नहीं हुईं। कई बार उन्हें फुटपाथ पर सोना पड़ता था और पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करना पड़ता था। पढ़ाई के बाद वह शाम को दिल्ली के कनॉट प्लेस पर लोगों की पोर्ट्रेट बनाते थे और कुछ पैसे कमा लेते थे। किसे पता था कि कनॉट प्लेस के एक कोने में बैठे इस आदमी की किस्मत में कुछ और लिखा हुआ है। एक दिन उनके पास एक कार आकर रुकी। कार की पिछली सीट पर एक महिला बैठी हुई थी। फिर बिना पूछे प्रद्युम्न ने जल्दी-जल्दी उस महिला के पोर्ट्रेट बनाकर दे दिए। गाड़ी में बैठी उस महिला ने मिलने आने को कहा। अगले दिन वह महिला से मिले। वह महिला और कोई नहीं बल्कि रूस की वेलेंटीना टेरेस्कोवा थीं, जो पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं। एक दिन इंदिरा गांधी के सचिव महानंदिया के पास आए और इंदिरा गांधी का पोर्ट्रेट बनाने को कहा। इसके बाद दिल्ली सरकार का भी रवैया उनके प्रति बदल गया। उनके देर रात तक काम करने के लिए बंदोबस्त किया गया। धीरे-धीरे उनकी जिंदगी आगे बढ़ने लगी और लोग उन्हें पहचानने लगे। 1975 में शार्लेट नाम की एक स्वीडिश छात्रा कनॉट प्लेस पहुंची और प्रद्युम्न को पोर्ट्रेट बनाने के लिए कहा। इस छात्रा को देखते हुए प्रद्युम्न को अपने पिता की भविष्यवाणी याद आ गई। उनको ऐसा लगा शायद यही वह लड़की है, जिसके साथ उनकी शादी होने वाली है। प्रदुम्न ने शार्लेट को पोट्रेट बनाकर दे दिया। अगले दिन भी शार्लेट प्रद्युम्न से मिलने आई। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार हो गया और दोनों ने शादी कर ली। शार्लेट का वीज़ा खत्म होने की वजह से वह स्वीडन वापस चली गईं। कुछ दिन के बाद प्रदुम्न अपने पत्नी से मिलने स्वीडन जाना चाहते थे, लेकिन पैसे न होने के कारण वह हवाई जहाज से नहीं जा पाए। प्रद्युम्न ने अपने पास मौजूद सारे सामान बेच दिए और इससे उन्हें 1200 रुपये मिले। उसी में से 80 रुपये खर्च कर उन्होंने एक पुरानी साइकिल ख़रीदी और दिल्ली से स्वीडन के लिए रवाना हो गए। सफर में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। साइकिल से ईरान, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान, बुल्गारिया, जर्मनी और ऑस्ट्रिया आदि देशों का सफर करने के बाद प्रदुम्न स्वीडन की सीमा पर पहुंचे, लेकिन इमीग्रेशन वीजा ना होने के चलते उन्हें बॉर्डर पर ही रोक दिया गया। प्रदुम्न ने अपनी शादी का सर्टिफिकेट भी दिखाया, लेकिन फिर भी स्विडिश अफसरों ने उन्हें अंदर जाने नहीं दिया। अफसरों को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भारत से साइकिल के जरिये वहां तक पहुंचे इस शख्स की स्वीडन की एक अमीर लड़की से शादी हो सकती है। प्रदुम्न ने शार्लेट से बात करवाई, तब जाकर उन्हें स्वीडिश सीमा में दाखिल होने की इजाजत दी गई। प्रद्युम्न को यह पता नहीं था कि शार्लेट स्वीडन के एक अमीर परिवार से है। यह जानने के बाद उनके मन में कई सवाल खड़े हो रहे थे, लेकिन पत्नी से मुलाकात के बाद सब कुछ दूर हो गया। दोनों ने स्विस कानून के हिसाब से दोबारा शादी की। अब प्रद्युम्न स्वीडन के नागरिक हैं और वहां वह एक अच्छे पेंटर के रूप में पहचाने जाते हैं। दुनिया भर में उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाती रहती है। वह स्वीडन सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग में सलाहकार भी हैं। उनके परिवार में एक बेटा सिद्धार्थ और बेटी एम्ली भी है। वह दोनों ओडिशा आते रहते हैं, अपने गांववालों से मिलते-जुलते रहते हैं। (साभार एनडीटीवी इंडिया)
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