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अब नए मोड़ पर है बिहार की दलित सियासत

राम विलास पासवान और जीतन राम मांझीः हाथ मिले, दिल नहीं।
राजीव रंजन तिवारी
दलितों के नए पुरोधाः डा. सुधांशु शेखर भास्कर
राजीव रंजन तिवारी 
बिहार में हुए विधानसभा चुनाव की अहमियत राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कितनी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा लोकप्रिय नेता भी इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया हुआ था। यह अलग बात है कि इस चुनाव में भाजपा नीत एनडीए की बुरी तरह से पराजय हुई है। यद्यपि तमाम संसाधानों के झोंके जाने के बाद भी हुई इस हार का आंकलन भाजपा के विशेषज्ञों द्वारा की जा रही है, उनमें एक अहम मुद्दा बिहार की बदलती दलित राजनीति भी है। बताते हैं कि बिहार की दलित राजनीति भी इस बदलते समय के साथ नए मोड़ पर है। यदि दलित राजनीति में बदलाव नहीं आया होता तो आज कहानी भाजपा और एनडीए के पक्ष में होती। राजनीति के जानकार इसका पूरा श्रेय महागठबंधन के उन दलित नेताओं को देते हैं, जिन्होंने अपनी रणनीतिक कौशल से रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी जैसे बड़े कद वाले नेताओं की राजनीति को बिगाड़ कर रख दिया। इसी के तहत एक बड़ा नाम सामने आ रहा है, वह है डा.सुधांशु शेखर भास्कर का। सोशल साइट्स पर बेहद सक्रिय रहने वाले डा.भास्कर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में जन्तू विज्ञान के रीडर हैं। दो बार एमएलए रहे इस दलित नेता ने बिहार के दलति वोटरों को लुभाने में भाजपा की रणनीति को ध्वस्त कर दिया। राजद प्रमुख लालू प्रसाद के बेहद करीबी माने जाने वाले भास्कर ने यह भी सिद्ध किया है कि बिहार का दलित वर्ग अब उनके इशारे को समझेगा न कि पासवान व मांझी के इशारे को। खैर, तमाम सियासी समीकरणों को जोड़ने-घटाने के बाद आखिरकार महागठबंधन ने जीत हासिल कर ली है। हालांकि भाजपा के आला नेता अब भी इस बात को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिरकार उनके हार असली कारण है क्या? इस देश का इतिहास रहा है कि यहां जब भी किसी तरह के चुनाव की घोषणा होती है, तब सभी राजनीतिक पार्टियां जातिगत समीकरण का दांव खेलने लगती हैं। राजनीतिक पार्टियों का ऐसे समय में सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है, वो है दलित वोट बैंक की राजनीति में खुद को विजयी साबित करना। हलांकि ये जानना भी दिलचस्प है कि समय-समय पर इसी दलित वोट बैंक ने कई राजनीतिक समीकरण भी बदले हैं। उदाहरण के तौर पर पिछला लोकसभा चुनाव काफी है, जिसमें इसी दलित वोट बैंक का फायदा बीजेपी ने उठाया था। भाजपा ने दलितों के लिए चुनावी रैलियों में बहुत सारी घोषणाएं की थी, वो दलितों के घर तक गए थे। उन्होंने वो सबकुछ किया जो शायद अन्य पार्टियां ठीक से नहीं कर पायीं। इसी के महत्व को देखते हुए देश में 125वीं अम्बेडकर जयंती के उत्सव को लेकर भी पिछले दिनों उठा-पटक की राजनीति शुरू हुई थी। देश के दो प्रमुख दल एक-दूसरे से अम्बेडकर जयंती की सफलता को लेकर पूर्ण रूप से प्रतिस्पर्धा में थे। दरअसल ये सारा खेल बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर रचा गया था। सभी पार्टियां चाहती थीं कि वो दलितों को रिझाने में सफल रहें और वैसे भी बिहार की आबादी में दलितों का क्या योगदान है, इस बात का अंदाजा बिहार में उनकी जनसँख्या से लगाया जा सकता है। दलितों के लिए अपने काम को दिखाकर आज हर कोई आगे बढ़ सकता है। कुर्मी और पासी भी आज दलितों के बाद काफी महत्वपूर्ण है। वैसे भी दलितों की ये राजनीति आज की नहीं बल्कि बहुत पुरानी है। समय के साथ बस इसमें थोड़े-बहुत बदलाव हुए हैं और कुछ भी नहीं। यही कारण है कि आज भी दलित वोट बैंक से किसी भी राजनीतिक पार्टी को छेड़छाड़ करना बिलकुल पसंद नहीं। ऐसे में अब प्रमुख राजनीतिक दल इसी कार्यक्रम की सफलता को दर्शाकर बिहार की जनता के सामने ये साबित करना चाहते है कि उनके दिल में अम्बेडकर के प्रति कितना सम्मान है। चुनाव में बिहार का सारा राजनीतिक समीकरण दलित वोटर पर आकर टिक गया था। यही कारण है की आज दलितों को रिझाने के लिए हर पार्टी हर संभव प्रयास कर रही थी। बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान को सबसे बड़ा दलित नेता माना जा रहा था। वे लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी हैं। वे सोलहवीं लोकसभा में बिहार के हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। बिहार के खगड़ि‍या जिले में एक दलित परिवार में जन्मे रामविलास पासवान ने बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी, झांसी से एमए तथा पटना यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया है। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की ही तरह पासवान भी छात्र राजनीति में सक्रिय थे और जेपी आंदोलन में उन्होंने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। वैसे पासवान के बारे में यह बात बहुत मशहूर है कि केंद्र में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, पासवान मंत्री जरूर बन जाते हैं। पासवान अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे। उसके बाद वो यूपीए सरकार में भी मंत्री रहे और अब वो पीएम मोदी की सरकार में भी मंत्री हैं। 1983 में रामविलास पासवान ने दलितों के उत्थान के लिए दलित सेना का गठन किया। साल 2000 में पासवान ने जनता दल यूनाइटेड से अलग होकर लोक जनशक्ति पार्टी का गठन किया। पासवान को पाला बदलने के लिए भी जाना जाता है। छात्र आंदोलन के समय से नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ जुड़े रहने वाले रामविलास पासवान ने 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए फिर लालू के साथ गठबंधन किया और यूपीए से जुड़ गए। लेकिन पासवान को सफलता नहीं मिली। पासवान खुद हाजीपुर से लोकसभा चुनाव हार गए। 2014 के चुनाव में पासवान फिर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के साथ जुड़ गए और हाजीपुर से लोकसभा चुनाव जीते। उनकी पार्टी के 6 सांसद जीतकर आए और पासवन केंद्र में मंत्री हैं। पासवान के बेटे चिराग पासवान जमुई से जीते। बिहार की राजनीति में राम विलास पासवान के प्रतिस्पर्धी के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का प्रादुर्भाव हुआ। इन्हीं दोनों दलित नेताओं को प्रभावी मानते हुए भाजपा ने इन पर दांव खेल दिया। राजनीति के जानकार बताते हैं भाजपा नेताओं समेत पासवान व मांझी को भी इस बात का भ्रम था कि बिहार का दलित वोटर केवल इनके नाम से ही एनडीए में चला आएगा। लेकिन इस बार की राजनीति में यह नहीं हो सका। जानकार बताते हैं कि बिहार का दलित वोटर एनडीए के अपेक्षा महागठबंधन (राजद-जदयू-कांग्रेस) के नेताओं को अपना ज्यादा हितैषी समझा। खास बात यह भी है कि बिहार में भाजपा के पक्ष में सवर्ण मतदाताओं की गोलबंदी के प्रतिक्रियास्वरूप भी दलित वोटर महागठबंधन की ओर मुखातिब हो गया। जिसे बेहद होशियार और राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले राजद दलित प्रकोष्ठ के प्रमुख डा.सुधांशु शेखर भास्कर जैसे लोग समझ गए। नतीजा यह हुआ कि बिहार में दलित वोटरों को भाजपा के खिलाफ कर महागठबंधन की ओर मोड़ लिया गया। इस काम में सोशल साइट्स ट्वीटर, व्हाट्स एप और फेसबुक पर सक्रिय रहने वाले डा.भास्कर ने बड़ी भूमिका निभाई। यही वजह है कि आज बिहार में दलित राजनीति के पुरोधा के रूप में उनका नाम लिया जा रहा है। बहरहाल, अब देखना यह है कि तेजी से बदल रही बिहार की यह दलित राजनीति कहां जाकर विराम लेती है।
भास्कर ने जमुई में दी थी चिराग को कड़ी टक्कर 
बीते लोकसभा चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद जमुई संसदीय सीट चुनाव लड़े डा. सुधांशु शेखर भास्कर ने राम विलास पासवान के पुत्र व लोजपा प्रत्याशी चिराग पासवान को कड़ी टक्कर दी थी। यही वजह रही थी कि मतगणना के दौरान जब चिराग पासवान को अपनी जीत सुनिश्चित लगने लगी तब ही वे मतगणना स्थल पर आए थे। जानकारों का कहना है कि जमीन से जुड़े होने के कारण डा. सुधांशु शेखर भास्कर ने हवा-हवाई राजनीति करने व पिता राम विलास पासवान की विरासत के बदौलत राजनीतिक अस्तित्व में आए चिराग पासवान की नाक में दम कर दिया था। दरअसल, दलित नेता होने के बावजूद डा. भास्कर की पकड़ हर जाति-बिरादरी के मतदाताओं में समान रूप से है। बेहद मृदुभाषी व मिलनसार छवि वाले डा. भास्कर को हर कोई पसंद करता है। इन्हीं वजहों से हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में अपने क्षेत्र में पूरी मुस्तैदी काम करने के अलावा डा. भास्कर ने पूरे राज्य में दलित वोटरों को महागठबंधन के खाते में लाने की रणनीति पर काम किया। नतीजा आज सबके सामने है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद के करीबी माने जाने वाले डा. भास्कर ने अपने क्रियाकलाप से यह सिद्ध कर दिया अब दलित वोटर हवा-हवाई राजनीति करने वाले नेताओं के चक्कर में पड़ने वाला नहीं है। डा. भास्कर कहते हैं- ‘मैं राजद का एक अदना कार्यकर्ता हूं। पार्टी सुप्रीमो (लालू प्रसाद) के निर्देश पर काम करता हूं। भविष्य में पार्टी सुप्रीमो की ओर से जो भी जिम्मेदारी व निर्देश मिलेगा, उसे भलि-भांति निभाऊंगा।’
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