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बिहार में बहार, बनेगी नीतीश की सरकार, लालू बने 'किंग मेकर' और एनडीए की हुई करारी हार

पटना। दीवाली अभी भले ही दो दिन दूर है, लेकिन बिहार में महागठबंधन के लिए दीवाली आज से शुरू हो गई है। नीतीश कुमार लगातार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। 'बिहारी बनाम बाहरी' के इस चुनाव में बिहार की जनता ने उस बिहारी को चुना है, जिसने बीते 10 साल में विकास की राह पकड़ राज्य की तस्वीर बदलने की कवायद शुरू की। घोषित नतीजों में विधानसभा की सभी 243 सीटों में से महागठबंधन 178 सीटों पर जीत मिली है, जबकि बीजेपी गठबंधन को 58 सीटों पर समिट गया। 7 सीटों पर अन्य उम्मीदवारों को कामयाबी मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को फोन कर बधाई दी। इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार ने ट्वीट किया, 'अभी-अभी प्रधानमंत्री का फोन आया और उन्होंने मुझे बधाई दी... धन्यवाद मोदीजी।' जीत के बाद नीतीश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह बिहार के स्वाभिमान की जीत है। हमें समाज के हर तबके का समर्थन मिला है, ये साफ है कि लोगों के मन में आशा है। नीतीश ने कहा, हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं है, हम सकारात्मक सोच के साथ काम करेंगे। वहीं आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मीडिया से बात करते हुए कहा, बिहार के अगले सीएम नी‍तीश कुमार ही होंगे, हम बिहार के विकास के लिए मिलकर मेहनत से काम करेंगे। नीतीश कुमार खासतौर पर लालू से मिलने उनके घर पहुंचे, जहां लालू ने बड़ी गर्मजोशी से गले मिलकर उनका स्वागत किया। बिहार विधानसभा चुनाव में हार को स्वीकार करते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को उनकी प्रभावशाली विजय के लिए बधाई दी और कहा कि उनका दल जनादेश का सम्मान करता है। केंद्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि विपक्ष की एकता ने हमें हरा दिया है। बिहार बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि पार्टी जनता के जनादेश के आगे नतमस्तक है। उन्होंने लालू और नीतीश को उनकी जीत के लिए बधाई दी। बीजेपी सांसद रामकृपाल यादव ने भी कहा कि हम हार स्वीकार कर रहे हैं। बिहार के नतीजों के बाद बीजेपी के नाराज सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने ट्वीट किया, यह बिहार के लोगों और लोकतंत्र की जीत है। बिहार बनाम बाहरी का मुद्दा निपट गया। महागठबंधन खेमे में भारी उत्साह है और जेडीयू तथा आरजेडी दफ्तर के बाहर कार्यकर्ता जश्न मनाने में जुटे हैं। शिवसेना के संजय राउत ने कहा कि नीतीश कुमार के लिए यह बड़ी जीत है, वह राजनीतिक हीरो के तौर पर उभरे हैं। जेडीयू नेता पवन वर्मा ने कहा, "यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह की हार है।" पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को बधाई देते हुए इसे सहिष्णुता की जीत और असहिष्णुता की हार बताया। एक समय बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव तथा कांग्रेस के महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर दिख रही थी और रुझानों में एनडीए ने बढ़त भी बना ली थी, लेकिन इसके बाद स्थिति बदली और महागठबंधन एनडीए के पार निकल गया। अधिकारियों ने बताया कि 62,780 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में डाले गए मतों की गणना की प्रक्रिया के लिए पटना और अन्य जिलों में 14,580 अधिकारी ड्यूटी पर हैं। दिन में ही 272 महिलाओं सहित 3450 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला हो जाएगा। बिहार में विधानसभा चुनाव पांच चरणों में 12 अक्टूबर से शुरू हो कर 5 नवंबर तक चला था। बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में मतदान के बाद आ रहे तमाम एक्जिट पोल के नतीजों के कारण परिस्थितियां और रोचक हो गईं। करीब एक महीने लंबे चले बिहार विधानसभा चुनाव को चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने ‘सभी चुनाव की मां’ करार दिया था। इस पर देश की पैनी नजर रही। यह देश में राजनीतिक बदलाव की क्षमता रखता है। बिहार विधानसभा के पांच चरणों में हुए चुनाव के तहत पांच नवंबर को अंतिम चरण के मतदान के बाद दिखाए गए सर्वेक्षणों (एक्जिट पोल) में से अधिकतर में जदयू-राजद-कांग्रेस के महागठबंधन और भाजपा नीत राजग के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना व्यक्त की गई। हालांकि चाणक्य के सर्वेक्षण में बीजेपी नीत एनडीए को भारी बहुमत मिलने की संभावना जताई गई थी। इस सर्वेक्षण के अनुसार एनडीए को 155 सीटें (11 सीटें कम या ज्यादा) मिलने की संभावना व्यक्त की गई, जबकि जेडीयू नीत गठबंधन को 83 सीटें (नौ सीटें कम या ज्यादा) मिलने का अनुमान जताया गया। टाइम्स नाउ और सी-वोटर के सर्वेक्षण में 243 सदस्यीय विधानसभा में महागठबंधन को 122 सीटें मिलने की संभावना जताई गई। वहीं न्यूज एक्स ने इसे 130 से 140 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया। दोनों टीवी चैनलों ने बीजेपी नीत गठबंधन को कमश: 111 तथा 90 से 100 सीटें मिलने की बात कही। इंडिया टुडे-सिसेरा एक्जिट पोल ने एनडीए को 113 से 127 सीटें मिलने की संभावना जताई। इस सर्वेक्षण में जेडीयू नीत गठबंधन को 111 से 123 सीटें मिलने की बात कही गई। इंडिया टीवी ने जेडीयू गठबंधन को 112 से 132 सीटें मिलने की संभावना जताई, जबकि एनडीए को 101 से 121 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया। एबीपी-निलसन के चुनावी सर्वेक्षण में महागठबंधन को 130 सीटें, एनडीए को 108 तथा अन्य को पांच सीटें मिलने की संभावना जताई गई। न्यूज नेशन चैनल ने नीतीश कुमार नीत महागठबंधन को 120 से 124 सीटें यानी साधारण बहुमत मिलने की संभावना जताई। इस सर्वेक्षण में उनके प्रतिद्वंद्वी गठबंधन को 115 से 119 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। एनडीटीवी चैनल पर शुक्रवार को दिखाए गए एक एक्जिट पोल में बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी नीत गठबंधन की जीत का अनुमान लगाते हुए 243 सदस्यीय विधानसभा में 120 से 130 सीटें जीतने की भविष्यवाणी की गई। विरोधी महागठबंधन को 105 से 115 के बीच सीटें मिलने का बात कही गई। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की खासियत यह रही कि इसमें अब तक के सर्वाधिक 56.94 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जो कि वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव (52.65 प्रतिशत) तथा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव (55.38 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। निवर्तमान विधानसभा के लिए 2010 में हुए चुनाव में जेडीयू और बीजेपी ने साथ-साथ चुनाव लड़ा था और जेडीयू को 115 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी को 91 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में आरजेडी को 22 और कांग्रेस को चार सीटों पर कामयाबी मिली थी। जेडीयू-बीजेपी गठबंधन 2013 में टूट गया जब नीतीश कुमार ने घोषणा की कि 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी की चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख नरेंद्र मोदी को बनाए जाने के बीजेपी के फैसले को लेकर उनकी पार्टी एनडीए से अलग हो रही है। पिछले साल हुए संसदीय चुनाव में बीजेपी को 40 में से 22 सीटें मिली थीं जबकि उसके सहयोगी दलों को नौ सीटें मिली थीं। आरजेडी और जेडीयू ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और उसे क्रमश: चार एवं दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। कांग्रेस को भी दो सीटें मिली थीं जबकि एक सीट एनसीपी को मिली थी। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में बीजेपी अपने सहयोगी दलों लोजपा, रालोसपा एवं हम सेक्युलर के साथ है। प्रदेश में सत्तासीन जेडीयू ने आरजेडी एवं कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा। भाकपा पांच अन्य वामदलों माकपा, भाकपा माले, फारवर्ड ब्लॉक, एसयूसीआई (सी) एवं आरएसपी के साथ चुनाव मैदान में है। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी शरद पवार की पार्टी राकांपा सहित चार अन्य दलों, जिसमें मधेपुरा से सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पार्टी भी शामिल थी, के साथ तीसरा मोर्चा बनाकर इस बार चुनावी मैदान में उतरी थी पर बाद में तीसरा मोर्चा बिखर गया।  
महागठबंधन का दिवाली धमाका, भाजपा की महा-हार 
सभी एक्जिट पोल को गलत साबित करते हुए नीतीश कुमार नीत महागठबंधन ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को करारी शिकस्त दी है। विकास के मुद्दे पर भारी रहा जातिवाद और प्रांतवाद का मुद्दा। जहां मुस्लिम और यादव वोट को लालू ने पकड़ कर रखा वहीं नीतीश ने सुशासन का हवाला देकर जंगलराज के मुद्दे की हवा निकाल दी। मुख्यीमंत्री पद के लिए कोई चेहरा प्रस्तुत नहीं करना, बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेताओं के मोदी विरोधी सूर, भाजपा और शिवसेना के बीच तनाव, मोहन भागवत का आरक्षण वाला बयान, नीतीश को धोका देने वाले जीतनराम मांझी से हाथ मिलाना, महंगाई की मार जैसी अन्य कई बातें भाजपा को ले डूबी। भाजपा के लिए यह न भूलने वाला चुनाव होगा। 243 सदस्यीय सदन में 178 सीटें जीतकर महागठबंधन ने जहां अपना किला मजबूत किया, वहीं अपना सब कुछ दांव पर लगाकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ सिर्फ 58 सीटें लगीं। राजद प्रमुख लालू प्रसाद सबसे अधिक सीटें जीतकर फिर से बिहार में एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरे हैं। लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 31 सीटें जीतने वाले भाजपा गठबंधन को विधानसभा चुनाव में ‘महाहार’ का सामना करना पड़ा जबकि उसके ‘महानायक’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी महाप्रचार का बीड़ा उठाते हुए विधानसभा चुनाव में 30 जनसभाएं की थी। पिछले साल के लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों करारी हार का मलाल धोते हुए नवगठित जद (यू).राजद-कांग्रेस ने आंखें चौंधिया देने वाला प्रदर्शन किया। इनमें भी राजद को सबसे ज्यादा 80, जद (यू) को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। महागठबंधन के सीट बंटवारे के तहत जदयू और राजद ने जहां 101.101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, वहीं कांग्रेस के खाते में 41 सीटें आई थी। भाजपा को सबसे तगड़ा झटका उसके सहयोगियों की तरफ से मिला, जो 87 सीटों पर चुनाव लड़े और केवल पांच पर जीत दर्ज कर सके। भाजपा को उम्मीद थी कि वह राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा के जरिये पिछड़े और अति पिछड़े वोटों में सेंध लगा पायेगी लेकिन ऐसा हो न सका। पासवान और आरएलएसपी को जहां दो दो सीटें नसीब हुईं वहीं मांझी की पार्टी को तो सिर्फ एक ही जीत से संतोष करना पड़ा। चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी, मुलायम सिंह की सपा, मायावती की बसपा जैसी पार्टियां कोई प्रभाव नहीं दिखा सकीं और नतीजों में रीते हाथ रहीं। इस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर थी लेकिन चौथे चरण को छोड़कर सभी चरणों के मतदान में महागठबंधन का भारी दबदबा रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जदयू नेता नीतीश कुमार को फोन करके बिहार विधानसभा चुनाव में उनके गठबंधन की जीत के लिए बधाई दी, जिसके लिए नीतीश कुमार ने उनका धन्यवाद किया। बिहार विधानसभा चुनाव में विजयी के तौर पर उभरने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ‘‘मील के पत्थर’’ साबित हुए बिहार चुनाव में समाज का ध्रुवीकरण करने के प्रयास खारिज हो गए और इसके परिणाम में देश का मिजाज झलकता है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प चाहता है। पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और जदयू को जहां 115 सीटें मिली थीं वहीं भाजपा 91 सीटें जीतने में सफल रहा था। राजद और कांग्रेस भी अपने अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरी थीं और राजद को जहां 22 सीटें मिली थीं वहीं कांग्रेस केवल 4 पर सिमट गई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए बिहार चुनाव के नतीजे पिछले 10 महीने में दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर पार्टी को कहीं का नहीं छोड़ा था। भाजपा को मात्र तीन सीटें ही मिल सकी थीं। पिछले वर्ष मई में लोकसभा चुनाव में प्रचंड वेग के साथ अपनी पार्टी का विजयरथ हांकने वाले मोदी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के साथ जम्मू कश्मीर में अकेले या गठबंधन सरकार बनाई। इस बात को ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस, राजद और जदयू का सूपड़ा साफ करके राज्य की 40 में से 31 सीटें जीती थीं। इस जीत ने राजनीति के एक कुटिल सिद्धांत कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, को सतह पर ला दिया और इन तीनों पराजित योद्धाओं ने मोदी के खिलाफ कमर कस ली। एक महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में तीनों दलों ने थोड़े संकोच के साथ हाथ मिलाया, लेकिन 10 में से 6 सीटों पर जीत ने तीनों पार्टियों को एक होने का हौंसला दिया और उसी का नतीजा था कि मोदी के सामने लोकसभा चुनाव में पिद्दी साबित हुई पार्टियां मोदी को ही बौना करने में कामयाब रहीं। सीपीआई (एमएल.एल) को सिर्फ दो सीटें मिल सकीं, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार चार सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रहे। परिणाम आने के बाद मीडिया से मुखातिब महागठबंधन के ‘चाणक्य’ नीतीश कुमार और ‘किंगमेकर’ लालू प्रसाद ने कहा कि इन चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि इनसे ऐसा आभास मिला है कि लोग भाजपा के एक अच्छे और मजबूत विकल्प और एक शक्तिशाली विपक्ष के लिए तरस रहे हैं। चुनाव नतीजों को ‘मील का पत्थर’ करार देते हुए कुमार ने कहा कि परिणाम सौहार्द के लिए और असहिष्णुता के खिलाफ थे। उन्होंने कहा कि ध्रुवीकरण के प्रयास धराशायी हो गए। लालू ने मोदी को निशाने पर लेते हुए कहा कि गठबंधन भाजपा के खिलाफ एक मजबूत राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाएगा और ‘दिल्ली कूच‘ के तहत प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में 10 दिन के भीतर एक रैली का आयोजन किया जाएगा। लालू ने यह भी घोषणा की कि कुमार मुख्यमंत्री बने रहेंगे। नीतीश कुमार ने कहा कि नयी सरकार न्याय और समग्र विकास के साथ खुशहाली को अपनी प्राथमिकता बनाएगी। उन्होंने कहा कि किसी के खिलाफ किसी तरह की दुर्भावना के बिना सरकार विपक्ष के साथ मिलकर काम करेगी।
यह हैं बिहार में महागठबंधन की जीत के प्रमुख कारण 
बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला महागठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता में आने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को तमाम एग्जिट पोल के दावों से उलट बेहद कम सीटें मिली हैं। तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने को तैयार नीतीश के नेतृत्व को मिली जीत के पीछे आखिर क्या कारण रहे, आइए देखते हैं : बिहार विधानसभा चुनाव इस बार पूरी तरह दो भागों में विभाजित दिखाई दिया - एनडीए बनाम महागठबंधन। जहां महागठबंधन का नेतृत्व मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी नीतीश कुमार कर रहे थे, वहीं एनडीए की कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ले रखी थी। मतदान से पहले हुए लगभग सभी सर्वेक्षणों में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद के सबसे पसंदीदा दावेदार बने रहे, जबकि एनडीए ने अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी स्पष्ट ही नहीं किया। महागठबंधन में नीतीश के नेतृत्व को लेकर कोई असमंजस की स्थिति नजर नहीं आई। नीतीश की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस ने नीतीश के नेतृत्व पर पूरा विश्वास दिखाया। चुनावी माहौल के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान आया, जिसमें उन्होंने कहा कि जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। इसका यह अर्थ लगाया गया कि केंद्र की सत्ता में बैठे दल की मातृ संस्था जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ है। इस बात को महागठबंधन के नेताओं ने खूब प्रचारित किया। एनडीए की छवि आरक्षण विरोधी की बन गई। प्रधानमंत्री ने इस पर सफाई दी और जान की बाजी लगाने की बात भी कही, लेकिन शायद बिहार की जनता ने उन पर भरोसा नहीं किया। प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश के राजनीतिक डीएनए पर सवाल उठाया था, जिसे नीतीश अपने पक्ष में भुनाने में सफल रहे। उन्होंने पूरे चुनाव में बहुत ही मजबूती से 'बिहारी बनाम बाहरी' का मुद्दा उठाया। एनडीए में स्थानीय नेतृत्व की कमी और राज्य से बाहर के नेताओं की प्रचार अभियान में प्रमुख भूमिका को बिहार की जनता ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। एनडीए को भी यह बात समझ में आई और दूसरे चरण के मतदान के बाद चुनाव प्रचार के लिए लगाए जा रहे पोस्टरों में स्थानीय नेताओं को प्रमुखता दी जाने लगी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। एनडीए की ओर से कई बार ऐसे बयान दिए गए, जिनसे सांप्रदायिकता और असहिष्णुता को लेकर पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान विवाद जैसी स्थिति बनी रही। चाहे वह पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का गोमांस पर प्रतिबंध लगाने वाला बयान हो या दादरी कांड पर प्रधानमंत्री की चुप्पी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का चौथे चरण से ठीक पहले 'पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे' वाला बयान भी एनडीए के खिलाफ गया और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुसलिमीन (एआईएमआईएम) के चुनाव लड़ने के बावजूद महागठबंधन ही अल्पसंख्यक समुदाय को आकर्षित करने में सफल रहा। जिस कांग्रेस के 60 वर्षों के कार्यकाल के खिलाफ भाजपा केंद्र की सत्ता हासिल करने में सफल रही, वही कांग्रेस राज्य चुनाव में महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद अलग-थलग बनी रही। इससे चुनावी जंग सीधे-सीधे नीतीश कुमार के साथ या खिलाफ वाली बन गई। रविवार की सुबह शुरुआती बढ़त मिलने और जीत लगभग सुनिश्चित होने के बाद जद (यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि यह जीत धनशक्ति पर सिद्धांतों की जीत है। वहीं केंद्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने कहा कि एनडीए ने बिहार चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लड़ा, इसलिए उन्हें हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और एनडीए को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि यह हार 'नेतृत्व में कमी' को दर्शाती है।'
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