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तल्ख नहीं थे पं.नेहरू और पटेल के बीच रिश्ते, चाहकर भी अलग नहीं हो पाए दोनो नेता!

नई दिल्ली। सरदार पटेल के आलोचक तो अब ज्यादा मुखर रहे नहीं, लेकिन उनके प्रशंसक जब भी उनकी तारीफ करना शरू करते हैं, तो देसी रियासतों को भारत संघ में मिलाने के अलावा पटेल की तारीफ में ज्यादा कुछ कह नहीं पाते. इसके बाद प्रशंसक पटेल की तारीफ करने के बजाय पंडित नेहरू की मिर्च-मसाला लगाकर बुराई करने लगते हैं और अंत में जोड़ देते हैं कि अगर नेहरू की जगह पटेल होते तो ऐसा करते. नेहरू की अवांछित निंदा को ही वे पटेल की तारीफ मान लेते हैं. इस तरह की प्रशंसा सिर्फ इतना ही दिखाती है कि ये प्रशंसक न तो नेहरू को लेकर गंभीर हैं और न उन्हें पटेल से ही कोई दिली मुहब्बत है. वे तो बस अपनी बात सिद्ध करने के लिए पटेल का इस्तेमाल कर रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे महात्मा गांधी की निंदा करने का बहाना खोजने के लिए सुभाष चंद्र बोस या सरदार भगत सिंह का इस्तेमाल किया जाता रहा है. वैसे, इस सारे तुलनात्मक निंदा कार्यक्रम को हवा मिलती है नेहरू और पटेल के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद से. दोनों नेता खुद भी इस बात को मानते थे कि आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर उनके विचारों में बुनियादी फर्क है. लेकिन दोनों यह भी मानते थे कि आपसी असहमति के साथ काम करने पर वे सहमत हैं. नेहरू और पटेल के बीच 1948 से 1950 के बीच हुए पत्र व्यवहार से पता चलता है कि एक दौर ऐसा भी आया जब नेहरू और पटेल दोनों को जिम्मेदारी के साथ यह लगा कि उन दोनों में से किसी एक को भारत सरकार से अलग हो जाना चाहिए. और दोनों ने ही यह कहा कि बेहतर होगा कि वह खुद पद त्याग दे ताकि दूसरा बेहतर ढंग से देश को संभाल सके. इससे भी बड़ी बात यह कि बापू भी यह सोचने लगे थे कि दोनों नेताओं में से किसी एक को छुट्टी दे दी जाए, ताकि दूसरा बेहतर ढंग से देश को चला सके. गजब यह है कि दोनों नेताओं को यह अनुभूति उस गाढ़े वक्त में हो रही थी, जब जनवरी 1948 में महात्मा गांधी अपने जीवन के आखिरी उपवास पर थे और दिल्ली शरणार्थियों के बोझ से दबी जा रही थी. लेकिन दोनों नेता यह भी जानते थे कि अगर वे ऐसे समय में एक दूसरे से अलग होते हैं, जब देश मजहबी दंगों की आग में जल रहा है, महात्मा गांधी उपवास पर बैठे हैं और नई-नई सरकार अभी चलना शुरू करने वाली है, तो पूरी दुनिया में न सिर्फ भारत के बारे में गलत संदेश जाएगा, बल्कि देशविरोधी तत्व इसका लाभ उठाएंगे. ऐसे में तय किया गया कि इस विवाद का समाधान महात्मा गांधी से ही करा लिया जाए. पहले नेहरू जी ने अपना पक्ष रखते हुए एक ड्राफ्ट गांधी जी को भेज दिया और उसकी प्रति पटेल का पठा दी. अगले दिन पटेल ने भी ठीक यही काम किया. अब फैसला साबरमती के संत को करना था. यहां यह जानने में भी हर्ज नहीं है कि पटेल ने गांधी जी को लिखे पत्र में कहा था कि मेरे व्यवहार से अगर जवाहरलाल और आपको दुख होता है तो बेहतर है, अब आप मुझे मुक्त कर दें. वहीं नेहरू का कहना था कि अगर प्रधानमंत्री स्वतंत्र रूप से अपना काम नहीं कर सकता तो वे यह पद छोड़ देना चाहते हैं. इसके अलावा नेहरू जहां सारी दुश्वारियों के बावजूद बापू के अनशन को उचित मान रहे थे, वहीं पटेल को यह अपने ही लोगों पर गांधीजी की कुछ ज्यादा ही सख्त कार्रवाई लग रही थी. नेहरू वाली बात की तस्दीक मुख्यमंत्रियों को लिखे नेहरू जी के पत्र से होती है, जबकि पटेल वाली बात को गांधी जी की जीवनी ‘अनमोल विरासत’ में उनकी पौत्री सुमित्रा कुलकर्णी और मौलाना आजाद ने अपनी किताब ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में बेहतर ढंग से समझाया है. मौलाना ने तो यहां तक कहते हैं कि पटेल का व्यवहार गांधीजी के प्रति हिकारत भरा हो गया था. बहरहाल आजादी के छह महीने के भीतर राष्ट्रपिता को अपने दो सिपहसालारों में से एक को चुनना था. इसके लिए जरूरी था कि तीनों लोग एक साथ बैठें और फिर फैसला हो. लेकिन यह मीटिंग कभी हो नहीं पाई. यह मुलाकात 31 जनवरी 1948 को तय की गई थी, लेकिन उसके एक दिन पहले ही महात्मा की हत्या कर दी गई. हां, एक चीज जरूर हुई कि हत्या वाले दिन पटेल गांधी जी से मिले और दोनों ने करीब एक घंटे साथ गुजारे. इसी मुलाकात में गांधी जी ने पटेल से कहा कि मौजूदा हालात में दोनों में से किसी को भी हटाना संभव नहीं है. आप दोनों को मिलकर ही काम करना होगा. यह बात खुद पटेल ने नेहरू को बताई. बापू की हत्या ने हालात को हमेशा के लिए बदल दिया. 3 फरवरी 1948 को नेहरूजी ने सरदार को पत्र लिखा, ‘अब बापू के स्वर्गवास के बाद हर बात बदल गई है और अब हमें बिलकुल भिन्न और अधिक विकट संसार का सामना करना है. पुराने विवादों और झगड़ों का अब बहुत महत्व नहीं रह गया है. यह आवश्यक तकाजा है कि हम सब और अधिक निकट आकर सहयोगपूर्वक काम करें. बेशक दूसरा कोई मार्ग नहीं है.’ इसी पत्र में नेहरू ने कहा कि जब भी कोई विवाद होगा तो दोनों आपस में लंबी बातचीत कर किसी नतीजे पर पहुंचा करेंगे. दो दिन बाद जवाबी पत्र में पटेल ने जो लिखा वह तारीखी है, ‘पत्र में व्यक्त किए गए स्नेह और सहृदयता का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा है- असल में उन्होंने मुझे अभिभूत कर लिया है.’ दोनों नेताओं ने अपने सर्वोच्च नेता की बात मान ली. और किस कदर मानी इसकी बानगी दोनों के बीच पटेल की मृत्यु तक चले संवाद से मिलती है. मार्च 1950 में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जारी हिंसा से नेहरू इतने व्यथित थे कि उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया. इस बात की सूचना उन्होंने पटेल के अलावा राजेंद्र प्रसाद को भी दी. लेकिन यहां एक बार फिर पटेल ने फरवरी 1948 के पत्रों का जिक्र किया और नेहरूजी को दोनों के रिश्तों के बारे में बापू की आखिरी वसीयत का हवाला दिया. राष्ट्रपिता के आखिरी फरमान से दोनों ही बंधे थे और दोनों साथ बने रहे. लेकिन क्या वैचारिक विरोध के बावजूद परस्पर सम्मान से भरी दो बड़े नेताओं की कहानी उन आलोचकों की समझ में आएगी, जिनका खोखला राष्ट्रवाद नकार पर खड़ा है. बेहतर होगा वे नेहरू से न सही तो पटेल से ही राष्ट्रवाद का अर्थ समझने की कोशिश करें. ऐसा करने में शायद वे बिना किसी का कद घटाए लौह पुरुष की सच्ची तारीफ करने प्रसंग भी खोज पाएं. (साभार आजतक)
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