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मॉनसून सत्र तो धुल गया, अब आगे क्या होगा?

नई दिल्ली। संसद का नहीं चल पाना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। संसद की सबसे प्रमुख भूमिका विधायी कार्यों की होती है। लेकिन संसद में गतिरोध बने रहने के कारण अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक लंबित हैं। जबकि मानसून सत्र के सिर्फ दो दिन बचे हैं। ऐसा लगता है कि यह पूरा सत्र ही हंगामे और बहिष्कार की भेंट चढ़ जाएगा। मंगलवार को राज्यसभा में जीएसटी विधेयक पेश करने का मौका तो सरकार को मिल गया, पर यह इसी सत्र में पारित हो पाएगा कहना मुश्किल है। सरकार 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में अध्यादेश के जरिए किए गए नौ अहम संशोधनों में से छह को वापस लेने के संकेत दे चुकी है। लेकिन नए विधेयक पर विचार कर रही संसदीय समिति अब भी अपनी अंतिम रिपोर्ट नहीं दे सकी है। लिहाजा, सरकार के सामने भूमि अध्यादेश को निरस्त होने देने और विधेयक पेश करने के लिए शीतकालीन सत्र का इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं है। जीएसटी और भूमि अधिग्रहण से संबंधित विधेयकों के लंबित रहने पर स्वाभाविक ही उद्योग जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई है, क्योंकि इन विधेयकों को वे आर्थिक सुधार के बड़े कदम के रूप में देखते हैं। सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन वाले प्रावधान भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से हटा दिए गए थे। अब सरकार ने इन्हें प्रस्तावित कानून में शामिल करने के लिए रजामंदी दिखाई है। लेकिन कई मसलों पर अब भी विवाद बना हुआ है। मसलन, यूपीए सरकार के समय बने कानून में यह प्रावधान था कि अगर अधिग्रहण के बाद पांच साल के भीतर संबंधित जमीन का घोषित मकसद के अनुरूप उपयोग शुरू नहीं हो पाता है, तो उसे मूल मालिक को लौटा दिया जाएगा। कांग्रेस चाहती है कि यह प्रावधान भी प्रस्तावित कानून में शामिल किया जाए। लेकिन जीएसटी विधेयक पर तो उसका रवैया विचित्र है। जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर की पहल यूपीए सरकार ने ही की थी। इस बारे में एक विधेयक भी पेश किया था, जो कानूनी जामा नहीं पहन सका। जीएसटी से संबंधित नया विधेयक उसी पहल को आगे बढ़ाने और मूर्त रूप देने के लिए है। इस मामले में करीब एक दशक से गतिरोध बना रहा, तो उसकी मुख्य वजह राज्यों की आपत्तियां थीं। पर एक-एक करके वैसे लगभग सभी मतभेद सुलझा लिए गए हैं। फिर भी, जीएसटी विधेयक मानसून सत्र में पारित नहीं हो पाता है, तो प्रस्तावित कर प्रणाली को लागू करने की तिथि एक बार फिर आगे खिसकानी पड़ सकती है। कांग्रेस का रवैया अब कुछ विपक्षी दलों को भी नागवार लगने लगा है। क्षेत्रीय दलों की परेशानी यह है कि संसद ठप रहने से वे सदन में अपने राज्य की समस्याएं नहीं उठा पा रहे हैं। कभी-कभार सरकार पर दबाव बनाने के लिए संसदीय कार्यवाही के बहिष्कार की उपयोगिता हो सकती है। मगर इस रणनीति के इस्तेमाल की सीमाएं हैं। अगर संसदीय कार्यवाही लगातार बाधित की जाएगी तो इसे हठधर्मिता के रूप में ही देखा जाएगा। कांग्रेस ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं पर सरकार को घेरना चाहती है, तो विपक्षी पार्टी के नाते यह उसका हक है, मगर वह दूसरे विकल्प चुन सकती है।
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