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टुन्नाजी रहेंगे ‘टाइट’ या विनोद देंगे ‘फाइट’, साइलेंट वोटर्स ने बिगाड़ी ‘डाइट’!

आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डा.राजेन्द्र प्रसाद की धरती सीवान में एमएलसी चुनाव बना उम्मीदवारों की इज्जत का सवाल, आज होगा मतदान, मुख्य मुकाबला भाजपा और जनता परिवार के प्रत्याशी के बीच होने का अनुमान, कांटे की टक्कर होने से अप्रत्याशित रिजल्ट की उम्मीद, मोहम्मद शहाबुद्दीन के नाम पर भी मांग रहे वोट 
  
राजीव रंजन तिवारी   
सीवान (बिहार)। वैसे यह सबको पता है कि भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत होने वाले चुनाव पूरी तरह सियासी संभावनाओं पर ही आधारित होता है। यही वजह है कि देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न की धरती सीवान में 7 जुलाई को होने वाले एमएलसी चुनाव के लिए मतदान को भी इन असीमित सियासी संभावनाओं की परिधि से अलग नहीं किया जा सकता। भाजपा और राजद (जनता परिवार) के बीच कांटे की टक्कर के कारण यह कह सकते हैं कि रिजल्ट कुछ भी हो सकता है। इस चुनाव के बारे में स्पष्ट आकलन न कर पाने का एक वजह यह भी है कि डेलीगेट्स मतदाताओं की ओर से अबतक कुछ स्पष्ट संकेत नहीं मिल सके हैं। नतीजतन मुख्य मुकाबले में माने जा रहे राजद (जनता परिवार) के प्रत्याशी विनोद जायसवाल व भाजपा प्रत्याशी तथा निवर्तमान एमएलसी टुन्नाजी पाण्डेय के बारे में लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं  कि वोटरों ने दोनों लोगों की डाइट (भोजन) का जायका बिगाड़कर रख दिया है। फलतः यह सवाल नजरों से ओझल नहीं हो पा रहा है कि मतदान के दिन भाजपा के टुन्नाजी पाण्डेय टाइट यानी विजयश्री पाने के लिए मुस्तैद व एक्टिव रहेंगे अथवा राजद के विनोद जायसवाल से उन्हें कड़ी टक्कर मिलेगी यानी विनोद उन्हें फाइट दे पाएंगे। हां, एक सच्चाई दोनों खेमों में देखने को मिल रही है कि दोनों प्रत्याशियों के समर्थक व निचले दर्जे के कार्यकर्ता अपने नेताओं से खुश नहीं हैं। क्योंकि टुन्नाजी पाण्डेय हों या विनोद जायसवाल, पैसे खर्च करने के मामले में कमोबेश एक जैसे ही हैं। होना भी चाहिए, क्योंकि दोनों नेता चर्चित शराब कारोबारी हैं और एक-एक पैसे का हिसाब रखते हुए ही सियासी रणभूमि में विजयश्री हासिल करने को जोर-आजमाइश कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है बीते करीब छह माह पहले स्थानीय एमएलसी के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुनाव कराया गया। जिसमें भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़कर पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के चर्चित शराब कारोबारी टुन्नाजी पाण्डेय ने सियासत में अपना कदम रखा। पहली बार चुनाव लड़ने का जोश भी था उनमें। रिजल्ट यह हुआ कि तब सामने कोई दमदार उम्मीदवार न होने से वे आसानी से जीत गए। स्वाभाविक है उन्हें भी सियासत का चस्का लग गया। छह माह बाद कार्यकाल पूरा होने पर चुनाव आयोग ने एमएलसी चुनाव की घोषणा कर दी। तमाम प्रक्रियाओं से गुजरते हुए 7 जुलाई को मदतान की तिथि तय हुई। सीटिंग एमएलसी होने के नाते भाजपा ने पुनः टुन्नाजी पाण्डेय पर ही अपना भरोसा जताया, हालांकि उन्हें टिकट ना मिले इसके लिए भाजपा के ही कई नेता पटना से लेकर दिल्ली तक दौड़ लगाते रहे। उधर, राजद (जनता परिवार) की ओर से पूर्वी यूपी के चर्चित नेता राम प्रसाद जायसवाल के निकट संबंधी व शराब कारोबारी विनोद जायसवाल को मैदान में उतारा गया। देशरत्न डा.राजेन्द्र प्रसाद की धरती सीवान का यह मिथक बन चुका है कि यहां चाहें कोई भी चुनाव हो गैर भाजपा उम्मीदवार को सिर्फ व सिर्फ बिहार में राबिन हूड के नाम से मशहूर चर्चित नेता पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन (जो फिलहाल जेल में हैं) की लोकप्रियता पर ही भरोसा रहता है। सीवान जिले में एकाध फीसदी वोट से जीत-हार भले किसी भी दल या नेता की हो जाए लेकिन जेल में रहने के बावजूद शहाबुद्दीन की लोकप्रियता का जलवा कायम रहता है।
सूत्रों का कहना है कि राजद उम्मीदवार विनोद जायसवाल की सियासी नाव बेशक मोहम्मद शहाबुद्दीन की लोकप्रियता पर ही टिकी हुई है। विनोद जायसवाल के बाहरी होने के बावजूद निवर्तमान एमएलसी टुन्नाजी पाण्डेय को जोरदार टक्कर देना भी यह सिद्ध करता है तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शहाबुद्दीन की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। वरना, विनोद जायसवाल को यहां कौन जानता है और उन्हें कौन पूछता। राजद के सूत्र मायूस होकर कहते हैं कि शराब कारोबारी होने के कारण विनोद जायसवाल खर्च करने में भी जबर्दस्त कंजूसी कर रहे हैं, इससे शहाबुद्दीन के नाम पर दिन-रात एक कर विनोद के लिए काम करने वालों में हाताशा की स्थिति है। बावजूद इसके राजद कार्यकर्ता शहाबुद्दीन के नाम पर भूखे पेट भी विनोद जायसवाल के लिए मैदान में न सिर्फ अड़ा है बल्कि मजबूती से खड़ा है। यूं कहें कि विनोद जायसवाल की वजह से भाजपा प्रत्याशी टुन्नाजी पाण्डेय की पेशानी पर पसीना आ गया है। मंगलवार को होने वाले मतदान के दौरान किस तरह का नजारा दिखेगा, इसकी कल्पना इलाके के लोग अभी से करने लगे हैं। वजह सिर्फ शहाबुद्दीन हैं। राजद के वरिष्ठ नेता व जीरादेई विधानसभा क्षेत्र में खासे लोकप्रिय राणा प्रताप सिंह साफ तौर पर दावा कर रहे हैं कि एमपी साहब (शहाबुद्दीन) की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं ने जिस तरह दिन-रात एक कर दिया है, उसे देखकर विनोद जायसवाल की जीत पक्की है।
अब बात करते हैं भाजपा प्रत्याशी व निवर्तमान एमएलसी टुन्नाजी पाण्डेय नकारात्मक व सकारात्मक शैली की। बेशक टुन्नाजी पाण्डेय व्यक्तिगत रूप से अच्छे व्यक्ति हैं। मृदुभाषी हैं। सबके दुख-सुख में शामिल होने की कोशिश करते हैं। हां, उन पर एक मामूली किन्तु खराब आरोप है कि जो लोग उन्हें दिल चाहते हैं, वे (टुन्नाजी पाण्डेय) जरूरत पड़ने पर समर्थकों का फोन नहीं उठाते अथवा आसपास फोन रहने के बावजूद किसी से कहलवा देते हैं कि कह दो कि बाथरूम में हैं। हालांकि यह कोई गंभीर इश्यू नहीं है। सबके बावजूद इसे टुन्नाजी पाण्डेय की जीवटता ही कही जाएगी कि एक तरफ शहाबुद्दीन जैसे दिग्गज के समर्थन वाले उम्मीदवार विनोद जायसवाल को वे कड़ा टक्कर दे रहे हैं। इसके पीछे सिर्फ टुन्नाजी पाण्डेय की अपनी भागदौड़, रणनीति, कुटनीति और स्वभाव है, क्योंकि वे जिसे अपना थिंक टैंक मानते हैं, वह परोक्ष व वैचारिक रूप से विनोद जायसवाल के खेमे में खड़ा है। पता नहीं टुन्नाजी पाण्डेय को इस बात का एहसास है कि नहीं। यह भी कह सकते हैं कि टुन्नाजी पाण्डेय जैसे सज्जन व्यक्ति के पास विश्वसनीय लोगों का अभाव है। इसके पीछे उनके कथित समर्थक भी दबी जुबान से वही बात कह रहे हैं, जो विनोद जायसवाल के लोगों का कहना था। यानी टुन्नाजी पाण्डेय भी शराब व्यापारी होने के कारण एक-एक रुपया बड़ा हिसाब-किताब से खर्च कर रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है, जहां जरूरत है वहां पैसा न जाकर गैरजरूरी मामलों में खर्च हो जा रहा है। यह काम जानबूझकर उनके कथित अपने लोग करा रहे हैं। शायद यही वजह है कि टुन्नाजी पाण्डेय के साथ काम करने वाले लोग उनका (टुन्नाजी पाण्डेय) का खा रहे हैं और आंख दबाकर विनोद जायसवाल के लिए वोट मांग रहे हैं। बावजूद इसके टुन्नाजी पाण्डेय कहीं से कमजोर नहीं दिख रहे हैं, इसका पूरा श्रेय उनकी व्यक्तिगत शैली को ही जाता है। दूसरी तरफ भाजपा संगठन से जुड़े लोग भी कहने के लिए तो टुन्नाजी पाण्डेय के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर कुछ और है। लालची समर्थकों व नेताओं को सिर्फ रुपया चाहिए। भाजपा खेमे से यह आवाज आ रही है कि टुन्नाजी जहां जरूरत है, वहां खर्च नहीं कर रहे हैं और गैर जरूरी जगहों पर लुटा रहे हैं। इस इलाके में कपड़ा व्यापारियों पर एक किस्सा कहा जाता है-‘बनिया गज नहीं हारता, थान हार जाता है।’ सूत्रों का कहना है कि यानी कम पैसे में बनने वाले काम को टुन्नाजी नजरंदाज कर रहे हैं और कम लाभ मिलने वाले स्थान पर ज्यादा खर्च कर बेकार का पैसा बहा रहे हैं। बहरहाल, आज कतल की रात है। यह रात कैसे बीतती है यह देखना है और कल (7 जुलाई को) होने वाले मतदान के बाद परिणाम भी देखने वाला होगा। कुल मिलाकर मुकाबला रोचक व दिलचस्प है। देखना है कि क्या होता है। (सभी फाइल फोटो और सूत्रों के हवाले से विश्लेषण)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक, विदेश मामलों के जानकार  व चर्चित स्तंभकार हैं)
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