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धौलपुर पैलेस ‘सरकारी’ है, पर वसुंधरा के सांसद पुत्र दुष्यंत का दावा कितना जायज?

कांग्रेस पार्टी दस दस्तावेज़ों के सहारे यह साबित करने में लगी है कि धौलपुर हाउस सरकारी संपत्ति है। इसे निजी संपत्ति बताकर दुष्यंत की कंपनी ने अपराध किया है 
नई दिल्ली/जयपुर। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने भारत के खिलाफ जाकर, ललित मोदी के लंदन में बसने के लिए गुप्त हलफमाना दिया, यह गुनाह है या नहीं? अब यह सवाल बहुत आसानी से सुषमा स्वराज के ट्रैवल डाक्यूमेंट दिलाने के मामले की तरह पीछे छूटता जा रहा है। हर दिन आने वाला एक नया आरोप वसुंधरा के लिए ढाल बन रहा है। नया मामला कुछ ज्यादा ही पेचीदा हो गया है, जिसे कोर्ट ही सुलझा सकता है। धौलपुर पैलेस सरकार का है या वसुंधरा के सांसद पुत्र दुष्यंत का, यह सवाल सियासी हलकों में खूब शोर मचा रहा है। आगरा (यूपी) वाले चाहें तो मात्र 46 किमी की दूरी तय कर धौलपुर के इस राजनिवास पैलेस पहुंच सकते हैं। ये राजस्थान के खूबसूरत हेरिटेज होटलों में गिना जाता है। धौलपुर रियासत 1779 से ईस्ट इंडिया कंपनी व ब्रिटिश हुकूमत के संरक्षण में रही है। 1949 में भारत में विलय के कुछ समय बाद इसका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया व 1977 से ये सरकारी संपत्ति है। ये इसलिए अहम हो गया है कि दुष्यंत सिंह की कंपनी ने अपने बहिखाते में निजी संपत्ति के रूप में दावा किया है। इसी के आधार पर वे अपनी कंपनी को इस लायक बताते हैं कि कोई ललित मोदी जैसा कारोबारी 10 रुपये का शेयर 96 हज़ार में खरीदता है। कांग्रेस पार्टी 10 दस्तावेज़ों के सहारे यह साबित करने में लगी है कि यह धौलपुर हाउस सरकार की संपत्ति है। इसे निजी संपत्ति बताकर दुष्यंत सिंह की कंपनी ने अपराध किया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश तो कहते हैं कि जब तक वसुंधरा का इस्तीफा नहीं होगा ऐसे दस्तावेज़ निकलते रहेंगे। इसके लिए कांग्रेस नेशनल आक्राइव से 1949 के दस्तावेज़ इसलिए निकाली कि वह बता सके कि धौलपुर हाउस सरकारी संपत्ति है। कांग्रेस ने आज 2010 का राजस्थान सरकार का एक दस्तावेज़ दिखा कर बताया कि धौलपुर हाउस की ज़मीन की मालिक सरकार है। लेकिन जब 2010 में इसका नेशनल हाईवे अथारिटी ने अधिग्रहण किया तो इसका मुआवज़ा दुष्यंत सिंह ने लिया। वो भी दो करोड़। जयराम रमेश का कहना है कि 10 अप्रैल 2013 को दो लोगों ने सीबीआई से शिकायत की थी कि दुष्यंत सिंह इसके मालिक नहीं हैं तो उन्होंने मुआवज़ा क्यों व कैसे ले लिया। यह अपने आप में एक फ्राड है जिसकी सीबीआई रिपोर्ट का आज भी इंतज़ार है। इसके अलावा 17 मई 2007 का भरतपुर के अतिरिक्त ज़िला जज का आदेश भी दिखाया गया, जिस आधार पर उनका दावा है कि कोर्ट ने दुष्यंत को कहा कि वे धौलपुर महल में रखी अचल संपत्ति को ले जा सकते हैं। इन सब दलीलों से कांग्रेस साबित करती रही कि धौलपुर पैलेस दुष्यंत सिंह की निजी संपत्ति नहीं है। बीजेपी कहती है कि 1949 का दस्तावेज़ सही है लेकिन 1959 में केसर बाग पैलेस देकर दुष्यंत सिंह ने धौलपुर पैलेस ले लिया था। इस बाबत बीजेपी ने भी प्रेस कांफ्रेंस किया लेकिन कांग्रेस की तरह कोई भी दस्तावेज़ नहीं दे पाई, सिर्फ अपने पक्ष में दस्तावेज़ों को दिखाया। बीजेपी का कहना है कि 2010 में दुष्यंत सिंह को दो करोड़ का मुआवज़ा मिला तब तो दिल्ली और जयपुर दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। जब 10 अप्रैल 2013 को दो लोगों ने सीबीआई से शिकायत की तब कांग्रेस ने जांच क्यों नहीं की। बीजेपी कहती है कि 17 मई 2007 के आदेश से दुष्यंत के पक्ष में संपत्ति आई है। बताते हैं कि इस आदेश को पूरा पढ़ने पर यही लगता है कि धौलपुर पैलेस दुष्यंत को मिला है। बीजेपी ने उसी आदेश का एनेक्सचर 9 पढ़कर सुनाया। जिसमें लिखा है कि वारिस को धौलपुर पैलेस पर हक है। 2009 का गजट नोटिफिकेशन है कि धौलपुर पैलेस निजी संपत्ति है। 1980 में धौलपुर कोर्ट में हेमंत सिंह ने बयान दिया था कि घौलपुर पैलेस उन्हें पूरे जीवनकाल के लिए मिला है। केसरबाग के बदले इसे उन्हें परिवार को दिया गया। क्या कांग्रेस दस्तावेज़ों के कुछ हिस्सों को लीक कर रही है जो उसे सूट कर रहा है या बीजेपी उन हिस्सों को लीक कर रही है उसे सूट कर रहा है। बहरहाल, यह सवाल गंभीर होता जा रहा है। अब यह देखना है कि यह विवाद कहां जाकर ठंडा होता है।
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