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‘मन की बात’ में ‘नीरो की बंसी’ जैसी धुन तो नहीं!

राजीव रंजन तिवारी 
 भारत की आजादी के बाद से अब तक के सबसे जनप्रिय प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी की ‘मन की बात’ 28 जून को भी सुनने को मिली। इस बार भी ‘मन की बात’ हमेशा की तरह था तो सामान्य ही, पर देश के लोगों को अवश्य इसमें से ‘नीरो की बंसी’ से निकलने वाली धुन सुनाई दे रही थी। वजह स्पष्ट है, हर कोई यह उम्मीद पाले बैठा था कि इस बार के ‘मन की बात’ में प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी छोटे मोदी (ललित मोदी) से लेकर सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी, वसुंधरा राजे सिंधिया और पंकजा मुंडे के बाबत जरूर कुछ ना कुछ कहेंगे। क्योंकि उन्हें भी पता है कि आज देश के चौक-चौराहों, गांव-गिरांव, शहर-कस्बों से लेकर खेत-खलिहान तक की चर्चाओं में भाजपा की ये चार सम्मानित महिला नेत्रियां और छोटे मोदी ही छाए हुए हैं। लेकिन ‘मन की बात’ ने मायूस किया। पीएम मोदी ने 'मन की बात'’ में 'सेल्फी विद डॉटर' का मंत्र दिया। 21 जून को मनाए गए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की सफलता पर अपनी पीठ थपथपाई। इतना तक कह दिया कि योग दिवस मुझे आंदोलित कर गया। योगा को पूरी दुनिया में सम्मान मिला। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस के लोगों ने भी योग को पसंद किया। टाइम स्क्वायर पर भी योग कार्यक्रम हुआ। हमने विरासत को विश्व में बांटा। ऐसा लगा विश्व के हर कोने से नई उमंग दिखी। विश्व अब भारत के बारे में ज्यादा जानना चाहता है। ये नौवां मौका था, जब मोदी जनता से अपने मन की बात कह रहे थे। उन्होंने 'मन की बात' की शुरूआत बीते वर्ष तीन अक्टूबर को की थी। कुल मिलाकर इस बार की पीएम की ‘मन की बात’ कुछ जमी नहीं। उनकी बातों को सुनकर लगा जैसे-‘रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था।’ मूल विषय पर आने से पहले हम ‘नीरो की बंशी’ का तात्पर्य बताना चाहते हैं। हालांकि इस बारे में करीब-करीब सबको पता है, क्योंकि यह चर्चित लोकोक्ति का रूप ले चुका है। अक्सर लोग हालातों के अनुरूप कह देते है- ‘रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था।’ बताते हैं कि वर्षों पहले धरती के अति सुन्दर देश रोम में भयंकर आग लगी थी जो लगभग छह दिन तक जलती रही। इस आग में रोम के चौदह में से दस शहर बर्बाद हो गए। कुछ इतिहासकार इस बर्बादी के लिए रोम के सम्राट नीरो को जिम्मेदार ठहराते है। उनके अनुसार जब रोम जल रहा था सम्राट नीरो सब कुछ जानते हुए भी अपने में मगन होकर बांसुरी बजा रहा था। खैर, वो तो राजतंत्र था और तब राज्य की दशा के लिए राजा ही जिम्मेदार होता था। रोम के सम्राट तो भोग विलास में डूब कर इतने आत्ममुग्ध हो गए थे कि धीरे धीरे रोम की जनता भी अपने सम्राटों का अनुसरण करते करते अपने में मद मस्त हो गयी। एक कहावत भी हैं न ‘यथा राजा, तथा प्रजा’। रोमवासियो और उनके सम्राट की यही आत्म केंदियता उनके पतन की वजह बनी। रोम और नीरो की यह कहानी आज भी प्रासंगिक और उतनी ही जीवंत लगती है। बस फर्क यही है कि रोम की जगह आज भारत है। चूंकि भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए जनता द्वारा चुने गए लोकतंत्र के मुखिया को बदहाली के जिम्मेदार माना जाता है। वह मुखिया देश के प्रधानमंत्री के रूप में होता है। यदि देश का प्रधानमंत्री दूसरी-दूसरी बातें कर मुख्य मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश करता है तो यह कहा जाने लगता है- ‘रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था।’ अब आप खुद सोचिए, क्या यह नहीं दिख रहा है कि देश की तमाम समस्याएं मुंह बाए खड़ी है। देश की लोकतांत्रिक प्रणाली स्मृति, सुषमा, वसुंधरा, पंकजा जैसी महिला नेत्रियों के खुद संकट में घिरती जा रही है। इन हालातों में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 'सेल्फी विद डॉटर' और योग दिवस की सफलता पर अपनी पीठ थपथपाने वाली बात खटक नहीं रही है। यह प्रतीत नहीं हो रहा है कि जिस देश की जनता महंगाई, सीमा संकट, आंतरिक सुरक्षा, शिक्षा-रोजगार, जन-स्वास्थ्य की समस्या, परिवहन परिचालन का दर्द, आतंकवाद, नक्सलवाद, सत्ता के केन्द्र में बैठे लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप जैसी समस्या से कराह रही हो, वहां का प्रधानमंत्री ‘सेल्फी विद डॉटर’ जैसे जुमले गढ़ने में लगा है। कश्मीर की समस्या हो या पूर्वोतर की, सब के सब गंभीर होते जा रहे हैं। नक्सलवाद, माओवाद की आग तो दावानल का रूप लेती जा रही है जिसमे कितनी चिताएं जल चुकी हैं, ठीकाना नहीं है। भ्रष्टाचार की आग तो बेशर्मी के साथ जल रही है। महंगाई की आग तो सुरसा के मुख की तरह दिन पर दिन सबको लीलती जा रही है। बेचारे गरीब मजदूरों और दिहाड़ी कामगारों के बारे में कौन सोचता है जिनकी नियती में ही रोज कुआं खोद कर पानी पीना लिखा है। कई सरकारी दफ्तरों में महात्मा गाँधी का यह अनमोल वचन एक ख़ूबसूरत फ्रेम में जड़ा दीवार से लटकता नज़र आता हैं कि ‘जब भी तुम कोई योजना या कार्य का शुभारम्भ करते हो तो सबसे पहले देश के सबसे निर्धन नागरिक का चेहरा याद करो और चिंतन करो कि इस योजना या कार्य से उसका क्या भला हो सकता है।‘ गाँधी जी की तस्वीर की तरह यह वचन भी अब शायद फ्रेम में फ्रीज़ होकर रह गया है। खैर, हालात अनुकूल नहीं हैं। इन तमाम समस्याओं को नजरंदाज करते हुए पीएम ने ‘मन की बात’ में कहा कि अगस्त में मनाए जाने वाले रक्षा बंधन पर मां-बहनों को गिफ्ट दें। ये मौसम मन को प्रसन्न करने वाला है। पकौड़े का आनंद लें। हरियाणा के बीबीपुर गांव के सरपंच ने सेल्फी विद डॉटर मुहिम चलाई है। अपनी बेटी के साथ हैशटैग सेल्फीविदडॉटर के साथ सेल्फी भेजें। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को ताकत देने वाला स्लोगन भेजें। इस तरह की अनेक बातें उन्होंने कहीं। लेकिन देश के लोग जो सुनना चाह रहे थे, उस पर उन्होंने कोई चर्चा ही नहीं किया। वैसे, आजकल मजाकिया अंदाज में कुछ पत्रकार साथी भी कहने लगे हैं कि लगता है पीएम 'महिलेरिया' से पीड़ित हैं। एक के बाद एक चार बीजेपी महिला मंत्रियों ने उनके ताक़तवर शरीर को संक्रमित कर दिया है। उनके गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही। उनकी दहाड़ को खामोश कर दिया है। विपक्ष बीजेपी की इन चार देवियों सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी और वसुंधरा राजे और पंकजा मुंडे के खिलाफ सड़क पर उतर आया है। अब तक कोई भी पार्टी सत्ता में भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का दावा करके नहीं आई थी लेकिन मोदी सरकार चुनाव से लेकर एक साल की रिपोर्ट कार्ड तक साफ़ छवि के लिए अपनी पीठ थपथपाती आई थी। कांग्रेस सरकार का करप्शन उसके दूसरे कार्यकाल में सामने आया था लेकिन राजग सरकार का करप्शन पहले ही साल में आ गया। बीजेपी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी बिहार में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए फिलहाल कोई गलती नहीं करना चाहती है। वसुंधरा राजे के मामले से पार्टी की छवि धूमिल हुई है, उसे दुरुस्त करने की कोशिश चल रही है। जबकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ऐसा बयान दिया जो सरकार की फजीहत करा सकता है। गृहमंत्री से जब स्मृति ईरानी, सुषमा स्वराज और रामशंकर कठेरिया के इस्तीफे को लेकर सवाल किया गया था तब जवाब में राजनाथ सिंह ने कहा कि ये एनडीए की सरकार है यूपीए की नहीं। यहां इस्तीफे नहीं होते। भाजपा पर पहला आर्थिक करप्शन का मामला महाराष्ट्र से आया है। बीजेपी सरकार की मंत्री पंकजा मुंडे पर 206 करोड़ के घोटाले का आरोप लग रहा है। बहरहाल, सवाल मन की बात का है, जिसमें पीएम मौजूदा किसी भी गंभीर समस्या की चर्चा नहीं की। एसा उन्होंने क्यों किया, यह समझ से परे है।
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