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भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम रखने के लिए राजद कृतसंकल्प

राष्ट्रीय जनता दल की नीतियों को सूबे के जन-जन तक पहुंचाकर बिहार को खुशहाल बनाना पार्टी की प्राथमिकता में शामिलः राणा प्रताप 
सीवान। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज, आरएसएस-भाजपा के चाल-चलन व बिहार के प्रति राजग सरकार की नीति-रीति सरीखे आज इतने सवाल मन-मस्तिष्क में हलचल मचा रहे हैं कि उसका जवाब ढूंढ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा है। यह अलग बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद बिहार में भाजपा की सोच नाकाम करने के लिए अभी से ही विभिन्न रणनीतियों पर काम कर रहे हैं, पर वे इसमें कितना सफल होंगे ये तो वक्त ही बताएगा।
इसी प्रकार के कई गंभीर सवालों पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता तथा जीरादेई विधानसभा क्षेत्र समेत पूरे सीवान जिले के लोकप्रिय और सबके सुख-दुख में साथ रहने वाले राणा प्रताप सिंह (आरपीएस) की बेबाक बातें कुछ अनुत्तरित सियासी सवालों का उत्तर ढूंढने में कमोबेश मदद तो कर ही रही है। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनकी पार्टी राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष छवि पर आंच नहीं आने देगी। राजद के वरिष्ठ नेता राणा प्रताप सिंह ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अपनी पहचान रखने वाले पोर्टल www.newsforall.in (एनएफए) से कई मुद्दों पर खास बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ कुछ संपादित अंशः

एनएफएः पिछले लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली को छोड़कर जिन अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, वहां भाजपा ने अपना परचम लहराया है। बिहार में भाजपा की क्या स्थिति होगी?

आरपीएसः देखिए, इतिहास गवाह है कि हमेशा से बिहार ने पूरे देश को राजनीतिक राह दिखाई है। यहां के लोगों की सियासी संवेदनशीलता, राजनीतिक रणनीति, कुटनीतिक कौशल और जन जागरूकता का की कोई शानी नहीं है। मान लिया कि लोकसभा चुनाव के बाद विभिन्न प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन दिल्ली में उसकी क्या दशा हुई, यह सबको पता है। यदि आपको याद हो कि दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद ही कहा था-‘जो देश का मिजाज है, वही दिल्ली का मिजाज है।’ इस वक्तव्य का यदि ठीक से आकलन करें तो यह समझ में आ जाएगा कि ये वाणी मोदी की नहीं बल्कि उनके अहंकार और घमंड की थी। यदि नरेन्द्र मोदी की ही बात को थोड़ी देर के लिए सही मान लिया जाए तो भी यह स्पष्ट हो जाएगा कि दिल्ली की मिजाज भाजपा विरोधी रही। स्वाभाविक है, पूरे देश का मिजाज अब दिल्ली जैसा ही है। अब तो आप समझ
गए होंगे कि बिहार विधानसभा चुनाव में क्या होने वाला है?

एनएफएः वो तो ठीक है, पर आरएसएस और भाजपा जिस प्रकार शिद्दत से अपनी गोपनीय रणनीतियों को अंजाम दे रहे हैं और जनता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सोशल साइट्स फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स एप आदि के सहारे काम कर रहे हैं, उसके जवाब में आप लोग क्या कर रहे हैं?

आरपीएसः हर पार्टी चाहे वो छोटी हो या बड़ी सबकी एक गोपनीय शैली होती है। उस शैली को सभी पार्टियां अपनी आइडियोलॉजी (विचारधारा) को मजबूत बनाने के लिए करती हैं। ठीक उसी तरह हमारी पार्टी यानी आम जनता की पार्टी राजद भी अपनी विचारधारा को पहले और मजबूत बनाने की कोशिश में है। उसके लिए पार्टी प्रमुख के निर्देशानुसार सभी नेता और कार्यकर्ता पूरे मनोयोग से काम कर रहे हैं। अब यह मत पूछिएगा कि क्या कर रहे हैं, क्योंकि राजद की भी कुछ गोपनीय नीति है, जिसका खुलासा करना संभव नहीं है। रहा सवाल सोशल साइट्स पर सक्रिय रहने का तो हम (राजद) भी किसी से कम नहीं हैं।

एनएफएः चलिए, कोई बात नहीं। ये बताइए कि जबसे केन्द्र में भाजपा नीत एनडीए यानी नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी है, तबसे चारों ओर गैर हिन्दू धर्मावलम्बियों मे भय व दहशत का आलम है। राजद भारतीय लोकतंत्र के इस स्थायी स्तम्भ व लोकतंत्र की तासीर धर्मनिरपेक्षता को किस प्रकार से कायम रख पाएगी? 

आरपीएसः बिहार की सामाजिक संरचना, तौर-तरीका और ताना-बाना अन्य राज्यों की अपेक्षा काफी भिन्न है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि यहां के लोग अलग-अलग जाति-धर्म के होने के बावजूद एक साथ उठते-बैठते हैं, रहते हैं, मेल-मिलाप रखते हैं। कई शैक्षणिक शोध और अनुसंधानों की रिपोर्ट भी यह कहती है कि बिहार की सांस्कृतिक व सामाजिक मीठास के आगे साम्प्रादायिक कड़वापन की एक नहीं चलने वाली है। बिहार की सकारात्मक सोच वाली जनता आरएसएस और भाजपा के मंसूबे को यहां सफल नहीं होने देगी। यानी समाज को विखंडित कर वोट लेने की भाजपा की रणनीति बिहार में नहीं चलने वाली है।

एनएफएः बिहार विधानसभा चुनाव से पहले संभावित जनता परिवार के आस्तित्व में आने व कुछ मतभेदों के कारण बनने से पहले ही टुटने की बातों को आप किस नजर से देखते हैं?

आरपीएसः जनता परिवार से संबंधित सवाल बेहद उच्चस्तरीय है। इस बारे में पार्टी के बड़े नेता ही कुछ बता सकते हैं। वैसे भी इस तरह के सवालों से मेरा कोई खास वास्ता नहीं है। मैं तो एक ही बात जानता हूं कि जनता की सेवा, सहयोग और सद्भाव में कमी नहीं आनी चाहिए। किसी भी जाति-बिरादरी का कोई भी व्यक्ति उनके सामने जब अपनी समस्याएं रखता है तो वे उसे शत-प्रतिशत दूर करने का प्रयत्न करते हैं। मेरी मानसिकता राजनीति करने की नहीं रही है। मुझे जनसेवा में जो नैसर्गिक सुख और आनंद का एहसास होता है, वह कही मिलने वाला नहीं है। मेरे चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने का फैसला क्षेत्र की जनता करती है।

एनएफएः इस बार क्या इरादा है? विधानसभा चुनाव लड़ना है या नहीं?

आरपीएसः इस सवाल का जवाब तो मैंने पिछले सवाल में ही दे दिया है। मेरी नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है, जनभावनाओं का जो संकेत होगा, वही मेरा फैसला होगा। मैंने खुद को जनता के लिए समर्पित कर रखा है। जनहित और जनसेवा ही मेरा कर्म और धर्म है। राजद की नीतियां सभी जाति-धर्म के लोगों के लिए बेहतरीन और उपयोगी है। पार्टी नेतृत्व का यह संकल्प है कि बिहार ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम रखना है।

एनएफएः तमाम प्रतिभा, योग्य अधिकारी, कर्मठ लोग और अनेक गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत को समेटे रहने वाले बिहार की पहचान एक पिछड़े राज्य की बनी हुई है। बिहार इस छवि से कबतक मुक्त हो जाएगा?

आरपीएसः जनता के रूझान को देखकर यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि विधानसभा चुनाव के बाद राजद प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। स्वाभाविक है, बड़ी पार्टी की ही सरकार बनेगी। फिर बिहार के विकास में तेजी आएगी, इसकी कथित बिगड़ी छवि में सुधार होगा और बिहार उन राज्यों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जो ना सिर्फ विकासशील हैं, बल्कि विकसित हैं।                                                         आलेख एवं फोटोः राजीव रंजन तिवारी
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