ताज़ा ख़बर

भूकंपः आख़िर क्यों आ गया ये ज़लज़ला?

नई दिल्ली। क्या नेपाल में आया 7.9 की तीव्रता का ये ज़लज़ला अप्रत्याशित था? नहीं। भूवैज्ञानिक बीते कई साल से मध्य हिमालय में बड़े भूकंप आने की आशंका जताते रहे हैं। ये भूकंप उसी आशंका को सही ठहरा रहा है। ये आशंका आख़िर किस आधार पर जताई गई ये समझने के लिए हमें हिमालय के निर्माण को समझना होगा। भूवैज्ञानिकों के मुताबिक क़रीब पचास करोड़ साल पहले धरती दो बड़े महाद्वीपों में बंटी हुई थी। यूरेशिया और गोंडवाना लैंड। धरती के विकास क्रम में गोंडवाना लैंड कई टुकड़ों में बिखरकर अलग-अलग दिशाओं की ओर बढ़ा। इसका एक हिस्सा जो भारतीय उपमहाद्वीप बना वो उत्तर की ओर यूरेशियन प्लेट से टकराया। दोनों प्लेटों के बीच इसी टक्कर और रगड़ से बनी सिलवटों से हिमालय बना है। ये टक्कर जारी है और नतीजा ये है कि हिमालय की ऊंचाई आज भी बढ़ रही है। भारतीय प्लेट आज भी पांच सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से यूरेशियन प्लेट पर दबाव बना रही है या कहें कि उसके नीचे खिसक रही है। दोनों प्लेटों के बीच बढ़ रहे इस दबाव में छुपी ऊर्जा रह रहकर जब रिलीज़ होती है तो यहां भूकंप आते हैं। इस हिमालयी इलाके में आठ की तीव्रता के आसपास के भूकंप आते रहे हैं। जैसे 1897 में शिलांग, 1905 में कांगड़ा, 1934 में बिहार नेपाल बॉर्डर और 1950 में असम का भयानक भूकंप। कांगड़ा से शिलांग के बीच की यही एक हज़ार किलोमीटर लंबी बेल्ट है जहां ज़मीन के नीचे भयानक बेचैनी बनी हुई है। इसे सेंट्रल साइज़्मिक गैप कहा जाता है। यहां दोनों टैक्टोनिक प्लेटों के बीच बढ़ रहा दबाव अपने भीतर भयानक ऊर्जा समेटे हुए बैठा है। नेपाल में आया भूकंप इसी ऊर्जा के रिलीज़ होने का ज़रिया बना है। अब सवाल ये है कि क्या इसके बाद ये सिलसिला थम जाएगा? जवाब है नहीं। भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने का सिलसिला जारी है और ये दबाव आगे किसी और इलाके में किसी और भूकंप की शक्ल में सामने आ सकता है। सबसे ज़्यादा आशंका है सेंट्रल साइज़्मिक गैप में। अब ऐसे भूकंपों से होने वाले नुकसान से बचने का एक ही तरीका है कि भवन निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए। ये समझदारी हमें विरासत में भी मिली है जिसे हम छोटे-छोटे लालचों की वजह से भूलते जा रहे हैं। वैसे ये कहा ही जाता है कि भूकंप हमें नहीं मारता। इमारतें मारती हैं।
दुनिया में रोज आते हैं 9,000 भूकंप
रेक्टर स्केल पर दुनिया भर में रोजाना 9,000 भूकंप दर्ज किए जाते हैं। माइक्रो और माइनर कैटेगरी के भूकंप रेक्टर स्केल पर प्रति दिन दुनियाभर में 9,000 दर्ज किए जाते हैं। रेक्टर स्केल पर 2.0 से कम तीव्रता वाले भूकंप को माइक्रो कैटेगरी में रखा जाता है और यह भूकंप महसूस नहीं किए जाते। रेक्टर स्केल पर माइक्रो कैटेगरी के 8,000 भूकंप दुनियाभर में रोजाना दर्ज किए जाते हैं। इसी तरह 2.0 से 2.9 तीव्रता वाले भूकंप को माइनर कैटेगरी में रखा जाता है। ऐसे 1,000 भूकंप प्रतिदिन आते हैं इसे भी सामान्य तौर पर हम महसूस नहीं करते। एक अंदाज के अनुसार, हर साल रेक्टर स्केल पर वेरी लाइट और लाइट कैटेगरी के 55,200 भूकंप दर्ज किए जाते हैं। एक साल में 49,000 वेरी लाइट कैटेगरी के भूकंप 3.0 से 3.9 तीव्रता वाले होते हैं। इन्हें महसूस तो किया जाता है लेकिन शायद ही इनसे कोई नुकसान पहुंचता है। इसी तरह एक साल में 4.0 से 4.9 तीव्रता वाले 6,200 लाइट कैटेगरी के भूकंप दुनिया भर में रेक्टर स्केल पर दर्ज किए जाते हैं। इन झटकों को महसूस किया जाता है और इनसे घर के सामान हिलते नजर आते हैं। हालांकि इनसे न के बराबर ही नुकसान होता है। मॉडरेट और स्ट्रांग कैटेगरी के 920 भूकंप एक साल में रेक्टर स्केल पर दर्ज होते हैं। मॉडरेट कैटेगरी के भूकंपों की तीव्रता रेक्टर स्केल पर 5.0 से 5.9 दर्ज की जाती है। ऐसे 800 भूकंप दुनियाभर में रेक्टर स्केल पर एक साल में दर्ज होते हैं। इनसे घटिया बिल्डिंग मैटेरियल से निर्मित भवनों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। हालांकि इनका असर बहुत छोटे इलाके पर ही पड़ता है। स्ट्रांग कैटेगरी के भूकंप जिनकी तीव्रता रेक्टर स्केल पर 6.0 से 6.9 होती है, भारी तबाही होती है। जबरदस्त तीव्रता की वजह से भूकंप के केंद्र से लेकर 160 किमी तक आबादी वाले इलाकों में तबाही फैल जाती है। एक साल ऐसे 120 भूकंप दुनियाभर के रेक्टर स्केल में दर्ज किए जाते हैं। मेजर और ग्रेट कैटेगरी के भूकंप दुनियाभर के रेक्टर स्केल पर साल में 19 बार दर्ज किए जाते हैं। मेजर कैटेगरी के भूकंपों की तीव्रता 7.0 से 7.9 होती है। ऐसे भूकंपों की संख्या साल भर में 18 होती है और इनसे काफी बड़े क्षेत्रों में गंभीर तबाही होती है। रेक्टर स्केल पर 8.0 से 8.9 तीव्रता वाले भूकंप ग्रेट कैटेगरी में रखे जाते हैं। ऐसे झटकों से कुछ सौ मील तक तबाही ही तबाही पसर जाती है। हालांकि ऐसे भूकंप साल में एक बार ही दर्ज किए जाते हैं। रेक्टर स्केल पर 9.0 से 9.9 तीव्रता वाले भूकंप एक्सट्रीम कैटेगरी में आते हैं। इनसे हजारों मील तक तबाही का मंजर पसर जाता है। ऐसे भूकंप के असर से अलग-अलग महाद्वीप तक प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि ऐसे भूकंप दुनियाभर में 20 साल में एक बार ही दर्ज किए जाते हैं। रेक्टर स्केल पर 10.0 या इससे ज्यादा तीव्रता वाले भूकंप को एपिक कैटेगरी में रखा गया है। अभी तक इस तरह का भूकंप दर्ज नहीं किया गया है।
भारत में लील गया 45 जिंदगी 
नेपाल ही नहीं समूचा भारत शनिवार को कुदरत के कहर से सहमा रहा। नेपाल में तबाही मचाने के बाद भूकंप ने भारत की ओर रुख कर लिया। भूकंप ने यूपी-बिहार को भी नहीं बख्शा। पश्चिम बंगाल भी भूकंप की जद में रहा। अभी तक के आंकड़ों के अनुसार यूपी-बिहार में भूकंप से कुल 45 मौतें हो चुकी हैं व 100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं। नेपाल में जहां सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई वहीं, भारत में लाखों लोग अपनी और अपने करीबियों के जिंदगी के लिए दुआ करते रहे। दोपहर के भूकंप से लोग अभी पार नहीं पा सके थे कि शाम तकरीबन साढ़े छह बजे भूकंप ने लोगों को फिर झकझोर दिया। मुजफ्फरपुर, देवरिया, पटना, गोरखपुर व दिल्ली के इलाकों में शाम के वक्त भूकंप के झटके फिर महसूस किए गए। शाम के वक्त भूकंप की तीव्रता 4.07 रिक्टर नापी गई। नेपाल के बाद उत्तर भारत एवं आसपास के राज्यों और पड़ोसी देशों में शनिवार दोपहर आधे घंटे के अंतराल में दो बार भूकंप के जोरदार झटके आए। इस झटके के बाद पलक झपकते ही सैकड़ों लोग मौत की नदीं सो गए। अभी हालात काबू में आ पाते कि भूकंप के बाद माउंट एवरेस्ट में आए हिमस्खलन से 18 लोगों की मौत हो गई। ये सभी पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप में रुके हुए थे। भूकंप आने के कुछ ही देर बाद हिमस्खलन ने पर्वतारोहियों की जान ले ली। भारत में भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 5.06 मापी गई जबकि नेपाल में भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.9 मापी गई। वहीं शाम के वक्त यूपी-बिहार के साथ-साथ दिल्ली के कई इलाकों में 4.07 रिक्टर की तीव्रता से भूकंप के झटके महसूस किए गए। भूकंप के झटकों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश व पड़ोसी देश नेपाल पर पूरे दिन नजर गड़ाए रखी। प्रधानमंत्री ने बिहार और सिक्किम के मुख्यमंत्रियों से बात कर वहां के हालात के बारे में जानाकारी ली। प्रधानमंत्री ने दोपहर तीन बजे उच्चस्तरीय बैठक भी बुलाई। उन्होंने जनता को मैसेज भी भेजा कि मौसम विभाग ने लोगों को अभी सतर्क रहने को कहा है, अभी और झटके आने की आशंका जताई गई है। भूकंप को देखते हुए नोएडा के गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन पर तकरीबन दस मिनट तक मेट्रो सेवा रोक दी गई। भूकंप का झटके इतना जोरदार था कि उत्तर प्रदेश एवं बिहार के कई जिलों में नेटवर्क सेवा ठप हो गई। इसके चलते लोगों का मोबाइल काम करना बंद कर दिया। नेपाल में भूकंप की तीव्रता काफी थी। जिसकी वजह से वहां की मोबाइल सेवा पूरी तरह बाधित रही। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भी मेट्रो सेवा रोक दी गई है। यह झटके दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, सिक्किम, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उड़ीसा में महसूस किए गए। पूरे उत्तर भारत में लोग अपने घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार नेपाल में भूकंप का केंद्र बताया जा रहा है, जबकि रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.5 आंकी गई है। धरती से 35 किलोमीटर अंदर इसका केंद्र बताया जा रहा है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में आपातकालीन कंट्रोल रूम की स्थापना की है। यहां से 24 घंटे भूकंप पीड़ितों के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है। (साभार)
  • Blogger Comments
  • Facebook Comments

0 comments:

Post a Comment

आपकी प्रतिक्रियाएँ क्रांति की पहल हैं, इसलिए अपनी प्रतिक्रियाएँ ज़रूर व्यक्त करें।

Item Reviewed: भूकंपः आख़िर क्यों आ गया ये ज़लज़ला? Rating: 5 Reviewed By: न्यूज़ फ़ॉर ऑल