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मध्य प्रदेश में वर्षों से जारी हैं घोटाले व भ्रष्टाचार

डा.हरीश कुमार सिंह 
मध्य प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा के लिए पीएमटी के जरिये किये जा रहे फर्जीवाड़े की परतें खुलना प्रारम्भ हुई तो शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश सहित विभिन्न नौकरियों में भ्रष्टाचार एवं घोटाले सामने आते चले जा रहे हैं। राज्य सरकार के अधीन भर्ती एवं प्रवेश की प्रक्रिया को अंजाम देने वाला व्यावसायिक परीक्षा मण्डल पिछले वर्षों में व्यावसायिक परीक्षा घोटाला मण्डल ही साबित हुआ है। व्यापम फर्जीवाड़े को उजागर हुए एक साल पूरा हो गया है तथा इस घोटाले में कई रसूखदारों की गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं। हाल ही में प्रदेश में हुई जिन नौकरियों में भ्रष्टाचार के मामले सामने आये हैं उनमें संविदा शिक्षक परीक्षा, आरक्षक भर्ती परीक्षा 2012, वनरक्षक परीक्षा, सब-इंस्पेक्टर परीक्षा 2012, दुग्ध संघ परीक्षा, कनिष्ठ खाद्य अधिकारी एवं परिवहन विभाग सम्मिलित है। मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की वर्ष 2013 की वेटर्नरी चिकित्सकों का चयन एवं आयुर्वेद अधिकारी परीक्षा का पेपर आउट होना भी भ्रष्टाचार के उदाहरण हैं। संस्कृत बोर्ड में 10 वीं एवं 12 वीं परीक्षा के परिक्षार्थियों के परिणामों में हेराफेरी की भी जाँच चल रही है। उधर डा.हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति के द्वारा की गई नियुक्तियों की जांच सीबीआई कर रही है। व्यापम के फार्म बिक्री घोटाले की अपनी अलग कहानी है। भाजपा के सांसद डा.सत्यनारायण जटिया के आवास पर बोकारो स्टील प्लांट में हुई नियुक्तियों के लेकर सीबीआई छापा डाल चुकी है। इतने बड़े पैमाने पर शिक्षा एवम् नौकरियों में भ्रष्टाचार का यह बिरला ही मामला है। प्रदेश में व्यावसायिक परीक्षा मण्डल के द्वारा शैक्षणिक क्षेत्र में आयोजित विभिन्न भर्ती एवं प्रवेश की परीक्षाओं में घोटाले, फर्जीवाड़ा और भ्रष्टाचार योग्य प्रत्याशियों की अपेक्षाओं पर कुठाराघात है। ये घोटाले भले ही अभी उजागर हुए हों मगर हकीकत यह है कि पिछले आठ-दस वर्षो में प्रदेश में शिक्षा क्षेत्र में कई घोटाले हुए हैं। शिक्षा क्षेत्र का यह ताजा घोटाला कहीं पूर्व के घोटालों की तरह अंजाम तक न पहुँचे इसकी पूरी कोशिश की जा रही है। पूर्व में भी प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक पदों के चयन के लिये भारी पैमाने पर भाई-भतीजावाद और अपात्रों को नियुक्ति के प्रकरण भी सामने आये हैं। कुछ वर्ष पहले रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर में एमबीबीएस की पढ़ाई की परीक्षाओं में उच्च अधिकारियों द्वारा महिला छात्राओं का यौन शोषण कर उत्तीर्ण कराने के आरोप लगे थे तथा विवि के रजिस्ट्रार सहित कई अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई वहीं तत्कालीन कुलपति को भी त्यागपत्र देना पड़ा था। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय में दिसम्बर 2007 में व्याख्याता, रीडर आदि की नवीन नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई थी तथा तत्कालीन राज्यपाल ने न्यायाधीश श्री व्हीके अग्रवाल को जाँच के लिए नियुक्त कर रिपोर्ट देने के लिए कहा था। न्यायाधीश श्री व्हीके अग्रवाल की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय में की गई कई नियुक्तियों को मनमाना व गलत बताते हुए उन्हें निरस्त करने को कहा था। विक्रम विश्वविद्यालय की इन नियुक्तियों में विश्वविद्यालय के अधिकारियों के रिश्तेदार, स्थानीय राजनेताओं के चहेतों को नियुक्ति देकर उपकृत किया गया था। इन नियुक्तियों में एक नियुक्ति तो ऐसी थी कि जिसमें विज्ञापन व्याख्याता के समकक्ष पद के लिए दिया गया था मगर नियुक्ति रीडर के उच्च पद पर इसलिए दे दी गई कि क्योंकि सम्बंधित प्रत्याशी कुलसचिव का पुत्र था। विक्रम विश्वविद्यालय में आज भी वर्ष 2007 की धांधलियों के चयनित कई प्रत्याशी शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं क्योंकि विश्वविद्यालय के कुछ भ्रष्ट अधिकारी इन्हें संरक्षण दिये हुए है। कुछ प्रकरणों में न्यायालय ने यथास्थिति बनाये रखने के आदेश दिये हैं और विश्वविद्यालय अपना पक्ष रखना नहीं चाहता ताकि यथास्थिति बनी रहे। जाहिर है कि उपरोक्त भ्रष्टाचार के मामले आज तक अन्तिम नतीजे तक नहीं पहुँचे हैं। राज्य सरकार भ्रष्टाचार के इन मामलों पर यदि सख्ती बरतती तो शायद इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का यह खेल इतना व्यापक रूप नहीं ले पाता। मेडिकल शिक्षा में प्रवेश के लिए पीएमटी आदि में लाखों रूपया लेकर अपने चहेतों को नियुक्ति एवम् प्रवेश देने के प्रकरण सामने आ रहे हैं। लाखों रूपया देकर चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर चिकित्सक बने डिग्रीधारी और ग्रामीण क्षेत्र के झोलाछाप डाक्टरों में क्या फर्क है? अभी तक तो डोनेशन, एनआरआई या प्रबन्धन कोटे में अपात्रों को प्रवेश दिया जाता रहा था तथा यह संख्या कुल सीटों की संख्या से बहुत कम रहती थी। हाल ही में जो फर्जीवाड़ा इन्दौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन आदि शहरों में प्रकाश में आया है उसने योग्य चिकित्सकों की साख पर भी बट्टा लगा दिया है तथा पिछले कितने सालों से रूपयों के दम पर अपात्र प्रत्याशी चयनित होकर योग्य प्रत्याशियों पर वज्राघात कर रहे हैं। पीएमटी में सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों को पचास प्रतिशत अंक कम से कम लाना जरूरी है फिर भी इन्दौर के एक राजनेता के सुपुत्र के पचास प्रतिशत से कम अंक होने पर भी इन्दौर के ही निजी मेडिकल कालेज में प्रवेश दे दिया गया जिसके निदेशक अभी जेल में है। एसटीएफ की जाँच में केवल पिछले छह वर्षो में पीएमटी के माध्यम से चयनित 1100 से अधिक फर्जी डाक्टरों की पहचान हो चुकी है। चिकित्सा की पढ़ाई के क्षेत्र में ग्रेज्यूएट एवं पोस्ट ग्रेज्यूएट परीक्षा में लाखों रूपया लेकर जिन्होंने प्रवेश दिलवाया है उन्होंने अपने बड़े बड़े मेडिकल एम्पायर खड़े कर लिए हैं। पीएमटी में यह फर्जीवाड़ा वर्ष 2004 से ही चल रहा था। इन घोटालों में जिन उच्च व्यक्तियों के नाम आये हैं उनमें पूर्व उच्च व तकनीकी शिक्षा मंत्री (जो अभी जेल में है) राज्य शासन के कई उच्च अधिकारी, राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के पूर्व निजी सहायक भी सम्मिलित हैं। इन धोटालों की एक वजह यह भी है कि उच्च शैक्षणिक संस्थानें के प्रमुख पदों पर विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में राजनेताओं से जुड़े किसी भी व्यक्ति को बैठा दिया जाता है और फिर यह अधिकारी सम्बन्धित विभाग के मंत्री और नियुक्ति संस्थान के स्थाई अधिकारियों के बीच लेन-देन की कड़ी के रूप में कार्य करता है। व्यापम के परीक्षा नियंत्रक जो इस घोटाले में पकड़ाये हैं उनके ही एक भाई प्रदेश के इंजीनियरिंग काॅलेजों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था के कुलपति हैं। व्यापम घोटाले में जिस व्यवसायी सुधीर शर्मा का नाम सामने आया है वह तत्कालीन शिक्षा मंत्री के ओएसडी के समान व्यवहार करते थे तथा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को आदेश देते देखे गए। कुल मिलाकर तकनीकी शिक्षा मंत्री से जुडे उनके चहेते एक गिरोह के रूप में भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे थे। तकनीकी शिक्षा संस्थानों की सीटें बढ़ाने, और मान्यता देने के लिये भी भारी भ्रष्टाचार किया जाता है। अधिकारियों और राजनेताओं का यह गठजोड़ भ्रष्टाचार के बढ़ावा देता है। प्रदेश शासन के ईमानदार मुख्यमंत्री इन्दौर नगर निगम के पेंशन घोटाले की रिपोर्ट को मंत्रिमण्डल परीक्षण समिति के नाम पर एक वर्ष से दबाए बैठे हैं। जाहिर है कि प्रदेश सरकार के कई पूर्व मंत्रियों, अधिकारियों ने अधिकतर अपने से जुड़े उम्मीदवारों को रोजगार उपलब्ध कराये साथ ही लाखों रूपया लेकर विभिन्न पदों पर अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित करवाया वहीं पीएमटी जैसी प्रवेश परीक्षा को मजाक बनाकर रख दिया। इन घोटालों में संघ के नेताओं और राजभवन तक उंगली उठने लगी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री को चाहिये कि शैक्षणिक जगत में चल रहे भ्रष्टाचार के इस केंसर का समुचित स्थाई निदान करे अन्यथा जाँच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर प्रदेश के युवाओं की भावना का सम्मान करे। कांग्रेस के द्वारा व्यापम घोटाले की सीबीआई से जाँच की माँग पर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जवाब में कहा कि हाईकोर्ट की निगरानी में जाँच सही की जा रही है तथा उल्टे उन्होंने कांग्रेस के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों की भी जाँच कराने की बात कही है। यह और भी चिन्ता का विषय है कि पिछले कितने वर्षो से चुने गये जनप्रतिनिधि एक ओर जहाँ अपने लिये रोजगार जुटा रहे हैं वहीं लगातार योग्य युवाओं के साथ क्रूर मजाक किया जा रहा है। आप जनता के चुने गये प्रतिनिधि हैं तथा आपके अधीन प्रदेश के मंत्री और अधिकारी व्यापम के जरिये वर्षो से घोटालों को अंजाम दे रहे हैं और आप बेदाग बचना चाहे संभव नहीं है। शासन ने जिस तरह पेपर आऊट होने के कारण वर्ष 2012 की लोक सेवा आयोग की परीक्षा निरस्त की है वैसे 2007 के बाद प्रदेश में की गई सभी नौकरियों को निरस्त कर योग्य युवा के साथ न्याय करें। (डा.हरीशकुमार सिंह, सी-1/9, ऋषिनगर, उज्जैन)
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