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क्या रेलवे विजिलेंस भ्रष्टाचार रोक पाने में सक्षम है?

सुरेश त्रिपाठी, संपादक, परिपूर्ण रेलवे समाचार 
पीएमई/आईएमई/स्टोर/मेडिकल बोर्ड आदि की संवेदनशील पोस्टों पर काम करने अथवा तैनाती का ज्यादातर डाटा गलत और फर्जी है. इसलिए यहां यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस मामले में जोनल जीएम और सीएमडी द्वारा रेलवे बोर्ड के नियम/निर्देश को न सिर्फ पूरी तरह से अनदेखा किया गया है, बल्कि अपने निजी स्वार्थों के चलते इस नियम/निर्देश का धड़ल्ले से इस्तेमाल भी किया गया है और अभी-भी किया जा रहा है. इससे मेडिकल विभाग में भ्रष्टाचार को और ज्यादा बढ़ावा भी मिला है. ऐसे में रेलवे बोर्ड की हैसियत क्या है, जो नियम तो बनाता है, निर्देश भी देता है, मगर उन पर अमल सुनिश्चित नहीं करवा सकता है? रेलवे द्वारा दवाईयों और मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स की थोक खरीद, आउटसोर्सिंग सर्जिकल ऑपरेशन, ट्रीटमेंट, स्टोर मेंटेनेंस, सैनिटेशन के साथ-साथ मेडिकल इन्वेस्टीगेशन आदि-आदि के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं. इस सबकी सतर्कता जांच के लिए रेलवे बोर्ड स्तर पर एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर या डायरेक्टर विजिलेंस/मेडिकल और सभी जोनल सतर्कता संगठनों में डिप्टी सीवीओ/मेडिकल की पोस्ट क्यों नहीं बनाई गई है? क्या कोई स्टोर्स या एकाउंट्स ऑफिसर इस लायक हो सकता है कि वह मेडिकल करप्शन को समझ भी सके, पकड़ना तो बहुत दूर की बात है. कोई भी सीएमएस, जो कि पूरी तरह से प्रशासनिक पद होता है, बतौर सीवीओ या डिप्टी सीवीओ यह काम करने में पूरी तरह सक्षम हो सकता है. रेलवे में जहां संगठित भ्रष्टाचार हो रहा है, जहां मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठनों का वरदहस्त है, ऐसी जगहों पर कोई कार्यवाही करने में पहले एक तो विजिलेंस अधिकारी और निरीक्षक खुद को असहाय पाते हैं. मगर जब कुछ करते भी हैं, तो उन्हें किसी न किसी तरह मेनिपुलेट कर लिया जाता है. इसके लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने से पहले उन्हें अपने उच्च अधिकारियों से विशेष अनुमति लेना आवश्यक बनाया जाए, जिससे मामलों को दबाया न जा सके. उदाहरण के लिए मुगलसराय मंडल के वाणिज्य विभाग का हवाला यहां ज्यादा सटीक होगा. यहां स्टेशन पर एक बहुत घाघ सीटीआई है, जो मुगलसराय स्टेशन के ही नहीं, बल्कि वहां से होकर गुजरने वाली सभी गाड़ियों में चलने वाले टिकट चेकिंग स्टाफ का गैंग लीडर है. करीब 20 साल से भी ज्यादा समय से मुगलसराय स्टेशन पर ही लगातार जमे इस सीटीआई की अकेले की रोजाना ऊपरी आय 10 से 15 हजार रुपए बताई जाती है, जो कि गाड़ियों में सीट/बर्थ बेचे जाने से होती है. जबकि इस गिरोह में शामिल अन्य चेकिंग स्टाफ सहित सम्बंधित वाणिज्य अधिकारियों को भी उनका निर्धारित हिस्सा मिलता है. ऐसा कैसे हो सकता है कि रेलवे बोर्ड विजलेंस, सेंट्रल टिकट चेकिंग स्क्वायड सहित जोनल विजिलेंस को इसकी जानकारी न हो? किसी अधिकारी के खिलाफ विजिलेंस जांच शुरू करने से पहले एसडीजीएम को जीएम की अनुमति क्यों लेनी चाहिए? यही वजह है कि मालदा मंडल के पूर्व सीएमएस के खिलाफ जब एसडीजीएम खुद से कोई कारवाई नहीं कर पाए, तो मजबूर होकर वह मामला सीबीआई को देना पड़ा था, क्योंकि तत्कालीन जीएम ने एसडीजीएम को सीएमएस के खिलाफ विजिलेंस कारवाई की अनुमति नहीं दी थी. यह एक सच्चाई है. जहां फंड के गैर-इस्तेमाल की बात है, वहां तो विजिलेंस पूरी तरह से नाकाम हुआ है. यह चाहे स्टाफ की आवश्यक जरूरत के लिए हो, या अधिकारी का उसमें निजी स्वार्थ हो, इसके जस्टिफिकेशन का काम विजिलेंस सही ढंग से आज तक नहीं कर पाया है. उदाहरण के लिए 6 करोड़ की हाइपरबेसिक ऑक्सीजन मशीन खरीद ली जाती है, जबकि इसके इस्तेमाल के लिए एक भी मरीज उक्त अस्पताल में नहीं होता है. मात्र 6-7 मरीजों की भर्ती वाले अस्पताल के लिए 4 करोड़ की लागत वाला माड्यूलर ऑपरेशन थियेटर बना दिया जाता है. डीआरएम के बंगले में सिर्फ एक आदमी (डीआरएम) के इस्तेमाल के लिए तरणताल (स्विमिंग पूल) बनाया जाता है. यह सब महान और आदर्श काम मालदा मंडल में हुए हैं, जिनका कोई भी जस्टिफिकेशन किसी भी दृष्टिकोण से नहीं साबित किया जा सकता है. मगर पूर्व रेलवे विजिलेंस इसलिए सोता रहा,क्योंकि उसे इन सब हरामखोरियों के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुमति तत्कालीन जीएम द्वारा नहीं दी गई थी. हालाँकि यह जिम्मेदारी सिर्फ विजिलेंस की ही नहीं थी, यह ऑडिट और एकाउंट्स की भी थी, मगर जब वह खुद इस भ्रष्टाचार में हिस्सेदार हों, तो कोई क्या कर सकता है? ऐसे सैकड़ों - हजारो काम विभिन्न मंडलों में हुए है और हो रहे है, जिनमें लाखों हजार करोड़ रुपए का भरष्टाचार निहित है, मगर विजिलेंस इस सब को रोक पाने में इसलिए भी असमर्थ है, क्योंकि अधिकांश विजिलेंस अधिकारियों और निरीक्षकों की विश्वसनीयता खुद संदिग्ध है. कई ऐसे विजिलेंस अधिकारी आज भी हैं जिनकी सम्पूर्ण विश्वसनीयता संदिग्ध है. इसके लिए दक्षिण पूर्व रेलवे की एसडीजीएम, जो कि बहुत लंबे समय से इस पद पर जमी हैं, और उनके कुछ डिप्टी सीवीओ का ही एकमात्र उदाहरण पर्याप्त है. (साभार-परिपूर्ण रेलवे समाचार)
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