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काँच का पात्र और दो कप चाय

सतीश मिश्रा 
जीवन में सभी को सब कुछ एक साथ, तेजी से और जल्दी - जल्दी पा लेने की इच्छा होती है और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच का पात्र और दो कप चाय" हमें याद आती है । अंतिम सेमिस्टर के आखिरी दिन दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं। उन्होंने अपने साथ लाया एक काँच का बड़ा पात्र ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची। उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या पात्र पूरा भर गया ? एक साथ आवाज आई ... "हाँ" फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकड उसमें भरने शुरु किये धीरे-धीरे पात्र को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकड खाली जगह में समा गये। प्रोफ़ेसर साहब ने फिर पूछा, क्या अब पात्र भर गया है? छात्रों ने एक बार फ़िर "हाँ" कहा। अब प्रोफ़ेसर साहब ने थैली से रेत निकालकर हौले-हौले उस पात्र में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई। अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे। प्रोफ़ेसर साहब ने फिर पूछा , क्यों अब तो यह पात्र पूरी भर गया ना ? सभी ने एक स्वर में कहा-"हाँ" अब तो पूरी भर गया है। सर ने टेबल के नीचे से दो कप निकालकर उसकी चाय उस पात्र में उड़ेंली। चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई। प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया। "इस काँच के पात्र को तुम लोग अपना जीवन समझो।" टेबल टेनिस की गेंदें यानी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं। छोटे कंकड मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ हैं। अब यदि तुमने काँच के पात्र में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकडों के लिये जगह ही नहीं बचती या कंकड भर दिये होते तो सबसे अहम चीज यानी गेंदें नहीं भर पाते पर रेत जरूर आ सकती थी। ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है। यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और सारी अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा। मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है ।अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक - अप करवाओ। टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है। सबसे पहले जीवन की प्राथमिकतायें तय करो कि सबसे जरूरी क्या है क्यूंकि बाकी सब तो कंकड़ और रेत है। छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप क्या हैं ?" प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. " मैं यही सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया" इसका उत्तर यह है कि जीवन हमें चाहे जितना परिपूर्ण,व्यस्त और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये। (श्री सतीश मिश्रा जी के फेसबुक वाल से साभार)
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