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उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं

आज़मगढ़ (अतुल चंद्रा)। नई लोकसभा में उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय का कोई भी सांसद नहीं होगा। ये 2014 के चुनावों का एक और चौंकाने वाला पहलू है। इस प्रदेश में कई ऐसी सीट हैं जहां मुस्लिम वोटर 40 प्रतिशत तक हैं। अभी तक यहां की राजनीति में मुस्लिम और दलित वोटरों का बहुत दख़ल समझा जाता था। भारतीय जनता पार्टी को छोड़ अन्य सभी दलों में ये होड़ लगी रहती थी कि किसने कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इस बार भी बहुजन समाज पार्टी ने 19 मुसलमानों को टिकट दिया था और मायावती को पूरा विश्वास था कि उनके मुस्लिम उम्मीदवार बड़ी संख्या में जीतेंगे। चुनाव से पहले पार्टी के प्रवक्ता रामअचल राजभर ने कहा था कि मायावती "ख़ामोशी से मुस्लिम मतदाता को जीतने में प्रयासरत हैं।" एक पत्रकार वार्ता में मायावती ने भी ज़ोर देकर कहा था कि उन्होंने इस बार समाजवादी पार्टी से कहीं अधिक मुसलमानों को टिकट दिया है। मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण वोट के सहारे मायावती को उम्मीद थी कि इस बार उनके पास समाजवादी पार्टी से ज़्यादा सांसद होंगे। लेकिन बसपा को इस बार एक भी सीट नहीं मिली और ये प्रदेश की राजनीति की दूसरी बड़ी घटना है। मुज़्ज़फ़रनगर के दंगों में झुलसी समाजवादी पार्टी ने भी 13 मुसलमान मैदान में उतारे थे। दंगों के बाद हुई बदनामी के बावजूद, मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी माने जाने वाले "मौलाना" मुलायम का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया। और तो और, पार्टी के दिग्गज आज़म खान के वर्चस्व वाले रामपुर में, जहां मुस्लिम जनसँख्या लगभग 49 प्रतिशत है, वहाँ भी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नसीर अहमद ख़ान चुनाव हार गए। मुलायम सिंह के नज़दीकी माने जाने वाले जफ़रयाब जिलानी रामपुर में भारतीय जनता पार्टी के नेपाल सिंह और नसीर अहमद ख़ान के बीच वोटों के अंतर का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "नेपाल सिंह सिर्फ 23000 वोट से जीते हैं. ज़ाहिर है उन्हें मुस्लिम वोट के बंटवारे से फ़ायदा हुआ है। यही कारण है कि संभल और सहारनपुर जैसे क्षेत्रों में भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीत सके।" जिलानी के मुताबिक़ मुस्लिम वोट के बंटवारे के साथ यादव वोट का भाजपा की तरफ पलायन भी एक कारण है जिसकी वजह से सपा का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता। वह श्रावस्ती का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि अगर वहाँ यादवों ने सपा को अधिक वोट दिया होता तो पार्टी का उम्मीदवार नहीं हारता। जिलानी मानते हैं कि इस बार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति विपरीत दिशा में भारी पड़ी है। उनका आशय था कि बहुसंख्यकों का एकजुट होकर भाजपा को वोट देना मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए भारी पड़ गया। बसपा और सपा से कहीं पीछे न रह जाए, यह देखते हुए कांग्रेस ने भी 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। गांधी परिवार की तरह सपा के मुखिया मुलायम के पांच सदस्य ही नरेंद्र मोदी की आंधी में अपनी सीट बचा पाए। पार्टी के नेताओं को इस परिणाम से इतना गहरा सदमा पहुंचा है कि सभी ने चुप्पी साध ली है। मायावती की प्रेस वार्ता के बाद, जिसमें उन्होंने अपनी ज़बरदस्त हार के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया, बसपा का भी अन्य कोई नेता बोलने को तैयार नहीं है। (साभार बीबीसी)
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