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नृपेंद्र मिश्र के पीएम के प्रधान सचिव बनने पर खुश हैं कसिली गांव के लोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव बनाए गए नृपेंद्र मिश्र देवरिया जिले के बरहज तहसील के कसिली गांव के रहने वाले हैं। पं.शिवेश चंद मिश्र के पुत्र नृपेंद्र पिछले 30 साल से अपने गांव नहीं आए, फिर भी गांव के लोगों में उनके चयन पर खुशी है। बिजली विभाग में आडीटर रहे उनके पिता का जुडाव गांव से रहा। तब नृपेंद्र भी गांव आया-जाया करते थे लेकिन उनके निधन के बाद से उनका आना जाना बंद हो गया। उनका परिवार दिल्लीप जा चुका है। गांव पर नृपेंद्र के पैतृक मकान में उनके चचेरे भाई श्रीरंग मिश्र रहते हैं। उन्होंचने ही मकान को ईंट-सीमेंट से थोडा दुरुस्तक कराया है, लेकिन वीरानगी बताती है कि यह मकान भी गांव के आम लोगों जैसा ही है। नृपेंद्र मिश्र उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के प्रमुख सचिव सहित केंद्र और राज्य सरकारों में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। उनके पिता शिवेशचंद्र मिश्र विद्युत विभाग में आडिटर थे, जबकि एक चाचा पृथ्वीशचंद मिश्र जेलर। उनके दूसरे चाचा दिनेश चंद मिश्र वैज्ञानिक हैं। वर्तमान में हैदराबाद स्थित शोध संस्थान के निदेशक हैं। यद्यपि 30 साल में मिश्र एक बार भी अपने गांव नहीं आए, लेकिन उनके पद और प्रतिष्ठा पर समूचा कसिली गांव इतरा रहा है। लोगों में इस बात की खुशी है कि उनके गांव का एक शख्सर भारत के प्रधानमंत्री के साथ कदमताल करेगा। कसिली गांव में अपने दरवाजे पर खडे चचेरे भाई श्रीरंग मिश्र को नृपेंद्र को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनाए जाने की जानकारी दी गई तो वह भावुक हो गए। बोले, 'यह केवल हमारे परिवार, कसिली गांव और देवरिया जनपद ही नहीं बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश के लिए गौरव की बात है।' उन्होंने बताया कि नृपेन्द्र आखिरी बार तीस वर्ष पूर्व अपने चाचा पृथ्वीशचंद्र के ब्रह्मभोज में शामिल होने गांव आए थे। वर्ष 2000 में वह अपने दूसरे चाचा गंगेशचंद्र मिश्र के पौत्र की शादी में शामिल होने देवरिया आए थे लेकिन गांव नहीं आ सके। उन्हें अनुशासन प्रिय व कार्य के प्रति निष्ठावान बताते हुए उन्होंने कहा कि वह कोई कोई गलत काम बर्दाश्त नहीं करते। नृपेंद्र मिश्र के चचेरे भाई के पड़ोसी अमरनाथ मिश्र ने कहा कि वह भले ही गांव नहीं आते, लेकिन आज गांव की पहचान उन्हीं के चलते देश में हुई है। हम लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। अरुण कुमार मिश्र मानते हैं उनकी नेक सलाह व ईमानदारी का लाभ देश को मिलेगा। अगर देश का विकास हुआ तो गांव भी विकसित होगा। गांव में कई लोग ऐसे भी मिले जिन्हें। नृपेंद्र से इस बात की शिकायत है कि बडे पद पर जाने के बाद वह गांव को भूल गए हैं। उनके एक पट़टीदार ने बेहद तल्खि टिप्पदणी की-'उन पर क्या अभिमान करें, वह चाहे कुछ भी बन जाएं, गांव का भला नहीं होने वाला, क्यों्कि उन्हें यहां के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है। अगर वह गांव में आते तो प्रशासन के लोगों की नजर यहां की समस्याहओं पर पडती। काफी कुछ ठीक हो जाता।' (संजय मिश्र के फेसबुक वाल से)
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