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मुस्लिम वोट बैंक को लेकर मचे ‘मारकाट’ के निहितार्थ

राजीव रंजन तिवारी 
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क भारत में हो रहे संसदीय चुनाव प्रक्रिया के दरम्यान मुस्लिम बहुल देश मलेशिया से एक खबर मिली कि वहां के शासन ने कहा है कि देश के प्रिंटिंग ऑफ कुरानिक टेक्स्ट ऐक्ट में एक प्रस्तावित संशोधन के बाद व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पवित्र कुरान की आयतों का लापरवाही से उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इस संदर्भ में वहां के गृह मंत्री अहमद जाहिद हमीदी ने कहा कि रेस्टोरेंट मालिकों समेत मुस्लिम व्यापारियों को यह तय करना होगा कि परिसरों में कुरान की आयतों को उचित उंचाई और साफ-सुथरी जगहों पर लगाया जाए। इस संशोधन का मकसद उन मुस्लिमों को कुरान की आयतों के दुरुपयोग से रोकना है जो अपने व्यवसाय में मुनाफे के लिए सौभाग्य के प्रतीक के तौर पर उनका इस्तेमाल करते हैं। मंत्री ने बताया कि संशोधनों के तहत गृह मंत्रालय उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगा सकता है या उन्हें जेल की सजा दे सकता है। मतलब ये कि एक तरफ इस्लामिक मुल्क मुस्लिमों के जीवन को संस्कारी तथा बेहतरीन बनाने गरज से नए-नए कानून बना रहे हैं वहीं भारत में मुस्लिम वोटों के लिए मारकाट मची हुई है। भारत में मुस्लिम वोट बैंक पर हर पार्टी की नजर है। अपने-अपने हिसाब से हर पार्टी के नेता इस वोटबैंक को साधने में जुटे हैं। कांग्रेस, बीजेपी हो या फिर आम आदमी पार्टी, ये सब एक-एक करके मुस्लिम धर्मगुरुओं का दरवाजा खटखटा कर वोट की अपील कर रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि मुस्लिम वोट कहां पर किसे मिलेंगे? साथ ही यह भी जानने की जरूरत है कि इस चुनावी मौसम में मचे मुस्लिम वोट के लिए मचे ‘मारकाट’ के निहितार्थ क्या हैं? हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अध्यक्ष राजनाथ सिंह लखनऊ में मुस्लिम धर्मगुरुओं से मिले। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल काशी में मुस्लिम वोट के सहारे मैदान जीतने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी से हाथ का साथ देने की अपील कर चुकी हैं। देश की तमाम बड़ी पार्टियां शायद ये जानती हैं कि मुस्लिम वोटों के बिना वो सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ पाएंगी। उत्तर प्रदेश में करीब 3 करोड़ 37 लाख मुसलमान हैं जो उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का 17 फीसदी हैं। ताजा घटनाक्रम के अनुसार, राजनाथ सिंह की मुस्लिम धर्मगुरुओं से मुलाकात के अलग-अलग विश्लेषण किए जा रहे हैं। मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना सैयद कल्बे जवाद ने यह तो नहीं बताया कि वह भाजपा को समर्थन देंगे या नहीं, लेकिन उनके पास कितना बड़ा वोट बैंक है ये जरूर बता गए। शायद यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियां इसी वोट बैंक पर नजरें गड़ाएं हुए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2009 की जीत में कांग्रेस को मिले कुल मुस्लिम वोट के 37 फीसदी हिस्से का बड़ा हाथ रहा था। लेकिन इस बार भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों की वजह से कांग्रेस के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। कांग्रेस पार्टी मुस्लिम वोट को हाथ से नहीं जाने देना चाहती। सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद इमाम बुखारी कांग्रेस को समर्थन देने का एलान कर चुके हैं। हर कोई अपने-अपने पाले में वोट जुटाने वाले चेहरे बटोरने में जुटा है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने वाराणसी में मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना गुलाम यासीन से मुलाकात की है। अरविन्द केजरीवाल आमतौर पर जो टोपी पहनते ही हैं उससे अलग वो उर्दू भाषा में लिखी हुई टोपी पहनकर मुलाकात के लिए गए थे। समर्थन देने का एलान करके काजी साहब ने केजरीवाल की कोशिश को हरी झंडी दे दी है। देश में मुस्लिम वोटों के आंकड़े बताते हैं कि राजनेताओं के लिए उनकी कीमत क्या है। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में करीब 2 करोड़ 49 लाख मुसलमान हैं जो राज्य की कुल आबादी का करीब 27 फीसदी हैं। बिहार में 1 करोड़ 56 लाख मुसलमान हैं जो बिहार की कुल आबादी की 15 फीसदी हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने में मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हाथ रहा। बिहार में नीतीश सरकार बनाने में मुस्लिम वोटों ने भूमिका निभाई। आजादी के बाद से मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक की तरह देखा जाता रहा है। कहा जाता है कि मुस्लिम समुदाय अपने धर्मगुरुओं के कहने पर वोट करता है और वोट के लिए फतवे जारी होते हैं लेकिन जानकार बताते हैं मुस्लिम समुदाय में वोट की यह धारणा बदल चुकी है। अब मुस्लिम अपने क्षेत्र में पार्टी और उम्मीदवार को देखकर वोट करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1999, 2004 और 2009 के चुनाव के बाद हुए सर्वे बताते हैं कि सिर्फ 8 फीसदी मुसलमानों ने अपने समुदाय को सबसे जरूरी फैक्टर मानते हुए वोट किया था जबकि सर्वे में हिस्सा लेने वाले आधे मुसलमानों ने कहा था कि उन्होंने पार्टी को पैमाना मानते हुए वोट किया था। करीब 13 से 14 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस देश में इस बार मुस्लिम वोट किस तरफ झुकेगा, ये कहना मुश्किल है क्योंकि जगह, वक्त और हालात, राज्य से लेकर लोकसभा सीटों पर अलग-अलग तस्वीर दिख सकती है। 31 मई, 2014 को वर्तमान लोकसभा की अवधि समाप्त होने जा रही है। इसलिए परम्परा के अनुसार नई लोकसभा का गठन जून, 2014 के मध्य तक हो जाएगा। आजादी के पश्चात हमारी लोकसभा का चुनाव हर पांच वर्ष के बाद होता है। केवल 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करने से चुनाव में विलम्ब हुआ था। जिसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा और वे सत्ता से बाहर हो गई थीं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब हमारे देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो चुकी हैं जिसे कोई भी राजनीतिक दल उखाड़ कर नहीं फेंक सकता। इतना ही नहीं लोकतंत्र से खिलवाड़ करने वालों को जनता ऐसा पाठ पढ़ाती है कि उन्हें सत्ता से बाहर हो जाना पड़ता है। चुनाव की अवधि अपने तय किए हुए समय के अनुसार होती है। हमारा चुनाव आयोग इतना मजबूत और कानून रूप से सक्षम हो चुका है कि वह चुनाव के मामले में किसी को हस्तक्षेप नहीं करने देता। भारत में इस समय पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 750 है। केन्द्र की सरकार बनाने में तो जाने-माने दल ही भाग लेते हैं लेकिन राज्यों में अपनी-अपनी सांस्कृतिक धारा के आधार पर बनी पार्टियां हैं। आम चुनाव में अब भी पंथ पर आधारित कुछ दल शेष हैं जिनके कारण बहुधा राष्ट्रीय दलों के चुनाव परिणाम गड़बड़ाते रहते हैं। पंथ, जाति और अपनी स्थानीय पहचान से चुनाव प्रभावित होते हैं। राष्ट्रीय स्तर के दलों के लिए वे कभी चुनौती भी बनते हैं और हार-जीत का नुकसान उनके कारण राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों को उठाना पड़ता है। अल्पसंख्यक वोट, जिसे मुस्लिम वोट बैंक कहा जाता है, वह आज भी पहले की तरह मजबूत है। इसलिए टिकट बांटते समय सभी राजनीतिक दलों को मुस्लिम मतदाता की ओर विशेष ध्यान देना पड़ता है। यहां एक बात कहनी ही होगी कि बहुसंख्यकों की तुलना में अल्पसंख्यक मतदान के प्रति अधिक जागरूक होते हैं। इसलिए हर उम्मीदवार को अपने निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दल उन्हें रिझाने का लगातार प्रयास करते रहते हैं। कुछ पार्टियां तो सीमा के बाहर जाकर उन्हें मनाने का कार्य करती हैं।
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