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‘महावीर धर्मक्षेत्र के वीर, अतिवीर और महावीर थे...’

महावीर जयंती पर विशेष 
(डॉ.पुष्पेन्द्र मुनि)
संसार में ऐसा षायद ही कोई धर्म हो जिसमें गुरुओं का सत्संग ओर शास्त्रों का अध्ययन आदि महत्त्वपूर्ण नहीं बताया गया हो। महावीर राजकुमार के रुप में जन्मे और तीर्थंकर के रुप में मुक्त हुए। जन्म और मोक्ष के बीच उन्होंने अपने जीवन से और उपदेश से जो प्रकाश विकीर्ण किया, सहस्त्र शताब्दियों तक भी उसकी चमक चहुंओर दीप्त रहेगी। वर्तमान सदी विज्ञान व तकनीक की दृष्टि से चरम विकास की ओर अग्रसर है पर आध्यात्मिक दरिद्रता से जूझ रही है। बड़े बड़े धर्म गुरु व धार्मिक संस्थान भी आतंक व हिंसा से संघर्ष करती इस सदी को राहत नहीं दे पाए हैं। ऐसे समय में प्रभु महावीर का स्मरण आना स्वाभाविक है, बिहार प्रांत के वैशाली के राजा सिद्धार्थ की धर्म पारायण पत्नी त्रिषला ने चै़त्र शुक्ला त्रयोदषी के दिन होनहार बालक को जन्म दिया। बालक के प्रभाव से धन्यधान्य की वृद्धि हुई, इससे उसका नाम रखा गया वर्द्धमान । जब तक माता पिता जीवित रहे दीक्षा ग्रहण नहीं की अंत में 30 वर्ष का राजकुमार वर्द्धमान राज्य सुखों को छोड़कर अपने तथा जगत कल्याण के लिए त्यागी बन गया। सीमित परिवार को छोड़कर विश्वबंधुत्व भाव को अपना लिया। तपस्या के बारह वर्ष के लम्बे काल में अनेकों कष्टों को झेलते हुए मुक्ति पथ की ओर बढ़ गए। महावीर का 42 वर्ष से 72 वर्ष तक का जीवन सार्वजनिक सेवा में व्यतीत हुआ। स्वयं स्वतंत्र होकर दूसरों को स्वतंत्र होने का रास्ता बताया। जीवन संघर्षमय था। महावीर धर्मक्षेत्र के वीर, अतिवीर और महावीर थे। युद्धक्षेत्र के नहीं। युद्ध और धर्मक्षेत्र में बहुत बड़ा अंतर है। युद्ध क्षेत्र में शत्रु का नाश किया जाता है और धर्मक्षेत्र में शत्रुता का। युद्धक्षेत्र में पर को मारा जाता है और धर्मक्षेत्र में स्वयं को। युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का नाश होता है और धर्मक्षेत्र में अपने विकारों का नाश, ओर वर्द्धमान ने अपने विकारों का नाश कर सुंदर सार्थक नाम पाया महावीर। सामान्यतः ‘हिंसा’ करने वाला स्वयं को वीर समझता है, अन्य जन भी हिंसक को वीर मानते है पर जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर वर्धमान ने महावीर की संज्ञा पाई अहिंसक बनकर। यद्यपि महावीर के चिंतन की पृष्ठ भूमि में 23 तीर्थंकरों की विकसित परम्परा थी। संस्कारों की ही परिणति थी कि स्वविवेक प्रारंभ से ही जागृत था। केवल ज्ञान के बाद महावीर में जो ‘स्व’ की दृष्टि विकसित हुई थी वह आज के गणित, विज्ञान और चिंतन पर न केवल प्रासंगिक सिद्ध हुई वरन् अदभूत क्रांतिकारी भी। महावीर ने कोई नया धर्म नहीं चलाया, धर्म की स्थापना नहीं, उसका उद्घाटन किया है। महावीर ने धर्म को नहीं, धर्म में खोई आस्था को स्थापित किया। महावीर विकट साधना पथ पर आरुढ़ हुए। कदम स्वतःबढ़ते चले गए। इन्द्र द्वारा किये गये सहकार निवेदन को अस्वीकार किया तो ग्वालों, भयंकर सर्प आदि जानवरों तथा क्रूर दानवों के कष्टों से अप्रंकपित रहे। राग ओर द्वेष पर विजित हो तीर्थंकर बने। तीर्थंकर महावीर के जीवन में पाते हैं अहिंसा की गंगा, अपरिग्रह की यमुना और अनेकान्त की सरस्वती। उन्होंने जो उपदेष दिया उससे प्रभावित हो राजा/रंक/पंडित/धनिक/निर्धन समान श्रद्धा से समान भूमिका पर भक्त बने।महावीर अपने और पराये, उच्च ओर नीच से सर्वथा उपर थे और तभी अपने चैदह हजार साधुओं में प्रमुख षिश्य गौतम को आनंद श्रावक से क्षमा मांगने को प्रेरित किया। भरी सभा में प्रतिष्ठित उपासक राजा श्रेणिक को नरकगामी बताया, दासी चंदना के हाथों से उड़द बाकुले ग्रहण कर अपना अभिग्रह पूरा किया ओर साथ ही चंदना को दीक्षित कर साध्वी समाज की प्रमुखा बनाकर नई क्रांति की षुरुआत की। महावीर का समाज वह आदर्ष समाज है जिसमें इन्द्रभूति गौतम जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भी सम्मान सहित स्थान मिला। राजा प्रसन्नचंद, राजा श्रेणिक जैसे क्षत्रियों को भी वही आदर मिला। वणिक कुल में पैदा हुए पूणिया जैसे श्रावक के त्याग और तप की महिमा महावीर स्वयं फरमाते थे। इतना ही नहीं यह बहुत बड़ी क्रान्ति की बात है कि प्रभु ने हरिकेषबल जैसे चण्डाल जाति के व्यक्ति को न केवल सभा में जगह दी अपितु उसे संयम देकर आत्म कल्याण का पथ प्रदान किया। महावीर ने तीन सिद्धान्तों पर अपने धर्म के महल को खड़ा किया। तीन सिद्धान्त 1. अहिंसा 2. अपरिग्रह 3. अनेकान्त। तीनों ऐसे सिद्धान्त है जिन्हें प्रायः हर धर्म ने किसी न किसी रुप में स्वीकार किये। अहिंसा की आज न केवल सम्पूर्ण मानवता को सबसे ज्यादा आवष्यकता है अपितु पृथ्वी के हर प्राणी के लिए उसकी आवष्यकता है। यह एक ऐसा सिद्धान्त है जिससे स्वयं महावीर ने मुक्ति पाई ओर महात्मा गांधी ने देष को आजादी दिलाई। अहिंसा एक ऐसा धर्म है जिसें धर्म का प्राण कहा जा सकता हूं। गीता से लेकर कुरान तक के हर षास्त्र का सार है- अहिंसा। जैन धर्म की पहचान उसके अहिंसा धर्म से है, क्योंकि इसमें किसी को जान से मारना ही हिंसा नहीं है वरन् दूसरे जीव को प्रमादवष दुःख पहुंचाने की सोच भी हिंसा हैं महावीर का संदेष है जो तुम अपने लिए चाहते हो वह तुम सबके लिए चाहो और जो तुम अपने लिए नहीं चाहते वह किसी के लिए मत चाहो। यही तो अहिंसा का हृदय है। महावीर की अहिंसा में दूसरों की पीड़ा को अनुभव करने का भाव छिपा है। षांति के लिए तरसती मानवता के लिए महावीर का अहिंसा संदेष अत्यन्त सामयिक तथा उपयोगी है।व्यवहारिक रुप में यही अहिंसा एक ओर षाकाहार के लिए प्रेरित करती है, तो दूसरी ओर पर्यावरण के सभी घटकों को संरक्षित करने की प्रेरणा भी देती है। अहिंसा के अतिरिक्त अन्य व्रत सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह है। देखा जाए तो ये भी मूल रुप से अहिंसा से जुडे़ हैं। असत्य बोलने से दूसरों को हानि पहुंच सकती है। ‘सत्यमेव जयतेः’ हमारा राष्ट्रीय ध्येय वाक्य है पर लोभ, भय, क्रोध जैसे नकारात्मक भाव हमें उससे विमुख करते हैं। दूसरे के धन या अन्य साधनों का अपहरण करना अनुचित है अतः ‘अस्तेय’ भी एक आदर्ष व्रत है। वासनाओं का त्याग ही ब्रह्मचर्य है। उपभोक्तावाद की अपसंस्कृति जब पांव पसार रही हो तब अपरिग्रह व्रत ही मानवता की रक्षा कर सकता है। 2610 वर्ष बाद आज भी तारणहार का स्मरण व्यक्ति के जीवन के कल्याण का आधार बनता है। हम इतने भाग्यषाली नहीं है कि आज हमें प्रभु का सान्निध्य प्राप्त हो पर हमारा सौभाग्य है कि हमें उनकी वाणी, उनके वचन, उनके कथन हमारे पास उपलब्ध है।उनके षब्दों का श्रवण/पठन हमारे अन्तस् में छिपे हुए तमस् को मिटाने के लिए प्रकाष किरण सिद्ध होता है। महावीर जयंती के अवसर पर सिद्धान्तों की दुहाई तो खूब दे देते है, बैनर पर लिखकर नारे भी लगा लेते हैं किन्तु जीवन में पलने वाली हिंसा से स्वयं को विलग नहीं कर पाते। दया धर्म की जय कहना सामान्य बात है ओर उसे जीवन में आत्मसात् करना महत्त्वपूर्ण बात है। कहने को तो कह देते है कि हम महावीर के अनुयायी है परन्तु उनको मानते सभी है पर उनकी कोई नहीं मानता। एक श्रावक के षरीर पर चमड़े की वस्तुऐं उसके आचरण एवं महावीर भक्त होने.पर प्रष्न चिन्ह है चमड़ा चाहे जूते में हो या बेल्ट, पर्स में। अहिंसा ओर दया के प्रति हमारी कितनी सजगता है यह हमें महावीर जयन्ती के अवसर पर सोचना है, सोचकर त्याग करेंगे तो सही रुप में हम महावीर के अनुयायी कहलाने के हकदार होंगे।
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